प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण १२
श्री धनीजी के गुन
मैं लिखूं श्री धनीजी के गुन, जो रे किए मोसों अति घन । जोजन पचास कोट जिमी केहेलाए, आड़ी टेढ़ी खड़ी सब मांहें ॥१॥
चौदे लोक बैकुंठ सुंन जोए, जिमी बराबर करूं सोए । मैं प्रगट बिछाए करूं एक ठौर, टेढ़ी टाल करूं सीधी दोर ॥२॥
कागद धरयो मैं याको नाम, गुन लिखने मेरे धनी श्रीधाम । चौदे भवनकी लेऊं वनराए, तिनकी कलमें मेरे हाथ गढ़ाए ॥३॥
गढ़ते सरफा करूं अति घन, जानों बड़ी छोही उतरे जिन । ए सरफा मैं फेर फेर करूं, अखंड धनी गुन हिरदे धरूं ॥४॥
बारीक टांक मेरे हाथों होए, ऐसी करूं जैसी करे न कोए । कोई तो केहेती हों जो माया लागी तुम, बोहोतक कह्या जो पेहेले हम ॥५॥
तुमको माया लागी होए सत, तुम बिना और सबे असत । इन जिमी ऊपर के लेऊं सब जल, और लेऊं सात पाताल के तल ॥६॥
जल छे लोक के लेऊं लिखनहारी, एक बूंद ना छोडूं कहूं न्यारी । सब जल मिलाए लेऊं मेरे हाथ, गुन लिखने मेरे श्री प्राणनाथ ॥७॥
बाकी स्याही करूं मैं अति विगत, एक जरा न जाए समारूं इन जुगत । ए कागद कलम मस कर, मांहें बारीक आंक लिखूं चित धर ॥८॥
गुन जो किए पिउ तुम इत आए, सो इन जुबां मैं कहे न जाए । देह माफक मैं लिखूं परमान, एक पाओ लवे का काढूं निरमान ॥९॥
अब लिखती हूं साथ देखियो उजास, मैं गजे माफक करूं प्रकास । मैं बोहोत सकोडूं आंक लिखते ए, जिन जानों मींडे होंए बड़े ॥१०॥
प्रथम एकड़ा करूं एक चित, लगता मींडा धरूं भिलत । मेरे हाथ अखर कुसादे न होए, मैं डरूं जानों मिले न दोए ॥११॥
यों करते ए दस जो भए, मींडा धरके एक सौ कहे । भी एक धरके गिनूं हजार, धनी गुन दया को नाहीं पार ॥१२॥
भी लगता मींडा धरूं एक, जीवसे गिनूं दस हजार विसेक । भी एक धरके लाख गिनाए, भी धरूं ज्यों दस लाख हो जाए ॥१३॥
कोट होवे मींडा धरते सातमां, दस कोट करूं मींडा धरके आठमां । नवमां धरके करूं अबज, गुन गिनती जाऊं करती कबज ॥१४॥
दस धरके करूं अबज दस, गुन गिनते आवे मोहे अति घनो रस । अग्यारे धरके करूं खरब एक, लिखते गुन धनी ग्रहूं विसेक ॥१५॥
बारे धरके दस करूं खरब, पेहेले यों गिनके किन कहे न कब । तारतम कहे और कौन गिने गुन, हुआ न कोई होसी हम बिन ॥१६॥
मैं गुन गिनूं श्रीधामधनी के रे, पर कमी कागद कलम मस मेरे । कमी तो केहेती हूं जो बैठी माया मांहें, ना तो कमी नहीं कछुए क्यांहें ॥१७॥
साथ कारन मैं करूं पुकार, देखों वासना मोहजल वार पार । तेरह धरके गिनूं गुन नील, घने समावें गुन हिरदे असील ॥१८॥
चौदे धरके करूं नील दस, गुन प्रकास लेऊं धनी जस । पंद्रे धरके करूं पदम, मेरे धनी के गुनकी मैं करूँ गम ॥१९॥
सोले धरके करूं पदम दस, गुन नजरों आवते हुए धनी बस । सत्रे धरके करूं गुन अंक, अठारे धरूं ज्यों होंए गुन संक ॥२०॥
सुरिता करूं धरके उनईस, पत गुन ग्रहूं धरके बीस । अंत करूं धरके इकैस, मध करूं गुन दोए धर बीस ॥२१॥
एकड़ा ऊपर तेईस मींडे धरूं, प्रारध करके लेखा मेरा करूं । लौकिक लेखे गुन न गिनाए, मेरे धनी के गुन यों गिने न जाए ॥२२॥
हिसाब करूं साथ देखियो विचार, गुन जाहेर हुए प्राणके आधार । प्रारध गुने एक मींडेसों बढ़े, दूजे सों हर एक यों चढ़े ॥२३॥
यों करते ए होवें जेते, इन बिध चढ़ते जांए तेते । ए हिसाब मेरी आतमा करे, गुन धनी हिरदे अंतर धरे ॥२४॥
लिखते गुन धनी हिरदे आए, पर डरूं जानों कागद में न समाए । कलमों को मेरा जीव ललचाए, गढ़ते गढ़ते जानों जिन उतर जाए ॥२५॥
