प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण २२
आंखां खोल तूं आप अपनी, निरख धनी श्रीधाम । ले खुसवास याद कर, बांध गोली प्रेम काम ॥१॥
प्रेम प्याला भर भर पीऊं, त्रैलोकी छाक छकाऊं । चौदे भवन में करूं उजाला, फोड़ ब्रह्मांड पिउ पास जाऊं ॥२॥
वाचा मुख बोले तूं वानी, कीजो हांस विलास । श्रवना तूं संभार आपनी, सुन धनी को प्रकास ॥३॥
कहे विचार जीव के अंग, तुम धनी देखाया जेह । जो कदी ब्रह्मांड प्रले होवे, तो भी ना छोडूं पिउ नेह ॥४॥
खोल आंखां तूं हो सावचेत, पेहेचान पिउ चित ल्याए । ले गुन तूं हो सनमुख, देख परदा उड़ाए ॥५॥
एते दिन वृथा गमाए, किया अधम का काम । करम चंडालन हुई मैं ऐसी, ना पेहेचाने धनी श्रीधाम ॥६॥
भट परो मेरे जीव अभागी, भट परो चतुराई । भट परो मेरे गुन प्रकृती, जिन बूझी ना मूल सगाई ॥७॥
आग पड़ो तिन तेज बल को, आग पड़ो रूप रंग । धिक धिक पड़ो तिन ग्यान को, जिन पाया नही प्रसंग ॥८॥
धिक धिक पड़ो मेरी पांचो इंद्री, धिक धिक पड़ो मेरी देह । श्री स्याम सुंदरवर छोड़ के, संसार सों कियो सनेह ॥९॥
धिक धिक पड़ो मेरे सब अंगों, जो न आए धनी के काम । बिना पेहेचाने डारे उलटे, ना पाए धनी श्री धाम ॥१०॥
तुम तुमारे गुन ना छोड़े, मैं बोहोत करी दुष्टाई । मैं तो करम किए अति नीचे, पर तुम राखी मूल सगाई ॥११॥
॥ प्रकरण ॥२२॥ चौपाई ॥५४४॥
