प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण २६
भट परो नींद मोह की, जो टाली न टले क्यों । आंखां खोल सीधा कहे, फेर वली त्यों की त्यों ॥१॥
एक तकला भाने ताओ में, फोकट फेरा खाए । झगड़ा लगावे आप में, हिरदे रस न जुबांए ॥२॥
एक तकले समारे और के, लर लर कतावे । कहे अपनायत जान के, समया बतावे ॥३॥
एक झगड़ा लगावे और को, सामी तकले डाले वल । ए बातें होसी वतन में, जब उतर जासी अमल ॥४॥
एक औरों को उलटावहीं, कहा बिध होसी तिन । कातना उन पीछा पड़या, सामी धके दिए औरन ॥५॥
जो झगड़ा लगावें आपमें, ताए होसी बड़ो पछताप । ओ जानें कोई ना देखहीं, पर धनी बैठे देखें आप ॥६॥
बात उठावें जो मन से, सो होसी सबे वतन । एक जरा छिपी ना रहे, यों कोई भूलो जिन ॥७॥
एक काते मांहें चुपकतियां, सो ताने सहे औरन । तांत चढ़ावे तलबें, नजर ना चूके खिन ॥८॥
ताए होसी मान धनीयको, साथ मिने रंग लाल । उठसी हंसती हरखमें, पाँउ दे पड़ताल ॥९॥
हाथ घससी हाथसो, जो लई इंद्रियों घेर । सो पछतासी आंखां खुले, पर ए समया न आवे फेर ॥१०॥
जो इत आंखा खोलसी, ले इस्क या विचार । सो करसी बातें बिध बिध की, सब सैयों में सिरदार ॥११॥
जिन इत आंखां ना खोलियां, करके बल बेसुमार । नींद उड़ाए ना सकी, सो ले उठसी खुमार ॥१२॥
जिन इत उड़ाई नींदड़ी, सो उठत अंग रोसन । केहेसी कातनहार को, विध विध के वचन ॥१३॥
जो उठसी आंखां चोलती, सो केहेसी कहा वचन । ना तो आई थी उमेद देखने, पर नींद ना गई तिन ॥१४॥
सुनो सैयां कहे इंद्रावती, तुम आईयां उमेद कर । अब समझो क्यों न पुकारते, क्यों रहियां नींद पकर ॥१५॥
तुम वतन में धनीयसों, क्यों करसी बात अंधेर । रेहेसी उमेदां मन में, ए न आवे समया और बेर ॥१६॥
कातने को उतावलियां, आईयां मिलकर तुम । अब झूलो रहियां नींद में, कातना भूल खसम ॥१७॥
धनी आए जगावहीं, कहे कहे अनेक सनंध । नींदें सब भुलाइयां, सेवा या सनमंध ॥१८॥
ए जिमी लगसी आग ज्यों, जब धनी चले घर । वचन पिउके लेयके, इत क्यों न जागो मांहें अवसर ॥१९॥
भट परो इन नींद को, ए ठौर बुरी विखम । यों जगावते न जागियां, तो कौन विध होसी तिन ॥२०॥
तुम देखो भांत धनीय की, कई विध करी चेतन । सबों सुनाए कहे इंद्रावती, जागो चलो वतन ॥२१॥
साहेब मांहें बैठ के, बतावत हैं ठौर । सो घर तुमको देखाइया, जहां नहीं कोई और ॥२२॥
॥ प्रकरण ॥२६॥ चौपाई ॥६३७॥
