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प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण २०

अस्तुत कर गुन फिराए हैं

अब करूं अस्तुत आधार, वल्‍लभ सुनो विनती । एते दिन मैं ना पेहेचाने, मोहे लेहेर माया जोर हुती ॥१॥

भानूं भरम मोह जो मूलको, लेऊं सो जीव जगाए । करूं अस्तुत पियाकी प्रगट, देऊं सो पट उड़ाए ॥२॥

सोभा पिउ की सब्दातीत, सो आवत नहीं जुबांए । जोगवाई जेती इन अंग की, सो सब मूल प्रकृती मांहें ॥३॥

अब किन बिध करूं मैं अस्तुत, मेरे जीव को ना कछू बल । जीव जोगवाई सब अस्थिर की, क्यों बरनों सोभा नेहेचल ॥४॥

पेहेले जीवों करी अस्तुत, भली भांत भगवान । पंडिताई चतुराई महाप्रवीनी, किव कर हिरदे आन ॥५॥

ए किव प्रवाही जब देखिए, तामे कोई कोई भारी वचन । ए तो देवें सोभा अचेत में, पर मोहे सालत है मन ॥६॥

बेसुध भए देवे एती सोभा, तो कहा करे कर पेहेचान । जो मुख वचन एक कहों प्रवाही, तो सुन्या नहीं निरवान ॥७॥

न कछू सुनिया वेद पुरान, न कछू किव चातुरी । एक दोए वचन सुने मुख धनी के, तिनसे सुध सब परी ॥८॥

सो भी ना सुन्या चित देयके, न तो जोर गया पूर चल । पर जो रे गुन आड़े माया के, ताथें ले न सकी बूंद जल ॥९॥

अब तिन गुन को कहा दीजे उपमा, धिक धिक पड़ो ए बुध । आगे तूं सिरदार सबन के, तें क्यों न लई ए निध ॥१०॥

अब जागी बुध कहूं मैं तोको, तूं है बुध को अवतार । कर निरने तूं माया ब्रह्म को, खोल तूं पार द्वार ॥११॥

और न कोई बुध मुझ जैसी, मैं ही बुध अवतार । धाम धनी ग्रहूं इन विध, और अखंड करूं संसार ॥१२॥

ए बुध रही हमारे आसरे, जो सब थें बड़ा अवतार । बुधजी बिना माया ब्रह्म को, कोई कर न सके निरवार ॥१३॥

सुन्य निराकार निरंजन, तिनके पार के पार । बानी गाऊं तित पोहोंच के, इन चरनों बुध बलिहार ॥१४॥

जो नहीं विष्णु महाविष्णु को, बुधजी पोहोंचे तित । मेरे हिरदे चरन धनी के, इने ए फल पाया इत ॥१५॥

ए सार पाए सुख उपजे, धंन धंन ए बुध अवतार । अबलों किन ब्रह्मांड में, किन खोल्या न ए दरबार ॥१६॥

लीला इन अवतार की, करसी सब अखंड । धंन धंन इन अवतार की, वानी गासी सब ब्रह्मांड ॥१७॥

अब कहूं तोको श्रवना, तोको धनिए कहे वचन । क्यों न लई बानी वचिखिन, फिट फिट भूंडे करन ॥१८॥

मेरे तो मुदा तुम ऊपर, लेना तुमारे जोर । धनिएं तो धन बोहोतक दिया, पर तें लिया न हरामखोर ॥१९॥

अब अपना तूं संभार श्रवना, हो वचिखिन वीर । वानी जो वल्‍लभ की, सो लीजो द्रढ़ कर धीर ॥२०॥

श्रवना कहे सुने मैं नीके, विध विध के वचन । पूरी पिउ ने आस हमारी, उपज्यो आनंद घन ॥२१॥

अब वचन लेऊं सब सार के, भी यों कहे श्रवन । इन बिध बानी ग्रहूं मैं प्यारी, ज्यों सब कोई कहे धंन धंन ॥२२॥

बेसुध नींद कहूं मैं तोको, तूं निठुर नीच निरधार । हुई तूं सब गुन के आड़े, ना लेने दई निध आधार ॥२३॥

