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प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण २

साथ को प्रबोध - राग धनाश्री

याद करो तुम साथ जी, हाथ आयो अवसर जी । आप डारया ज्यों पेहेले फेरे, भी डारियो निसंक फेर जी ॥१॥

सुंदरबाई इन फेरे, आए हैं साथ कारन जी । भेजे धनिऐं आवेस देय के, अब न्यारे न होऐं एक खिन जी ॥२॥

सुपने में भी खिन ना छोड़ें, तो क्यों छोड़ें साख्यात जी । दया देखो पिउजी की हिरदे मांहें, विध विध की विख्यात जी ॥३॥

ऐसी बात करे रे पिउजी, पर ना कछू साथ को सुध जी । नींद उड़ाए जो देखिए आपन, तो आए हैं आप ले निध जी ॥४॥

सुपने में मनोरथ किए, तो तित भी पिउजी साथ जी । सुंदरबाई ले आवेस धनी को, न छोड़े अपना हाथ जी ॥५॥

धनी न देवें दुख तिल जेता, जो देखिए वचन विचारी जी । दुख आपन को तो जो होत है, जो माया करत हैं भारी जी ॥६॥

अंतरध्यान समें दुख दिए, ए आसंका उपजत जी । तिन समें संसार न किया भारी, साथें दुख देखे क्यों तित जी ॥७॥

दुख तो क्यों ए न देवे रे पिउजी, ए विचार के संसे खोइए जी । ए याद वचन तो आवे रे सखियो, जो माया छोड़ते घनों रोइए जी ॥८॥

खेल याद देने को मेरे पिउजी, दुख दिए अति घनें जी । साथें मनोरथ एह जो किए, धनिऐं राखे मन आपनें जी ॥९॥

आपन माया की होंस जो करी, और माया तो दुख निधान जी । सो याद देने को रे साथ जी, पिउ भए अंतरध्यान जी ॥१०॥

नातो ए अपना रे पिउजी, अधखिन बिछोहा न सहे जी । एह विचार जो देखिए साथजी, तो तारतम प्रगट कहे जी ॥११॥

इन समे तारतम की समझन, क्योंकर कहिए सोए जी । अनेक विध का तारतम इत, तब घर लीला प्रगट होए जी ॥१२॥

पेहेचानवे को पिउजी अपना, करूं तारतम विचार जी । साथ सकल तुम लीजो दिल में, न रहे संसे लगार जी ॥१३॥

पेहेली बेर तहां ए निध न हुती, तारतम जोत रोसन जी । तो ए फेरा हुआ रे साथ को, तुम देखो विचारी मन जी ॥१४॥

आसंका न रहे किसी की, जो कीजे तारतम विचार जी । सो रोसनाई ले तारतम की, आए आपन में आधार जी ॥१५॥

अब इन उजाले जो न पेहेचानो, तो आपन बड़े गुन्हेगार जी । चरने लाग कहे इंद्रावती, पिउजी के गुन अपार जी ॥१६॥

॥ प्रकरण ॥२॥ चौपाई ॥२१॥

इसी सन्दर्भ में देखें-