प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण १३
साथ को सिखापन
सुनो साथ मेरे सिरदार, वचन कहूं सो ग्रहो निरधार । एते गुन आपनसों कर, बैठे आपन में माया देह धर ॥१॥
भानो भरम वचन देख कर, छोड़ो नींद रोसनी हिरदे धर । श्री धाम के धनी केहेलाए, सो बैठे आपन में इत आए ॥२॥
सेवा कीजे पेहेचान चित धर, कारन अपने आए फेर । भी अवसर आयो है हाथ, चेतन कर दिए प्राणनाथ ॥३॥
इन ऊपर और कहा कहूं, मैं श्रीधनीजी के चरने रहूं । कर जोड़ करूं विनती, दूर ना होऊं बेर पाओ पल जेती ॥४॥
॥ प्रकरण ॥१३॥ चौपाई ॥३१४॥
