प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण १७
मेरे साथ सोहागी रे, पिउसों क्यों न करो पेहेचान । पेहेले चले पेहेचान बिना, फेर आए सो अपनी जान ॥१॥
सोई पिउ सोई बातड़ी, फेर सोई करे पुकार । कारन अपने पिउ को, आंखों आवे जलधार ॥२॥
सोई नसीहत देत सजन, खैंचत तरफ वतन । पिउ पुकारें बेर दूसरी, अब क्यों होंए पीछे आपन ॥३॥
सोई कूकां करे पेहेले की, सो क्यों न समझो बात । न तो दिन उजाले खरे दो पोहोरे, अब हो जासी रात ॥४॥
फेर पटकोगे हाथड़े, और छाती देओगे घाउ । चल जासी पिउ हाथ से, फेर न पाओगे दाउ ॥५॥
विलख विलख कहे वचन, रोए रोए किए बयान । प्रेम करे अति प्रीतसों, पर साथ को सुध न सान ॥६॥
माया देखी बीच पैठ के, पिउ के उजाले तुम । विध विध खेल देखावने, पिउ ल्याए तारतम ॥७॥
ए जो मांगी तुम माया, सो देखे तीन संसार । अब साथ पिउ संग चलिए, ज्यों पिउ पावें करार ॥८॥
पिउ पांच बेर हम वास्ते, सागर में डारया आप । सो नजरों न आवे प्रेम बिना, बिना मेहेर या मिलाप ॥९॥
भले देखो तुम आकार को, पर देखो अंदर का तेज । धनी धाम के साथसों, कैसा करत हैं हेज ॥१०॥
अब कैसी विध करूं तुमसों, कछू ना पेहेचाने सजन । सोर हुआ एता तुम पर, क्यों आवे नींद आंखन ॥११॥
ना गई नींद अंदर की, क्यों एते बान सहे । जाग चलो संग पिउ के, पीछे करोगे कहा रहे ॥१२॥
तुमें धनी बिना कौन दूसरा, ए उड़ावे अंधेर । तुम देखो साथ विचार के, जिन भूलो इन बेर ॥१३॥
एक बेर भूले आदमी, ताए और बेर आवे बुध । ए चोटां सहियां सिर एतियां, तो भी ना हुई तुमें सुध ॥१४॥
अब ढील ना कीजे एक पल, इत नाहीं बैठन का लाग । एक पलक के कोटमें हिसे, हो जासी बड़ा अभाग ॥१५॥
कहूं गुसा कर वचन, सो ना वले मेरी जुबांए । पर इत नफा क्या होएसी, तुम रहे माया लगाए ॥१६॥
टेढ़े सुकन तुमे कहूं, सो काट करूं जुबां दूर । पर इन मायाका तुमको, कहा होसी रोसन नूर ॥१७॥
ना पेहेचाने इन उजाले, ए दोए साख पूरन । पीछे पिउ आगे वतन में, क्यों होसी मुख रोसन ॥१८॥
पेहेले नजरों देखते, गयो अवसर टूटी आस । निकस गए जब हाथ से, तब आपन भए निरास ॥१९॥
ए ठौर ऐसा विखम, नास होए मिने खिन । स्याने हो तुम साथजी, सब चतुर वचिखिन ॥२०॥
तुम स्याने मेरे साथजी, जिन रहो विखे रस लाग । पांउ पकड़ कहे इंद्रावती, उठ खड़े रहो जाग ॥२१॥
॥ प्रकरण ॥१७॥ चौपाई ॥३६२॥
