प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण २७
अब तूं जिन भूल आतम मेरी, पेहेचान के खसम । वतन देखाया अपना, जिन छोड़े पिउ कदम ॥१॥
वचन कहे बड़े मुखथें, पर तूं तो समया न भूल । तूं कात बारीक धनीय का, ए तातें पावेगी मूल ॥२॥
अजूं तें पाओ न कातिया, इत चाहिएगा सेर भर । जब उठेगी आतन से, तब बहुरि चाहेगी अवसर ॥३॥
ए जो गमाए दिनड़े, गफलत में जो गल । अब तोको उठन के, आए सो दिनड़े चल ॥४॥
जो तूं उठी काते बिना, आए इन अवसर । कहा करेगी इन नींद को, जो ले चलसी घर ॥५॥
अजूं न जागे जोर कर, जो ऐसी तुझ पर भई । धनी आए बेर दूसरी, तेरी सुध ऐसी क्यों गई ॥६॥
कर सीधा समार तकला, कस कर बांध अदवान । दे गांठ माल मरोर के, पूनी लगाए के तान ॥७॥
फेर तूं चरखा उतावला, करके अंग कूवत । तूं लेसी सोहाग धनीय को, तेरे बारीक इन सूत ॥८॥
ए रेहेसी अधबीच कातना, दिन आए समें करे भंग । तुझ देखत सैयां चलियां, जो हुती तेरे संग ॥९॥
अब हिंमत करके कात तूं, दिल बांध सूत के साथ । ए मिहीं सूत सोहाग का, सो होसी तेरे हाथ ॥१०॥
अब नींद करे जिन तूं, ए नींद देवे दुहाग । उठ तूं जाग जोर कर, दौड़ ले पिउ सोहाग ॥११॥
ए सूत है अति सोहना, मोल मोहोंगा होसी एह । तूं पेहेचान पिउ अपना, वार फेर जीव देह ॥१२॥
अब ले स्याबासी सैयन में, कर तूं ऐसी भांत । एह मिहीं सूत सोहाग का, सो रात दिन ले कात ॥१३॥
॥ प्रकरण ॥२७॥ चौपाई ॥६५०॥
