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प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण १८

श्री धनीजी के लागूं पाए, मेरे पिउजी फेरा सुफल हो जाए । ज्यों पिउ ओलखाए मेरे पिउजी, सुनियो हो प्यारे मेरी विनती ॥१॥

मैं पेहेले ना पेहेचाने श्री राज, मोहे आड़ी भई माया की लाज । भवसागर की किने पाई न किनार, सो तुम सेहेजे उतारे पार ॥२॥

तुम अपनी जान दया कर, धनी लेवे त्यों लई खबर । माया गम सास्त्रों मांहें, सो त्रिगुन भी समझत नाहें ॥३॥

सो तारतम केहे करी रोसन, और देवाई साख सास्त्रों वचन । हम मांग लई जो माया, सो पेहेचान के खेल देखाया ॥४॥

उमेद करी जो सैयन, सो इत आए करी पूरन । तुम उमेद करते मने किए, तो भी खेल देखाए सुख दिए ॥५॥

हमको खेल देखन की लागी रढ, सो इत आए देखाई कर मन द्रढ । तुम हमको खेल देखावन काज, हमसों आगे आए श्री राज ॥६॥

तुम बिना लाड़ पूरन कौन करे, इन माया में दूजी बेर देह कौन धरे । तुम मोसों गुन किए अनेक, सो चुभे मेरे हिरदे में लेख ॥७॥

तुम पर वार डारूं जीवसो देह, तुम किए मोसों अधिक सनेह । मैं वारने लेऊं तुम पर, मैं सुरखरू होऊंगी क्यों कर ॥८॥

तुम हो हमारे धनी, तो पूरी आसा लाख गुनी । इंद्रावती चरनों लागे, कृपा करो तो जागी जागे ॥९॥

॥ प्रकरण ॥१८॥ चौपाई ॥३७१॥

इसी सन्दर्भ में देखें-