Logo  Kuljam.org

विषय-सूची

प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण २५

जाटी प्रबोध - कातनी को द्रष्टांत

भट परो तिन नींद को, जिन सोहागनियां दैयां भुलाए । तो भी नींद निगोड़ी ना उड़ी, जो धनी थके बुलाए बुलाए ॥१॥

ए नींद अमल कासों कहिए, क्योंए ना छोड़े आतम । तो भी बेसुधी ना टली, जो जल बल हुई भसम ॥२॥

वतन से आइयां सैयां, सबे बांध के होड़ । सो याद न रह्या कछुए, इन नींदे दैयां सब तोड़ ॥३॥

तुमको नींद उड़ावने, मैं देऊं एक द्रष्टांत । तुम विध अगली देखके, जो कदी समझो इन भांत ॥४॥

आइयां आस कातन की, करके उमेद दूनी । किनहूं कात्या बारीक, किन रूईथें न करी पूनी ॥५॥

आइयां कातन वालियां, मिनो मिने रब्द कर । किन किन मिहीं कातिया, सांचा सनेह धर ॥६॥

कोई बड़ाई ले बैठियां, सो गैयां आपको भूल । उठियां अंग पछताए के, होए सूरत बेसूल ॥७॥

किनहूं कात्या सोहाग का, सूृत भर भर सेर । कोई बैठियां पांउ पसार के, ले बैठी हिरदे अंधेर ॥८॥

कोई तलबें तांत चढ़ावहीं, भले पाई ए बेर । कोई नीचा सिर कर रही, कोई चढ़ियां सिर मेर ॥९॥

एक सूत देखे और के, उमर सब गई । फेरा देवें रूपवंतियां, कबूं पूनी हाथ न लई ॥१०॥

कोई सोए रहियां आतन में, उठियां तब उदमाद । दुख पाया तब दिल में, जब सूत आया याद ॥११॥

जिन दिल दे मिहीं कातियां, ढ़ील न करी एक पल । सो ए उठी सैयन में, हंसते मुख उजल ॥१२॥

किनहूं ऊंचा कातिया, दे फारी फुकार । सो ए घरों सैयनमें, हुई धंन धंन कातनहार ॥१३॥

जब सूत सैयां देखिया, तब जाहेर हुईयां सब कोए । पर जिन कछूए न कातिया, छिपाए रही मुख सोए ॥१४॥

सूतवाली सोहागनी, तिन सोभा पाई घनी । सैयां भी कहे धंन धंन, और दियो मान धनी ॥१५॥

एक फेरे चरखा उतावला, दिल बांध तांत के साथ । रातों भी करे उजागरा, सूत होवे तिनके हाथ ॥१६॥

करे जो बातां बीच में, सो तांत न निकसे तिन । पूनी रही तिन हाथ में, बैठी फिरावे मन ॥१७॥

फजर हुई बीच सैयनमें, मिल बातां करसी सब । जिन कछुए न कातिया, तिन कहा हाल होसी तब ॥१८॥

ना कछू कात्या रात में, ना कछू कात्या दिन । सो वतन बीच सैयनमें, मुख नीचा होसी तिन ॥१९॥

जो मोटा या बारीक, तिन भी पाया मोल । पर जिन कछुए न कातिया, तिनका कछुए न सूल ॥२०॥

हुकम धनी के बिध बिध, अनेक किए पुकार । जिन सुनी न तिनकी वतन में, बातें हुई बिकार ॥२१॥

सुनते पुकार धनीय की, काल गया दिन ले । पीछे मुख नीचा होएसी, क्यों न कात्या चित दे ॥२२॥

जिनो आज न कातिया, करसी याद ए दिन । जब बातां करसी सोहागनी, मिलकर बीच वतन ॥२३॥

जो कछुए ना समझी, हाथ न लई पूनी । आई थी उमेद में, पर उठी अलूनी ॥२४॥

एक लेसी सोहाग सुलतान का, सोई सोहागिन । सो बातां सिर उठाए के, करसी बीच सैयन ॥२५॥

॥ प्रकरण ॥२५॥ चौपाई ॥६१५॥

इसी सन्दर्भ में देखें-