प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण १०
सुन्दरसाथ की विनती
साखी- विनती एक सुनो मेरे प्यारे, कहूं पिउजी बात । आए प्रगटे फेर कर, करी कृपा देखे अपन्यात ॥१॥
श्री देवचंदजी हम कारने, निध तुमारे हिरदे धरी । वचन पालने आपना, साथ सकल पर दया करी ॥२॥
जनम अंध जो हम हते, सो तुम देखीते किए । पीठ पकड़ हम ना सके, सो फेर कर पकर लिए ॥३॥
अब जो कछूए हम में, होसी मूल अंकूर । जो नींद उड़ाए तुम निध दई, सो क्योंए ना छोडूं पिया नूर ॥४॥
पेहेले तो हम न पेहेचाने, सो सालत है मन । चरचा कर कर समझाए, कहे विध विध के वचन ॥५॥
चाल- ऐसे अनेक वचन कहे हमको, जिन एक वचने पेहेचाने तुमको । तुम दई पेहेचान विध विध कर, पर निरोध बैठा हिरदा पकर ॥६॥
तब हंस कर आंझू आनके कह्या, पर तिन समे हम कछु ए ना लह्या । तब तारतम केहे देखाया घर, हम तो भी ना सके पेहेचान कर ॥७॥
तब हममें से अद्रष्ट भए, कोई कोई वचन हिरदे में रहे । जो या समें खबर ना लेते तुम, तो मोहजल अति दुख पावते हम ॥८॥
यों जान के आए हम मांहें, आए बैठे प्रगटे तुम जांहें । ज्यों आपन पेहेले बृज में हते, नित प्रते पियासों प्रेमें खेलते ॥९॥
अनेक खेल किए आपन, पूरन मनोरथ सब किए तिन । अग्यारे बरस लो लीला करी, कालमाया इतही परहरी ॥१०॥
जोगमाया कर रास जो खेले, कई सुख साथ लिए पिउ भेले । करी अंतराए देने को याद, हम दुख मांग्या पिउपे आद ॥११॥
सोई देख के आए ज्यों, फेर अब प्रगट हुए हैं त्यों । धनी जब करें अपन्यात, मनचाह्या सुख देवें साख्यात ॥१२॥
तिन समें धाख रहीती जोए, अब इत सुख देत हैं सोए । अब सुनो पिउ कहूं गुन अपने, अवगुन मेरे हैं अति घने ॥१३॥
तुमारे मन में न आवे लवलेस, पर मैं जानों मेरे मन के रेस । वार डारों तुम पर मेरी देह, तुम किए मोसों अधिक सनेह ॥१४॥
घोली घोली मैं जाऊं तुम पर, उरिनी मैं होऊंगी क्यों कर । उरिनी होना तो मैं कह्या, माया लेस हिरदे में रह्या ॥१५॥
अनेक बार मैं लेऊं वारने, तुम अपनी जान गुन किए घने । मैं वार डारूं आतम अपनी, पर सालत सोई जो करी दुस्मनी ॥१६॥
क्यों छूटोंगी ए गुन्हे हो नाथ, सांची कहूं मेरे धाम के साथ । तुम साथ मिने मोहे देत बड़ाई, पर मैं क्यों छूटोंगी बज्रलेपाई ॥१७॥
तुम गुन किए मोसों अति घन, पर अलेखे मेरे अवगुन । तुम गुन किए मोसों पेहेचान कर, मैं अवगुन किए माया चित धर ॥१८॥
अब बल बल जाऊं मेरे धनी, मेरे मन में हाम है घनी । असत मंडल में हासल अति बड़ी, मैं पिउजी की उमेद ले खड़ी ॥१९॥
जो मनोरथ किए मांहें श्रीधाम, सो पूरन इत होए मन काम । जो बिध सारी कही है तुम, सो सब द्रढ़ करी चाहिए हम ॥२०॥
सुख धाम के जो पाइए इत, सो काहूं मेरी आतम न देखे कित । इन अंग की जुबां किन बिध कहे, जो सुख कहूं सो उरे रहे ॥२१॥
ए सोभा सब्दातीत है घनी, और सब्द में जुबां आपनी । ए सुख विलसूं होए निरदोस, होए फेरा सुफल दया तुम जोस ॥२२॥
इतने मनोरथ होंए पूरन, तब जानों दया हुई अति घन । फेर फेर दया को तो कह्या घना, जो कर न सकी कछू बस आप अपना ॥२३॥
अब मनसा वाचा करमना कर, क्योंए ना छोडूं अखंड घर । नैनों निरखूं करी निरमल चित, रूदे राखूं पिउ प्रेमें हित ॥२४॥
कर परनाम लागूं चरने, करूं सेवा प्यार अति घने । करूं दंडवत जीव के मन, देऊं प्रदखिना रात ने दिन ॥२५॥
कृपा करत हो साथ पर बड़ी, भी अधिक कीजो घड़ी घड़ी । इंद्रावती पांउ परत आधार, धनी धाम के लई मेरी सार ॥२६॥
॥ प्रकरण ॥१०॥ चौपाई ॥२४९॥