तूं तो माया रूप पापनी, तें डबोई ले कर बाथ । तें श्रवना को सुनने ना दिया, आलस जम्हाई तेरे साथ ॥२४॥

अनेक अंधेर दई तें जीव को, ज्यों मीन बांधे मांहें जाल । जिन नैनों निध निरखूं निर्मल, तिन नैनों आड़ी भई पाल ॥२५॥

फिट फिट भूंडी दुष्ट पापनी, तोको दई अनेक धिकार । पेहेले अवसर गमाईया, अब नीके निरखो भरतार ॥२६॥

तूं करत मृतक समान, ऐसी निपट निखर । अब तूं आओ आड़ी माया के, ज्यों निरखूं धनी निज घर ॥२७॥

नींद कहे आतम जब जागी, तब क्यों रह्यो मैं जाए । नींद कहे मैं जात हों, लागूं तुमारे पाए ॥२८॥

अब आई तूं अरुचड़ी, जब मिले मोहे श्री राज । ऐसी अंधी अकरमन, तूं सरजी किस काज ॥२९॥

फिट फिट भूंडी तें भुलाई, अब कर कछू बल । आतम दृष्ट जुड़ी परआतम, हो माया मांहें नेहेचल ॥३०॥

अरूचड़ी कहे मैं बलवंती, मोको न जाने कोए । छानी होए के बैठूं जीव में, भानूं सो साजा न होए ॥३१॥

धनी अपना जब आप संभारे, तब चोरी करे क्यों चोर । अब उलटाए करूं मैं सीधा, बैठों माया में जोर ॥३२॥

तलबे सेवा करूं सब अंगों, मोहे मिले धनी एकांत । तिन समें आए बैठी अंग में, फिट फिट भूंडी स्वांत ॥३३॥

धनी मिले स्वांत न कीजे, क्यों बैठिए करार । जाग दौड़ कीजे सब अंगों, स्वांत कीजे संसार ॥३४॥

स्वांत कहे मैं तबलो थी, जोलो नींद हुती आतम । अब मैं बैठी तरफ माया के, विलसो अपना खसम ॥३५॥

अब कहूं तोको लोभ लालची, फिट फिट मूरख अजान । लोभ न लाग्या चरन धनी के, जासों पाईए घर निरवान ॥३६॥

अब जिन जाओ तरफ माया के, मेरे लोभ लालच दोऊ जोड़ । जोर पकड़ो दोऊ पाउं पिउ के, करो रात दिन दौड़ ॥३७॥

कहे लोभ लालच क्या गुनाह हमारा, जोलो जीव ना करे खबर । अब तुम पिउ देखाया हमको, तो देखो पिउ ग्रहें द्रढ़ कर ॥३८॥

भट परो तृष्णा कहूं तोको, तूं निपट निठुर निरधार । और सबे गुन तृपत होवें, पर तो में कोई भूख भंडार ॥३९॥

अब तोको क्यों काढूं रे तृष्णा, तोसों बड़ा मोहे काम । तृष्णा लाग तूं पूरन पिउसों, ज्यों बस करूं धनी श्री धाम ॥४०॥

तृष्णा कहे मैं क्योंए ना छोडूं, जो आतमाऐ देखाया आधार । तुम जाए गुन और फिराओ, मैं छोडूं नहीं निरधार ॥४१॥

मूरख मोह कहूं मैं तोको, जब आतम धनी घर आया । इन अवसर तूं चूक्या चंडाल, जाए बैठा मांहें माया ॥४२॥

अब आओ तूं वालाजी में, मायासों कर बिछोह । देखूं जोर करे तूं कैसा, सांचे सिपाही मेरे मोह ॥४३॥

बात बड़ी कहे मोह मेरी, मोको जाने प्रेमी सोए । मैं बैठत हों जित आए के, तितथें उठाए न सके कोए ॥४४॥

जो तुम धनी देखाया मोको, होए लागूं मूरख मूढ़ अंध । एकै विध है मेरी ऐसी, और न जानूं सनंध ॥४५॥

हरख सोक तुम भए माया के, धिक धिक तुमको अजान । आए धनी हरख न आया, चले सोक न आया निदान ॥४६॥

