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विषय-सूची

प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण १९

अखंड दंडवत करूं परनाम, हैड़े भीड़के भानूं हाम । प्रेमें देऊं प्रदखिना, बेर बेर अनेक अति घना ॥१॥

बल बल जाऊं मुखारके बिंद, वरनन करूं सरूप सनंध । वारने जाऊं नैंनों पर, देखत हो सीतल द्रष्ट कर ॥२॥

वारने ऊपर लेऊं वारने, सुख दिए मोको अति घने । बेर बेर मैं लागूं पाए, सेवा करूं हिरदे चित ल्याए ॥३॥

वार फेर डारूं मेरी देह, इंद्रावती कहे अधिक सनेह । बोहोत अस्तुत मैं जाए ना कही, अपने घर की बात जो भई ॥४॥

अपनी बड़ाई आप मुख होए, ताको मूरख कहे सब कोए । पर जैसी बात तैसा बरनन, करसी विचार चतुर अति घन ॥५॥

वचन धनी के कहे परवान, प्रगट लीला होसी निरवान । चौदे भवन का कहिए सूर, रास प्रकास उदे हुआ नूर ॥६॥

चौदे भवन में जोत न समाए, ए नूर किरना किने पकड़ी न जाए । सब्दातीत ब्रह्मांड किए प्रकास, देखसी साथ एह उजास ॥७॥

प्रकास के वचन निरधार, वचन सब करसी विचार । आगे बड़ो होसी विस्तार, अखंड सब होसी संसार ॥८॥

इन लीला को करसी विचार, क्या करसी ताको संसार । प्रगट नीउ बांधी है एह, बड़ी इमारत होसी जेह ॥९॥

सुनो वचन ब्रह्मसृष्टी जाग, इंद्रावती कहे चरनों लाग । ए बानी मेरे धनिऐं कही, फेर फेर तुमको कृपा भई ॥१०॥

ऐसा पकव प्रवीन ना कछू हूं, तो सिखापन तुमको क्यों देऊं । मैं मन में यों जान्या सही, जीव अपना समझाऊं रही ॥११॥

पर साथ ऊपर दया अति घनी, फेर फेर कृपा करत हैं धनी । तो वचन तुमको कहे जांए, ना तो चींटी मुख कुम्हड़ा न समाए ॥१२॥

जिन तुम वचन विसारो एक, कारन साथ कहे विसेक । वचन कहे हैं कीजो त्यों, आपन पेहेले पांउ भरे हैं ज्यों ॥१३॥

फेर अवसर आयो है हाथ, चरने लाग केहेती हूं साथ । अब चरने लागूं धनी चितधरी, तुम खबर मेरी भली बिध करी ॥१४॥

ए माया बोहोत जोरावर हती, दूर करी मेरे प्राणपति । माया को तजारक भई, तिन कारन ए विनती कही ॥१५॥

ए विनती सुनियो तुम सार, माया दुख पायो निरधार । ए माया बातें हैं अति घनी, मोहे मुखथें काढ़ी मेरे धनी ॥१६॥

तुमारे गुन की कहा कहूं बात, तुम लाड़ पूरे करके अपन्यात । पिउ ने अपनी जानी परवान, इंद्रावती चरने राखी निरवान ॥१७॥

श्री सुंदरबाई के चरन पसाए, मूल वचन हिरदे चढ़ आए । चरन फले निध आई एह, अब ना छोडूं चित चरन सनेह ॥१८॥

चरन तले कियो निवास, इंद्रावती गावे प्रकास । भान के भरम कियो उजास, पावे फल कारन विस्वास ॥१९॥

विस्वास करके दौड़े जे, तारतम को फल सोई ले । तिन कारन करों प्रकास, ब्रह्मसृष्टी पूरन करूं आस ॥२०॥

इंद्रावती धनी के पास, रास को कियो प्रकास । धनिऐं दई मोहे जाग्रत बुध, तो प्रकास करूं तारतम की निध ॥२१॥

॥ प्रकरण ॥१९॥ चौपाई ॥३९२॥

इसी सन्दर्भ में देखें-