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विषय-सूची

परिकरमा - प्रकरण ७

कुंज बन मंदिर

सातों घाट बीच में, पुल मोहोल तरफ दोए । दोऊ पांच भोम छठी चांदनी, क्यों कहूँ सोभा सोए ॥१॥

साम सामी झरोखे, झलकत अति मोहोलात । पुल दोऊ दूजी किनार लग, बीच जल ताल ज्यों सोभात ॥२॥

तले दस घड़नाले पोरियां, बीच नेहेरें ज्यों चलत । स्याम स्यामाजी सखियां, इन मोहोलों आए खेलत ॥३॥

खेल करें जब इन मोहोलों, धनी सुख देत सैयन को । कई विध खेल कहूँ केते, आवें ना जुबां मों ॥४॥

इन मोहोल आगूं घाट केल का, इस तरफ आगूं बट घाट । तीन बाएं तीन दाहिने, बीच घाट चांदनी पाट ॥५॥

सात घाट को लेयके, आगूं आए अर्स द्वार । इत पसु पंखी कई खेलत, ए सिफत न आवे सुमार ॥६॥

चल्या गया बन ताल लों, एकल छत्री अति भिल । तलाव धाम के बीच में, आगूं निकस्या चल ॥७॥

जमुना धाम तलाव के, बीच में कई विवेक । कुंजवन मंदिर कई रंगों, कहा कहूँ रसना एक ॥८॥

उज्जल रेती मोती निरमल, जोत को नाहीं पार । आकास न मावे रोसनी, झलकारों झलकार ॥९॥

कई पुरे इन बन में, तिनके बड़े द्वार । तिन द्वार द्वार कई गलियां, तिन गली गली मंदिर अपार ॥१०॥

कई मंदिर इत फिरते, कई चारों तरफों मंदिर । तिनमें कई विध गलियां, निकुंज बन यों कर ॥११॥

मंदिर दिवालें गलियां, नकस फल फूल पात । मंदिर द्वार देख देख के, पलक न मारी जात ॥१२॥

कई पुरे कई छूटक, कई गलियाँ बने हुनर । या गलियों या मंदिरों, सब छाया बराबर ॥१३॥

इन बन बोहोतक बेलियां, सोभा अति सुन्दर । फल फूल पात कई रंगों, या बाहेर या अन्दर ॥१४॥

कई छलकत जल चेहेबच्चों, करत झीलना जाए । अतन्त खूबी इन बन की, क्यों कहूँ इन जुबांए ॥१५॥

फूल पात जो कोमल, रगाँ तिनमें कोई नाहें । तिनके सेज चबूतरे, कई बने जो मोहोलों माहें ॥१६॥

इत कई रंग जवेरन के, तिन कई रंगों कई नूर । ए मिसाल इनकी, आकास न माए जहूर ॥१७॥

कई बन स्याह सुपेत हैं, कई बन हैं नीले । कई बन लाल गुलाल हैं, कई बन हैं पीले ॥१८॥

कई बन हैं एक रंग के, कई एक एक में रंग दस । इन विध कई अनेक हैं, कई जुदे जुदे रंगों कई रस ॥१९॥

फल फूल छाया पात की, खुसबोए जिमी और बन । आकास भरयो नूरसों, किया रेत बन रोसन ॥२०॥

अनेक मेवे कई भांत के, सो ए कहूं क्यों कर । नाम भी अनेक मेवन के, और स्वाद भी अनेक पर ॥२१॥

कई मीठे मीठे मीठरड़े, कई फरसे फरसे मुख पर । कई तीखे तीखे तीखरड़े, कई खट्टे खट्टे खटूबर ॥२२॥

इन एक एक में अनेक रस, रस रस में अनेक स्वाद । इन विध मेवे अनेक रस, सो कहां लों बरनों आद ॥२३॥

कई मेवे हैं जिमी में, कई बेलियों दरखत । कई मेवे फल की खलड़ी, कई रस बीज में उपजत ॥२४॥

