Logo  Kuljam.org

विषय-सूची

परिकरमा - प्रकरण ४४

मोहोल मानिक पहाड़

साथजी देखो मोहोल मानिक, जो कहे द्वार बारे हजार । सोभा सुन्दरता इनकी, ए न आवे बीच सुमार ॥१॥

एक देख्या मोहोल मानिक का, ताए बड़े द्वार बारे हजार । हिसाब न छोटे द्वारों का, सोभा सिफत न आवे पार ॥२॥

ले जिमी से ऊपर मोहोल मानिक, कम ज्यादा कहूं नाहें । सरभर सोभा सब इमारतें, जल बन हिंडोले मोहोलों माहें ॥३॥

कई नेहेरें कई चादरें, कई फल फूल बन सोभित । ऊपर झरोखे सब बिध तालों, कहूं गिनती न सोभा सिफत ॥४॥

मानिक मोहोल रतन मय, झलकत जोत आकास । नूर पूरन पूर भरया, रूह खोल देख नैन प्रकास ॥५॥

मोहोल मध्य मानिक का, नूर पहाड़ मोहोल गिरदवाए । बड़े बड़े जोड़े छोटे छोटे, बराबर जुगत सोभाए ॥६॥

चारों तरफों मोहोल बीच ताल, चारों तरफों हिंडोले । एक हिंडोले माहें झूलें, हक हादी रूहें भेले ॥७॥

चारों तरफों ऐसे ही झूलें, हक हादी रूहें खेलत । अर्स अजीम के बीच में, मोहोल अम्बर जोत धरत ॥८॥

बड़े बड़े पहाड़ मोहोल फिरते, बड़े बड़े के संग । छोटे छोटा जोत सों, करे नूर जोत सों जंग ॥९॥

कई हजारों लाखों दिवालें, जंग करत आसमान । कई सागर मोहोलों माहें, गिनती नाहीं मान ॥१०॥

ऊपर मोहोल तले मोहोल, बीच बीच मोहोल गिरदवाए । इन बिध मोहोल भरयो अम्बर, फेर बिध कही न जाए ॥११॥

पहाड़ थंभ जो पहाड़ थुनी, पहाड़ै मोहोल मंडान । कई मोहोल मोहोलों मिले, कहूं जिमी न देखिए आसमान ॥१२॥

चौड़े देखें चारों तरफों, ऊंचे लग आसमान । ऐसे और मोहोल तो कहूं, जो कोई होवे इन समान ॥१३॥

अन्दर बाहेर किनार सब, देख सब ठौरों खूबी देत । ए सोभा सांच सोई देखेगा, जाको हक नजर में लेत ॥१४॥

पेहेली फिरती दिवाल फेर देखिए, तिन बीच मोहोल अनेक । जो जो खूबी देखिए, जानों एही नेक सों नेक ॥१५॥

एक हवेली चौरस, दूजा मोहोल गिरदवाए । ए खूबी मोमिन देखसी, नजरों आवसी ताए ॥१६॥

अर्स हौज दोऊ बीच में, मोहोल मानिक पुखराज । जेता नजीक हौज के, तासों मोहोल मानिक रहे बिराज ॥१७॥

ए चारों हुए दोरी बन्ध, सामी अछर नूर सोभित । ए हक हुकम बोलावत, इत और न पोहोंचे सिफत ॥१८॥

ए कहया कौल थोड़े मिने, रूहें समझेंगी बोहोतात । दिल मोमिन से ना निकसे, चुभ रेहेसी दिन रात ॥१९॥

कहे बारे हजार मोहोल फिरते, कही हुकमें तिनकी बात । तिन हर मोहोलों बीच बीच में, बारे बारे हजार मोहोलात ॥२०॥

अटक रहे थे इतहीं, बीच आवने मोमिनों दिल । इन अर्स रूहों वास्ते एता कहया, विचार करें सब मिल ॥२१॥

जो मोमिन किए हकें बेसक, सो लेंगे दिल विचार । अर्स दिल एही मोमिनों, तो ल्‍याए बीच सुमार ॥२२॥

आगे आए मिली इत नदियां, चक्राव ज्यों पानी चलत । तिन पीछे नदियां मोहोल बन की, जाए सागरों बीच मिलत ॥२३॥

क्यों कर कहूं मैं पौरियां, और क्यों कर कहूं झरोखे । देख देख मैं देखिया, न आवे गिनती में ए ॥२४॥

मैं गिरद कही चौरस कही, पर कई हर भांत हवेली । जाके आवें ना मोहोल सुमार में, तो क्यों जाए गिनी पौरी ॥२५॥

जब हक याद जो आवहीं, तब रूह देख्या चाहे नजर । दिल अर्स मारया इन घाव से, सो ए मुरदा सहे क्यों कर ॥२६॥

देखो महामत मोमिनों जागते, जो हक इलमें दिए जगाएँ । करे सो बातें हक अर्स की, तूं पी इस्क तिनों पिलाएँ ॥२७॥

॥ प्रकरण ॥४४॥ चौपाई ॥२४८१॥

प्रकरण तथा चौपाइयों का संपूर्ण संकलन

प्रकरण ४२५, चौपाई १३०३७

॥ परिकरमा सम्पूर्ण ॥

इसी सन्दर्भ में देखें-