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प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण १५

मेरे जीव अभागी रे, जिन भूले तूं अब । इन मोहजल से काढ़न वाला, ऐसा ना मिलसी कोई कब ॥१॥

ए गुन तूं याद कर, जो किए अनेक सजन । तूं क्यों सूता जीव अभागी, देकर साहेबी मन ॥२॥

पेहेले तें काढ़े वचन, सो क्या मन की दोर । बुध मन तेरे बैठे रेहेसी, जीव को क्रोध काढ़सी जोर ॥३॥

जीव तूं क्यों होत है निलज, तोहे अजूं ना लगे घाए । याद करके पिउ को, क्यों ना उड़े अरवाए ॥४॥

जो अब जीवरा भूलसी, तो देखी तेरी बिध । काढूंगी तुझे जोरसे, करके बुरी सनंध ॥५॥

पेहेले तो तें बुरी करी, अब जिन चूके अवसर । पिउ तोकों वतन में, बुलावत हैं हंसकर ॥६॥

ससुई सो भी यों कहे, मैं हाथों अपना मार । पुनों की बधाई में, देऊं कोट सिर उतार ॥७॥

क्यों ना देखे ए वचन, भट परो मेरे जिउ । तूं लेत निमूना किनका, तूं कौन कौन तेरा पिउ ॥८॥

दुनियां चौदे भवन में, जो देखिए मूल अर्थ । जो लेवे तेरा निमूना, ऐसा ना कोई समरथ ॥९॥

तूं निमूना माया जीव का, क्यों कर लेवे इत । ए दाग तेरा क्यों छूटहीं, ए तुझे लाग्या जित ॥१०॥

अजूं सुध तोको न होत, तेरी क्यों हुई ऐसी रसम । याद कर अपना वतन, जो तें सुनी बात खसम ॥११॥

तूं भूल जात क्यों वचन, जो श्रीधाम धनी कहे आप । एक आधा सुकन विचारते, तो पलक न छोड़े मिलाप ॥१२॥

तोको कहूं अभागी अकरमी, जो जाग्या ना एते सोर । सात बेर तोको कहूं सोहागी, जो तूं उठे अंग मरोर ॥१३॥

॥ प्रकरण ॥१५॥ चौपाई ॥३३५॥

इसी सन्दर्भ में देखें-