प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण १४
जीव को सिखापन
मेरे अंध अभागी जीव, तूं क्यों सूता इत । बिध बिध धनिऐं जगाइया, अजहूं ना घर सूझत ॥१॥
आगे भी तें कहा कियो, चल गए पिउ जब । अवगुन ना देखे अपने, पिउ मेहेर करी फेर अब ॥२॥
धाम धनी तुझ कारने, आए माया में दोए बेर । मेहेर ना देखे पिउ की, ऐसो हिरदे निपट अंधेर ॥३॥
आप पकड़ तूं अपना, बल कर आंखां खोल । दूध पानी दोऊ जाहेर, देख नीके तारतम बोल ॥४॥
पेहेले तो आंखां फूटियां, अब तो कछुक संभाल । ए जासी अवसर हाथ से, पीछे होसी कौन हवाल ॥५॥
आगे उलटा हुआ अकरमी, अजहूं ना करे कछु सुध । जागत नहीं क्यों जोर कर, ले हिरदे मूल बुध ॥६॥
पुकार सुनी दोऊ पिउ की, वतन देखाया नजर । उठी ना अंग मरोर के, अब आई नजीक फजर ॥७॥
तारतम देख विचार के, पिउ ल्याए बेर दोए । एती आग सिर पर जली, तूं रह्या खांगडू होए ॥८॥
॥ प्रकरण ॥१४॥ चौपाई ॥३२२॥
