प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ११
आपन में बैठे आधार, खेल देखाया खोल के द्वार । अब माया कोटान कोट करे प्रकार, तो इत साथ को न छोडूं निरधार ॥१॥
बुलाए सैयों को चले वतन, क्यों न होए जो कहे वचन । मन के मनोरथ पूरन कर, नेहेचे धनी ले चलसी घर ॥२॥
अब जो आपन होइए सनमुख, तो धनी बोहोत विध पावें सुख । कई विध दया साथ पर कर, सब विध के सुख देवें फेर ॥३॥
फेर कर भलो आयो अवसर, खुले भाग धनी चित में धर । आपन छोड़ने न करें संसार, पर धनी धाम बिछोहा न सहे लगार ॥४॥
बिछोहा नहीं कछू पख तारतम, सुपन में माया देखें हम । सुपन बिछोहा धनी ना सहे, तारतम वचन प्रगट कहे ॥५॥
ल्याए वचन तारतम सार, खोले पार के पार द्वार । जानों जिन आसंका रहे, साथ ऊपर धनी एता ना सहे ॥६॥
धनी के गुन मैं केते कहूं, मैं अबूझ कछू बोहोत ना लहूं । धनी के गुन को नाहीं पार, कर ना सके कोई निरवार ॥७॥
मैं केते नजरों देखे सही, पर गुन मुखसे न सके कही । ना कछू किनका भोम गिनाए, सागर लेहेरें गिनी न जाए ॥८॥
मेघ की बूंदे जेती परे, ना कोई वनस्पति निरमान करे । जदिप याको निरमान होए, पर गुन धनीके ना गिने कोए ॥९॥
इन बेर के भी कहे न जाए, तो और बेर के क्यों कहूं जुबांए । पेहेले फेरे की क्यों कहूं बात, गुन जो किए धनी साख्यात ॥१०॥
क्यों धनी गुन गिनूं इन आकार, पर कछुक तो गिनना निरधार । इंद्रावती कहें मैं गुन गिनों, कछुक प्रकासूं आपोपनों ॥११॥
॥ प्रकरण ॥११॥ चौपाई ॥२६०॥