बोहोत रेती इन ठौर है, निपट सेत उज्जल । खेल खुसाली होत है, सखियां पांउं चंचल ॥२५॥

इत कई चौक छाया मिने, कहूं चांदनी चौक । स्याम स्यामाजी सखियनसों, खेल करें कई जौक ॥२६॥

क्यों कहूं वन की रोसनी, सीतल वाए खुसबोए । ए जुबां न केहे सके, जो सुख आतम होए ॥२७॥

इन बन की हद धामलों, और झरोखों दिवाल । इन बन में कई हिंडोले, होत रंग रसाल ॥२८॥

चौक चार उपरा ऊपर, बट पीपल बखान । बराबर थंभ छातें, ठौर सोभित सब समान ॥२९॥

घाट के दोऊ तरफ पुल, मिले दोऊ तरफों इन । बन नारंगी चन्द्रवा, पोहोंच्या दिवालों रोसन ॥३०॥

चार थंभ बराबर सोभित, उपरा लग ऊपर । घट बढ़ न दोऊ तरफों, ए सोभा अति सुन्दर ॥३१॥

द्वार समान सब देखत, ऊपर सोभा अपार । माहें खट छपरें बन की, हिंडोले छातें चार ॥३२॥

कई हिंडोले एक छातें, छातें छातें खट अनेक । चारों तरफों हार देखिए, जानों एक एक थें विसेक ॥३३॥

राज स्यामाजी सखियां, जब इत आए हींचत । इन समें बन हिंडोले, सोभा क्यों कर कहूँ सिफत ॥३४॥

जवेर भी रस जिमी के, और जिमीको रस बन । नरमाई फूल पात अधिक, ना तो दोऊ बराबर रोसन ॥३५॥

चढ़ आवत बादलियां, सेहेरें घटा तरफ चार । इन समें बन सोभित, माहें बिजलियां चमकार ॥३६॥

बोए आवे सुगंध सीतल, उछरंग होत मलार । गाजत गंभीर मीठड़ा, इन समें सोहे सिनगार ॥३७॥

हंस चकोर मैना कोइली, करें बन में टहुँकार । बोलें बपैया बांबी दादुर, करें तिमरा भमरा गुंजार ॥३८॥

हिंडोले हजार बारे, स्याम स्यामाजी हींचत । अखंड सुख धनी धाम बिना, कौन देवे इन समें इत ॥३९॥

ए निकुंज बन सब लेयके, जाए पोहोंच्या ताल । जमुना धाम के बीच में, ए बन है इन हाल ॥४०॥

जित बोहोत रेती मोती पतले, गड़त घूटन लो पाए । इत सबे मिल सखियां, रब्द गुलाटें खाएं ॥४१॥

इत बोहोत रेतीमें सखियां, दौड़ दौड़ देत गुलाटें । कूदें दौड़े ठेकत हैं, रेत उड़ावें पांउँ छांटें ॥४२॥

कबूं दौड़त राज सखियां, सबे मिलके जेती । हाँसी करत जमुना त्रट, जित बोहोत गड़त पांउँ रेती ॥४३॥

अनेक रामत रेतीय में, बहुविध इन ठौर होत । ए बन स्याम स्यामाजी को, है हाँसी को उद्दोत ॥४४॥

कहूं कहूं सखियां ठेकत, माहें रेती रब्द कर । पीछे हँस हँस ताली देयके, पड़त एक दूजी पर ॥४५॥

एकल छत्री सब बनकी, भांत चंद्रवा जे । फेर फेर उमंग होत है, ठौर छोड़ी न जाए ए ॥४६॥

फेर फेर इतहीं दौड़त, कहूं ठेकत दौड़त गिरत । सब सखियां मिल तिन पर, फेर फेर हाँसी करत ॥४७॥

केते खेल कहूं सखियन के, जो करत बन नित्यान । खेल करें स्याम स्यामाजी, सखियों खेल अमान ॥४८॥

महामत कहे ऐ मोमिनों, देखो ताल पाल के बन । ए लीजो तुम दिल में, करत हों रोसन ॥४९॥

॥ प्रकरण ॥७॥ चौपाई ॥४६८॥

इसी सन्दर्भ में देखें-