हरख सोक कहे हम निठुर, भए सो अंध अभागी । धनी बिगर करे कहा हम, जोलों जीव न कहे जागी ॥४७॥

अब तुम आओ नेहेचल सुख में, जिन भूलो अवसर । माया में लाहा लेऊं धनी का, हरख ले जागो घर ॥४८॥

हरख कहे मैं क्या करों, जो जीव को नहीं खबर । सोक कहे न पेहेचान पिउ की, तो बिछुरे जाने क्योंकर ॥४९॥

हरख सोक कहे हम बलिऐ, दोऊ जोधा बड़े जोरावर । अब पेहेचान करी तुम पिउ की, अब क्योंऐे न भूलों अवसर ॥५०॥

फिट फिट जोधा जोरावर तुमको, मद मत्सर अहंकार । तुम अंतराय करी धनीसों, दौड़ करी संसार ॥५१॥

तुम तीनों जोधा भए क्यों उलटे, भए माया के दास । जब जीवनजीं मिले जीवको, तब क्यों न कियो उलास ॥५२॥

अब तुम संगी हूजो मेरे, धनिऐं कियो मोसों मिलाप । सिर ल्‍यो सोभा धनी धामकी, दूर हो मायाथें आप ॥५३॥

तीनों जोधा बड़े जोरावर, हम तीनों की राह एक । धनी आतम से क्यों ए न छूटे, जो पड़े विघन अनेक ॥५४॥

सेहेजे सुभाव फिट फिट तुमको, ऐसे सूर सुभट । सांचे तुम हुए मायासों, मोसों मिले कपट ॥५५॥

मूरख मूढ़ करी तुम दुष्टाई, हुए नहीं स्वाम धरमी । मूरख मूढ़ करी तुम ऐसी, धिक धिक चंडाल अकरमी ॥५६॥

जोधा दोऊ जोरावर मेरे, तुम तरफ हो जिनकी । अनेक उपाय करे जो कोई, पर जीत होए तिनकी ॥५७॥

अब तुमको कहूं खीज के, तुम हूजो सावधान । प्रेमें पिउ रूदे लपटाओ, जिन करो किन की कान ॥५८॥

सेहेजे सुभाव दोऊ हम बलिए, कोई करे जो कोट उपाए । पकड़ें बात जो हम सांची, सो लोपी किनहूं न जाए ॥५९॥

अब देखियो जीव जोर हमारा, पिउ पकड़ देवें एकांत । पूरा पास देऊं रंग लाखी, सो क्योंए ना उचटे भांत ॥६०॥

ममता तूं भई माया की, हलाक किए हैरान । फिट फिट भूंड़ी चंडालन, तें बड़ी करी मोहे हान ॥६१॥

अब ममता आओ मेरे पिउ में, तोको पेहेले दई धिकार । अब संघातन हूजो मेरी, मोहे मिले पिउ सिरदार ॥६२॥

अब मैं चेरी हुई तुमारी, ले देऊं सांची निध । अब के ए निध क्योंए ना छूटे, करो कारज तुम सिध ॥६३॥

अब फिटकार देऊं कल्पना, उलटी तूं अकरमन । फिराए खाली करी फजीत, आतम को अति घन ॥६४॥

अब करमन तूं हो कल्पना, कर सेवा मांहें विचार । धाम धनी मोहे मिले माया में, लाभ लेऊं मांहें संसार ॥६५॥

कहे कल्पना ए काम मेरा, करूं नए नए अंग उतपन । बिध बिध की सेवा देखाऊं, धनी विलसो होए धंन धंन ॥६६॥

वैर राग तुम दोऊ जोधा, सूर साम सामे सिरदार । वैर किया तुम वल्लभजीसों, राग किया संसार ॥६७॥

बुरी करी तुम अति मोसों, अब मारूं जमधर घाव । अब अवसर फेर आयो मेरे, जो भुलाए दियो तुम दाव ॥६८॥

तुम पर मेरे है मुद्दार, ऐसी पीठ क्यों दीजे । आतम संग मिलाए धनीजी, धंन धंन मोहे कीजे ॥६९॥

