श्री प्रकास
श्री कुलजम सरूप के चौदह ग्रन्थों में से एक प्रकास है, जिसके दो भाग हैं- गुजराती और हिन्दुस्तानी । यह ज्ञान परब्रह्म के आवेश स्वरूप श्री प्राणनाथ जी के मुख से क्रमशः जामनगर और अनूपशहर में प्रकट हुआ और इसकी शैली चौपाइयों के रूप में है ।
प्रकास गुजराती विषय सूची-
- कांई एणी पेरे कीधूं रास
- संभारो साथ (श्री साथनो प्रबोध)
- सकल साथ रखे कोई वचन विसारो जी
- न कांई मनमां न कांई चित (चौपाई प्रगटी)
- जुओ रे बेहेनी हूं हाय हाय (विलाप करया छे)
- मूंजी सैयल रे (भाखा सिंधी जाटी)
- सजण विया मूंजा निकरी (बीजी विलामणी)
- खुई सा परडेहडो
- हवे एक लवो जो सांभरे सही (चौपाई प्रगटाणी)
- हवे विनती एक कहूं मारा वाला (विनती)
- हवे आपणमां बेठा आधार
- हवे गुणने लखूंजी तमतणां (श्री धणीजीना गुण)
- सांभलो साथ मारा सिरदार
- मूंजा अंध अभागी जीव जोर रे (जाटी भाषा में प्रबोध)
- मूंहजा जीव अभागी रे
- मूंजा जीव सुहागी रे (वी वलामणी)
- मूंजा साथ सुहागी रे
- हूं तां पिउजीने लागूं छूं पाय (विनती)
- अखंड दंडवत करूं परणाम
- हवे करूं ते अस्तुत आधार (हवे प्रकास उपनो छे)
- सांभल जीव कहूं वृतांत (जीवनो प्रबोध)
- हवे दृष्ट उघाडी जो पोतानी
- हवे वारी जाऊं वनराय वल्लभनी
- हवे अस्तुत ऊपर एक विनती कहूं
- खुई सा निद्रडी रे (कत्तण जो द्रष्टांत)
- खुईसो भरम जो घेंण
- हाणे तूं म भूलज रे
- भोरी तूं म भूल इंद्रावती
- हूं जाणूं निध एकली लऊं (श्री लखमीजीनूं द्रष्टांत)
- सुईने सुई सूता सूं करो रे (प्रगटवाणी प्रकासनी)
- बेहदी साथ तमे सांभलो (बेहद वाणी)
- वली वण पूछे कहूं विचार (दूध पाणीनो विछोडो)
- सांभलो साथ कहूं विचार (श्री भागवतनो सार)
- हवे वली कहूं ते सुणो (एक सौ आठ पक्ष का सार)
- हवे कांईक हूं मारी करूं (गुणनी आसंका)
- गुण केटला कहूं मारा वाला
- हवे सैयरने हूं प्रगट कहूं (प्रगट वाणी)
प्रकास हिन्दुस्तानी विषय सूची-
- कछु इन विध कियो रास
- याद करो तुम साथ जी (साथ को प्रबोध)
- साथ सकल तुम याद करो
- ना कछू मन में ना कछू चित (लीला को प्रकास होना - आत्मा को प्रकास उपज्यो)
- श्री सुंदरबाई स्यामाजी अवतार (श्री सुंदरबाई के अंतरध्यान की बीतक)
- ओहि ओहि करती फिरों (विलाप)
- मेरी सैयल रे (जाटी भाखा का विलाप)
- पुकार चले मेरे पिउजी
- एक लवो याद आवे सही (चौपाई प्रगटी है)
- विनती एक सुनो मेरे प्यारे (सुन्दरसाथ की विनती)
- आपन में बैठे आधार
- मैं लिखूं श्री धनीजी के गुन (श्री धनीजी के गुन)
- सुनो साथ मेरे सिरदार (साथ को सिखापन)
- मेरे अंध अभागी जीव (जीव को सिखापन)
- मेरे जीव अभागी रे
- मेरे जीव सोहागी रे
- मेरे साथ सोहागी रे
- श्री धनीजी के लागूं पाए
- अखंड दंडवत करूं परनाम
- अब करूं अस्तुत आधार (अस्तुत कर गुन फिराए हैं)
- सुन मेरे जीव कहूं वृतांत (जीव को सिखापन)
- आंखां खोल तूं आप अपनी
- वारने जाऊं वनराए वल्लभ की
- अब अस्तुत ऊपर एक विनती कहूं
- भट परो तिन नींद को (जाटी प्रबोध - कातनी को द्रष्टांत)
- भट परो नींद मोह की
- अब तूं जिन भूल आतम मेरी
- भोरी तूं न भूल इंद्रावती
- मैं जानूं निध एकली लेऊं (लखमीजी को दृष्टांत)
- सोई ने सोई सूते क्या करो जी (प्रगटबानी प्रकास की)
- बेहद के साथी सुनो (बेहद वानी)
- हो वतनी बांधो कमर तुम बांधो (दूध पानी का निबेरा)
- सुनियो साथ कहूं विचार (श्री भागवत को सार)
- अब कहूं सो हिरदे रख (पख पुष्ट मरजाद प्रवाह)
- अब कछुक मैं अपनी करूं (गुनन की आसंका)
- गुन केते कहूं मेरे पिउ जी
- निजनाम श्री जी साहिब जी (श्री प्रगटवाणी)
