परिकरमा - प्रकरण ४
सूरत इस्क पैदा होने की
तुमको इस्क उपजावने, करूं सो अब उपाए । पूर चलाऊं प्रेम को, ज्यों याही में छाक छकाए ॥१॥
इस्क जिन विध उपजे, मैं सोई देऊं जिनस । तब इस्क आया जानियो, जब इन रंग लाग्यो रस ॥२॥
ए सुख बिसरे धनीय के, इन सुपन भोममें आए । सो फेर फेर याद देत हों, जो गया तुमें बिसराए ॥३॥
कीजे याद मिलाप धनी को, और सखियों के सनेह । रात दिन रंग प्रेम में, विलास किए हैं जेह ॥४॥
निस दिन रंग-मोहोलन में, साथ स्यामाजी स्याम । याद करो सुख सबों अंगों, जो करते आठों जाम ॥५॥
चौकस कर चित दीजिए, आतम को एह धन । निमख एक ना छोड़िए, कर मन वाचा करमन ॥६॥
एही अपनी जागनी, जो याद आवे निज सुख । इस्क याही सों आवहीं, याही सों होइए सनमुख ॥७॥
इस्क धनी को आवहीं, याही याद के माहें । इस्क जोस सुख धनी बिना, और पैदा कहूं नाहें ॥८॥
ताथें पल पल में ढिग होइए, सुख लीजे जोस इस्क । त्यों त्यों देह दुख उड़सी, संग तज मुनाफक ॥९॥
जो लों इस्क न आइया, तोलों करो उपाए । योंही इस्क जोस आवसी, पल में देसी पट उड़ाए ॥१०॥
पल पल में पट उड़त है, बढ़त बढ़त अनूकरम । इस्क आए जोस धनी के, उड़ गयो अन्तर भरम ॥११॥
निमख निमख में निरखिए, पट न दीजे पल ल्याए । छेटी खिन ना पर सके, तब इस्क जोस अंग आए ॥१२॥
इस्क पेहेले अनुभवी, निज सरूप निजधाम । तिन खिन बेर ना होवहीं, धनी लेत असल आराम ॥१३॥
बैठे मूल मेले मिने, धनी आगूं अंग लगाए । अंग इस्क जो अनुभवी, तुम क्यों न देखो चित ल्याए ॥१४॥
ए वचन विलास जो पेड़ के, आए हिरदे आतम के अंग । तब खिन बेर न लागहीं, असल चित्त एक रंग ॥१५॥
बैठते उठते चलते, सुपन सोवत जाग्रत । खाते पीते खेलते, सुख लीजे सब विध इत ॥१६॥
एह बल जब तुम किया, तब अलबत बल सुख धाम । अरस परस जब यों हुआ, तब सुख देवें स्यामा स्याम ॥१७॥
जिन जानो ढील इस्क की, जब रस आयो अंतस्करन । तब सुख पाइए धाम के, निस दिन रंग रमन ॥१८॥
फेर फेर सुरत साधिए, धनी चरित्र सुख चैन । इस्क आए बेर कछू नहीं, खुल जाते निज नैन ॥१९॥
फेर फेर सरूप जो निरखिए, फेर फेर भूखन सिनगार । फेर फेर मिलावा मूल का, फेर फेर देखो मनुहार ॥२०॥
फेर फेर देखो धनी हेत की, फेर फेर रंग विलास । फेर फेर इस्क रस प्रेम की, देखो विनोद कई हाँस ॥२१॥
अंदर धनी के देखिए, एक चित्त हेत रस रीत । क्यों कहूं रंग हाँस विनोद की, सुख सनेह प्रेम प्रीत ॥२२॥
खिन खिन में सुख होएसी, धनी याद किए असल । ए सुख आए इस्क, बेर ना लगे एक पल ॥२३॥
मैं जो दई तुमें सिखापन, सो लीजो दिल दे । महामत कहे ब्रह्मसृष्ट को, सखी जीवन हमारा ए ॥२४॥
॥ प्रकरण ॥४॥ चौपाई ॥३०६॥
