Logo  Kuljam.org

विषय-सूची

प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण २४

अब अस्तुत ऊपर एक विनती कहूं, चरन तुमारे जीव में ग्रहूं । इन चरनों मोहे सुध भई, पेहेली निध श्री सुंदरबाईऐं दई ॥१॥

दोऊ सरूप में जोत जो एक, सो मैं देख्या कर विवेक । ए चरन फलें कहे इंद्रावती, तारतम जोत करूं विनती ॥२॥

मेरा बुत्ता कछू न था मेरे धनी, मोपे दोऊ सरूपों दया करी अति घनी । सेवा में न थी हाजर, न जानूं दया करी क्यों कर ॥३॥

करतब चितवनी और सेवा करे, माया गुन उलटे परहरे । मनसा वाचा कर करमना, करे दौड़ प्यार अति घना ॥४॥

पर जब लग दया तुमारी न होए, तब लग काम न आवे कोए । ए परीछा मैं करी निरधार, देखे सबके सब्द विचार ॥५॥

जीव खरा होए जुदा मन करे, कपट रत्ती न हिरदे धरे । यों करके तुमको सेवे, वचन विचार अंदर जीव लेवे ॥६॥

सनकूल करे तुमारा चित, संसे भान करे जीव के हित । पिउ चित पर चलेगा जोए, साथ में घरों सोभा लेसी सोए ॥७॥

ए नींद उड़ाए के कहे वचन, श्री धाम धनी जीव जानी मन । जब देख्या धनी नीके फिकर कर, तो अजू न गई नींद है अंदर ॥८॥

ए वचन कहे मैं नीदज मांहें, जब नीके देखूं धनी धाम के तांहें । न तो क्यों कहूं धनी को एह वचन, पर कछुक तासीर है भोम इन ॥९॥

जब घर की तरफ देखों तुमको, तब फेर यों होए मेरे मन को । ए धाम धनी को कहा कहे वचन, तब जीव विचार दुख पावे मन ॥१०॥

क्या कहूं सब्द तुमें पोहोंचे नांहें, मेरी जुबां भई माया अंग मांहें । तुम सब्दातीत भए मेरे पिउ, मेरी देह खड़ी माया ले जिउ ॥११॥

धनी लगते वचन कहूंगी आए धाम, तब भानूंगी मेरे जीव की हाम । ए तो वानी कही मैं साथ कारन, साथ छोड़सी माया ए देख वचन ॥१२॥

साथ वेगे बुलाओ कहे इंद्रावती, ए कठन माया दुख होए लागती । ए दुख देख्या मांहें दुस्तर, कोई न पेहेचाने आप न सूझे घर ॥१३॥

ए मैं लुगा कह्या माया सनमंध, मैं देखीतां न देखूं अंध । ए ताए कहिए जो होए बेसुध, तुम खिन खिन खबर लई कई विध ॥१४॥

एह कहूं मैं साथ कारन, अधखिन साथ विसारो जिन । जिन करो तुमारी पाओखिन, तो कई कल्पांत जाए मिने तिन ॥१५॥

मैं तो कहूं जो तुम न्यारे हो, पाओ पल साथ की जुदागी ना सहो । मैं तो कहूं जो मेरी ओछी मत, तुम हम को कई सुख चाहत ॥१६॥

हम कारन तुम आए देह धर, तुम कई विध दया करी हम पर । तुम धनी आए कारन हम, देखाई बाट ल्याए तारतम ॥१७॥

साथें माया मांगी सो भई अति जोर, तुम सब्द कहे कई कर कर सोर । पर तिन समे नींद क्योंए न जाए, तब धनी सरूप भए अंतराए ॥१८॥

तो भी ना भई हमको खबर, तब फेर आए दूजा देह धर । ततखिन मिले हमको आए, सागर वतनी नूर बरसाए ॥१९॥

मैं साथ को कह्या सो कहिए क्यों कर, यों तो कहिए जो दूर किए होवें घर । एता तो मैं जानूं जीव मांहें, जो ए अरज धनीसों करिए नांहें ॥२०॥

पर साथ वास्ते दाह उपजी मन, यों जानें न कह्या हम कारन । यों न कहूं तो समझे क्यों कोए, कई विध दया धनी की होए ॥२१॥

ए साथ की चिन्हार को कहे वचन, ना तो धनी दया जीव जाने मन । साथ चरने हैं सो तो वचिखिन वीर, ए भी वचन विचारे द्रढ़ धीर ॥२२॥

पर करूं साथ पीछले की बड़ी जतन, देख वानी आवसी इन बाट वतन । देखियो साथ दया धनी, ए कृपा की बातें हैं अति घनी ॥२३॥

ए दया धनी मैं जानूं सही, पर इन जुबां ना जाए कही । जो जीव वचन विचारे प्रकास, तो अंग उपजे धाम धनी उल्लास ॥२४॥

कहे इंद्रावती सुंदरबाई चरनें, सेवा पिउ की प्यार अति घने । और कछू ना इन सेवा समान, जो दिल सनकृूल करे पेहेचान ॥२५॥

॥ प्रकरण ॥२४॥ चौपाई ॥५९०॥

इसी सन्दर्भ में देखें-