प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण २८
भोरी तूं न भूल इंद्रावती, ऐसा पिउ का समया पाए । तूं ले धनी अपना, औरों जिन देखाए ॥१॥
तोहे यों धनी कब मिलसी, पेहेचान के ले सोहाग । ऐसी एकांत कब पावेगी, अब है तेरा लाग ॥२॥
बोहोत बखत भला पाइया, धनिऐें दियो तुझे आप । मेहेर करी मेहेबूबें, करके संग मिलाप ॥३॥
आंखां खोल के ढांपिए, जिन चूके एती बेर । रात दिन तेरे राज का, सूृत कात सवा सेर ॥४॥
नेह कर तूं नैनों से, और चसमें से कताए । मिहीं सूत ले उजला, आओ आंखें कर पाए ॥५॥
भले कात्या इन सूत को, भला पाया ए बखत । भले सो भागी नींदड़ी, भले मिले धनी इत ॥६॥
धनी बिना ए नींदड़ी, टाल ना सके कोई और । वार डारों जीव देह सों, मोहे धनी मिले इन ठौर ॥७॥
सई मेरी मुझ कारने, पिउजी दिए इत पाए । मैं वारूं तिन पर आतमा, धनी आए जिन राहे ॥८॥
सई तूं मेरा धनी ले बैठी, कोई और न देखनहार । देख तूं पिउ लेऊं अपना, तो तूं कहियो सोहागिन नार ॥९॥
इंद्रावती कहे तूं सई मेरी, धनी मिले मुझे इत । पिउ ने सब पूरन करी, जो मैं करी उमेदा तित ॥१०॥
सई तूं मेरी बाई रतन, मोहे मिले छबीले लाल । करी मुझे सोहागनी, अब मैं भई निहाल ॥११॥
मैं एक विध माँगी पिउ पे, पिउ ने कई विध करी रोसन । बातें इन रोसन की, करसी जाए वतन ॥१२॥
॥ प्रकरण ॥२८॥ चौपाई ॥६६२॥