सरफा करूं मैं लिखते स्याही, जिन लिखते अधबीच घट जाई । यों धरते धरते मींडे रहे भराए, वार किनार सब रहे समाए ॥२६॥
ए कागद यों पूरन भया सही, स्याही कलमें कछू बाकी न रही । अब ए गुन गिनूं मैं नीके कर, आतम के अंदर ले धर ॥२७॥
ए तो गुन गिने मैं चित ल्याए, पर इन धनी के गुन यामें न समाए । भी करूं दूजे लिखने के ठाम, गुन लिखने मेरे धनी श्रीधाम ॥२८॥
ए गुन मिल जमें भए जेते, या बिध ऐसे कागद लिखे एते । ऐसे कागद ऐसी स्याही कलम, मांहें बारीक आंक लिखे हैं हम ॥२९॥
इन कलमों की मैं देखी अनी, कछू कर न सकी बारीक घनी । ए गुन गिन मैं एकठे किए, सो अपने हिरदे में लिए ॥३०॥
कलमें समारी जोस बुध बल, घडूं रास कर काढ़ के बल । एक जीव कहियत है कथुआ, ए जो जिमी पर पैदा हुआ ॥३१॥
कथुए के पांउ का गुन जेता भाग, कलमों की टांक मैं देखी चीर लाग । इन अनियों आंक लिखे यों कर, ए जेता कागद एती बेर फेर फेर ॥३२॥
यों लिख लिख के मैं गिने गुन, पर मेरे धनी के गुन हैं अति घन । ए गुन मिलाए के एकठे किए, सो नीके कर मैं चित में लिए ॥३३॥
ए लिखते मोहे केती बेर भई, तिनका निरमान काढ़ना सही । जेते मिल के भए ए गुन, तेते बांटे किए एक खिन ॥३४॥
बेर भई एक बांटे जेती, ए सब कागद लिखे मांहें बेर एती । ए लिख लिख के मैं लिखे अपार, अब ए बेर निरने करूं निरधार ॥३५॥
गुन जेते महाप्रले भए, वाही जोस में लिख गुन कहे । बीच में स्वांस न खाया एक, ढील ना करी कछू लिखते विसेक ॥३६॥
एह जमें मैं गुन की कही, श्रीसुंदरबाईऐं सिखापन दई । साथ जाने लेखा जोर किया अपार, पर मेरे जीव के दरद की न दबी किनार ॥३७॥
जीव मेरा बड़ा वतनी पात्र, अजूं जीव जानें ए लिख्या तुछ मात्र । गुन तो बाकी भरे भंडार, सोई भंडार गुन गिनूं आधार ॥३८॥
ए गुन गिने मैं हिरदे विचार, गुन जेते भंडार गिने निरधार । गिनते गिनते बाकी देखे अपार, तिनका भी मैं करना निरवार ॥३९॥
मैं ना करूं तो दूजा करे कौन, कर निरवार ग्रहूं धनी के गुन । बाकी भंडार का लेखा देऊं मेरे पिउ, ए मुस्किल नहीं कछू मेरे जिउ ॥४०॥
ए गुन गिन किए जीवें अपने हाथ, पल पल पसरे गुन प्राणनाथ । ए सब तो कहूं जो गुन ठाढ़े रहे, ए गुन मन की न्यात दौड़े जाए ॥४१॥
अब एता तो मैं किया निरमान, और बाकी कहूंगी मांहें फुरमान । एक खिन के मैं बांटे किए, गुन जेते भाग विचार के लिए ॥४२॥
तामें बेर एक बांटे की कही, पिया गुन एते में तेते किए सही । ए गुन गिनते मेरा कारज सरया, आतम मूल सरूप हिरदे में धरया ॥४३॥
सारे जनमके क्यों कहूं गुन, पिया देह धर आए किए धंन धंन । गुन पांच जनम के क्यों कहूं सोय, धनी दया आई धनी की खुसबोए ॥४४॥
ए गुन गिने मैं अस्थिर आकार, ना तो यों क्यों गिनूं मेरे प्राण के आधार । अब बात करसी तुम अग्या केरी, मुझे आसा इत जाग उड़ाऊं अंधेरी ॥४५॥
पिउ तुम आए माया देह धर, साथकी मत फिर गई क्यों कर । हांसी करसी पिउ साथ पर, क्या करसी माया जब मांगी घर ॥४६॥
तुम लई खबर हमारी ततखिन, ले आए तारतम देखाया वतन । पिया हांसी करसी अति जोर, भुलाए मायाऐं कर बैठाए चोर ॥४७॥
अब करेंगे जाए वतन बात, माया अमल चढ़यो निघात । पिउ कई विध तारतम कियो रोसन, तो भी क्योंए न भैयां चेतन ॥४८॥
लेवे इंद्रावती वारने गुन जेते, इत सुख दिए हमको एते । घर के सुख की इत कैसी बात, घर के सुख घरों होसी विख्यात ॥४९॥
चरनों लाग कहें इंद्रावती, गुन न देखे किन एक रती । धनी जगाए के देखावसी गुन, तब हांसी होसी अति घन ॥५०॥
॥ प्रकरण ॥१२॥ चौपाई ॥३१०॥
