प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण २३
वारने जाऊं वनराए वल्लभ की, जाकी सुख सीतल छाया । देखो ए बन गुन भव औखदी, देखे दूर जाए माया ॥१॥
जाऊं वारने आंगने बेलूं, जित ले बैठो संझा समे साथ । बातें होत चलने धाम की, घर पैंड़ा देखाया प्राणनाथ ॥२॥
भी बल जाऊं आंगने, आगे पीछे सब साज । जहां बैठो उठो पांउ धरो, धनी मेरे श्री राज ॥३॥
बलिहारी जाऊं बोहोत बेर, देहरी मंदिर द्वार । वारने जाऊं इन जिमी के, जहां बसत मेरे आधार ॥४॥
बलि जाऊं पाटी पलंग सिराने, चादर सिरख तलाई । पौढ़त पिउजी ओढ़त पिछौरी, ऊपर चंद्रवा चटकाई ॥५॥
बल बल जाऊं मैं दुलीचा चाकला, बल जाऊं मंदिर के थंभ । जिन थंभों कर धनी अपने, जुगतें दिए बंध ॥६॥
बैठत हो जित महाबलिया, बल बल जाऊं ठौर तिन । साथ सबेरा आए के बैठत, करो धाम धनी बरनन ॥७॥
देखत मंदिर में कई बिध, वस्त सकल पूरन । टूक टूक कर वार डारों, मेरे जीव के और तन ॥८॥
भले तुम देह धरी मुझ कारन, कर रोसन टाल्यो भरम । जीव मेरा बोहोत सखत था, मेहेर नजरों भया नरम ॥९॥
बल जाऊं मैं चरन कमल की, बल जाऊं मीठे मुख । बलिहारी सोभा सुंदरता, जिन दरसन उपजत सुख ॥१०॥
भी बल जाऊं हस्त कमल की, बल जाऊं वस्तर । लेऊं बलैयां भूखन की, बल जाऊं सीतल नजर ॥११॥
वार डारूं मैं नासिका पर, और वार डारूं श्रवन । वार डारूं मैं नख सिख पर, जो सनकूल हैं अति घन ॥१२॥
सेवा करत बाई हीरबाई, उछव रसोई जित । अंतरगत तुम नित आरोगो, मैं बल बल जाऊं तित ॥१३॥
वार डारूं मैं वानी पर, जो वचन केहेत रसाल । साथ को चरने राख के, सागर आड़ी बांधत हो पाल ॥१४॥
करत हो कृपा कई विध की, मीठी अति मेहेरबानी । सांचे लाड़ लड़ाए सुंदर, ल्याए वतन की वानी ॥१५॥
मैं सेवा करूं सर्वा अंगो, देऊं प्रदखिना रात दिन । पल न वालूं निरखूं नेत्रे, आतम लगाए लगन ॥१६॥
मुझसे अजान अबूझ दुष्ट अप्रीछक, अधम नीच मत हीन । सो इन चरनो आए होए दाना स्याना, सुघड़ सुबुध प्रवीन ॥१७॥
जीव जगाए देत निध निरमल, करत आतम रोसन । सो जीव बुध ले करे उजाला, सबमें चौदे भवन ॥१८॥
इन जुबां क्यों कहूं बड़ाई, तुमें सब्द ना पोहोंचे कोए । जो कछू कहूं सो उरे रहे, ताथे दुख लागत है मोहे ॥१९॥
दाझ बुझत है एक सब्द में, जब कहूं धनी श्री धाम । इन वचनें आतम सुख पायो, भागी हैड़े की हाम ॥२०॥
कहे इंद्रावती अति उछरंगे, फोड़ ब्रह्मांड करूं रोसन । सीधी राह देखाऊं जाहेर, ज्यों साथ सुखे आवे वतन ॥२१॥
॥ प्रकरण ॥२३॥ चौपाई ॥५६५॥