जुध करो तुम दोऊ जोधा, राग आओ धनी धाम पाया । बिध बिध वैर कर कठनाई, जाए बैठो मांहें माया ॥७०॥

वैर राग कहे क्या गुनाह हमारा, जो जीव न राखे घर । जो न देखावे धनी विवेकें, तो हम पकड़ें क्यों कर ॥७१॥

राग कहे मैं भली भांते, पिउजीसों करों रस रीत । जीव धनी बीच अंतर टालू, गुन देऊं सारे जीत ॥७२॥

वैर कहे देखियो बिध मेरी, संग ना आवे संसार । कोई गुन जीवसों करे लड़ाई, तो मोको दीजो धिकार ॥७३॥

धिक धिक स्वाद कहूं मैं तोको, मोहे मिल्या था मीठा जीवन । सो ए स्वाद छोड़ अभागी, जाए पड़या संसार विघन ॥७४॥

अब तूं स्वाद हो सोहागी, ले धनी की मिठास । इन रंग रस आयो जब स्वाद, तब जेहेर होसी सब नास ॥७५॥

स्वाद कहे जब ए सुख आया, तब अभख हुआ मोहजल । झूठा रंग सब उड़ गया, रस रंग भया नेहेचल ॥७६॥

फिट फिट भूंडे दुष्ट अभागी, मोहे करायो धनीसों ब्रोध । मैं जान्या था सखा मेरा, पर तें कमल फिराया क्रोध ॥७७॥

आया नहीं माया के आड़े, तें किया न मेरा काम । अवसर आए चूक्या चंडाल, रेहे गई हैड़े में हाम ॥७८॥

अब क्रोध तूं कमल फिराओ, उलटाए दे संसार । जोधा जोरावर अब क्या देखे, कर दे जय जय कार ॥७९॥

क्रोध कहे मैं अति बलवंता, पर कया करूं धनी बिन । अब उलटाए देऊं कर सीधा, फेर कबहूं ना होवे दुस्मन ॥८०॥

अब तोको कहूं चाक चकरड़ा, तूं चढ़ बैठा जीव के सिर । तें खाली ऐसा फिराया, रेहे ना सके क्योंऐे थिर ॥८१॥

अंध अभागी क्यों हुआ ऐसा, तें क्या सुने न धनी के वचन । धनी मिले तूं थिर ना हुआ, फिट फिट भूंडे मन ॥८२॥

समरथ मन तूं बड़ा जोरावर, क्या कहूं तेरो विस्तार । तुझ में फैल बिध बिध के, अलेखे अपार ॥८३॥

तोसों तो काम बड़ा है मेरा, मद मस्त मेवार । फिर तूं पख पचीस मांहें, बलवंता बेसुमार ॥८४॥

संकल्प विकल्‍प है तुझमें, सेवा कर धनी धाम । उमंग अंग आन निसवासर, कर पूरन मन काम ॥८५॥

बात बड़ी कहे मन मेरी, मैं सकल विध जानों । मूल बिना करूं सिरदारी, जीव को भी बस आनों ॥८६॥

जोलों जीव जागे नहीं, तोलों कहा करें हम । जोर हमारा तबहीं चले, जब जाग बैठो तुम ॥८७॥

अब तुम बिध मेरी देखियो, सब बिध करूं रोसन । धाम धनी आन देऊं अंगमें, तो कहियो सिरदार सबन ॥८८॥

कोई जो कदर जाने मेरी, अंग अंदर आनूं वतन । अनेक विध सेवा उपजाऊं, धनी न्यारे न होवे खिन ॥८९॥

बुरी करी तुम भरम भ्रांतड़ी, यों न करे दूजा कोए । तारतम जोत उद्दोत के आगे, संसे कबूं ना होए ॥९०॥

संसे भ्रात के आकार, जो कदी होते तुमारे । टूक टूक करूं मैं तिल तिल, फेर फेर तीखी तरवारे ॥९१॥

अब जोर कर जाओ माया में, इनके संग होए तुम । उजाले तारतम के पेहेचान, ज्यों मूल सरूप देखें हम ॥९२॥

अंतर भ्रांत कहे तुम फेर फेर, मार मार देखाओ डर । नींद कर बैठे इन जिमी में, सो आप न करो खबर ॥९३॥

घर का धनी अखंड फल पावे, सो इत क्यों सोवे करारे । गफलत को न छोड़े आपे, फेर फेर हमको मारे ॥९४॥

अब इन तारतम के उजाले, करूं तारतम रोसन । नेहेचल सुख लेओ तुम सांचे, और भी देऊँ सबन ॥९५॥

फिट फिट लज्या तूं भई लौकिक, बांधे कबीले सों करम । धनी मेरे मोहे आए बुलावन, तित तोहे न आई सरम ॥९६॥

कहा कियो तें दुष्ट पापनी, ऐसी न करे कोए । घर धाम धनी के आगे, करी सरमिंदी मोहे ॥९७॥

अब सरमिंदी कहूं मैं तोको, तूं देख परआतम सगाई । बड़ा अवसर पेहेले तूं चूकी, अब फेर आई जोगवाई ॥९८॥

कहे लज्या मैं पेहेले भूली, अवसर धनी ना छोडूं । सिर माया का भान के, पिउसों मुख ना मोडूं ॥९९॥

फिट फिट आसा तूं भई माया की, बैठी मोहजल में आए । मैं माया में अखंड फल पाया, सो मोहे दियो हराए ॥१००॥

अखंड धनी फल छोड़ के, निरफल माया झूठ लई । ए सिर गुनाह हुआ जीव के, तोको सिखापन ना दई ॥१०१॥

कहे आसा मोहे दई जगाए, निकट न जाऊं मोहजल । इन बल मांहें कमी न राखूं, लागी आतम आसा सुफल ॥१०२॥

गुन गरीबन आई अकरमन, ना भई सनमुख सावधान । लाहा लीजे दौड़ धनी का, सो दिया गरीबी भान ॥१०३॥

किन बिध कहूं या सुख की, फिट फिट भूंडे अचेत । तुझ बैठे न आई तीव्रता, ना तो ए सुख लेत ॥१०४॥

कहे गरीबी मैं माया की, मैं बैठों माया मांहें । लीजो लाहा सुख नेहेचल का, श्री धाम धनी हैं जांहें ॥१०५॥

फिट फिट भूंडी न आई तीव्रता, मोहे मिले थे धाम धनी । ऐसा विलास खोया तें मेरा, बोहोत बुरी करी घनी ॥१०६॥

फेर अवसर आयो है मेरे, चित चेतन कीजे बल । रात दिन जगाए जीव को, जिन दे मिलने पल ॥१०७॥

तुझमें बल है सावचेती, चित चेतन अति रोसन । परआतम बस कर दे आतमां, ना होए अंतराए एक खिन ॥१०८॥

सील संतोख आओ ढिग मेरे, बांधो सागर आड़ी पाल । गुन सारे हुए अग्या में, पीछे रह्या न कछू जंजाल ॥१०९॥

सील कहे संतोख सुनो, आपन हुए माया के पाल । कई बहावे पहाड़ पूर सागर के, मांहें लेहेरें बेहेवट निताल ॥११०॥

भमरियां मांहें बेसुमार, लेहेरां मेर समान । मछ लड़े बड़े मोहजल के, करनी पाल इस ठाम ॥१११॥

अब बांधनी पाल खरी करनी, ज्यों ना खसे लगार । पीछे जल जोर बढ़ा ऊपर अपने, तब सामी सोभा होसी अपार ॥११२॥

एह पाल हम बांधी जीवजी, पर तुम जाग करो सावचेत । फेर नहीं आवे ऐसा समया, सोभा ल्‍यो साथ में इत ॥११३॥

जाग जीव तूं जोरावर, क्या देऊं तोको गारी । तें होए चंडाल अवसर खोया, जीती बाजी हारी ॥११४॥

कठनाई मैं देखी तेरी, तूं निठुर निपट अपार । थके धनी तोहे धम धमके, पर तें गल्या नहीं निरधार ॥११५॥

॥ प्रकरण ॥२०॥ चौपाई ॥५०७॥

इसी सन्दर्भ में देखें-