प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण २९
लखमीजी को दृष्टांत
मैं जानूं निध एकली लेऊं, धाम धनी मेरे जीव में ग्रहूं । ए सुख और काहूं ना देऊं, फेर फेर तुमको काहे को कहूं ॥१॥
ए वचन यों कहे न जाए, जीव दुख पावे ना कहे जुबांए । एह फिकर मैं बोहोतक करूं, पर देह ना पकड़े जो हिरदे धरूं ॥२॥
धनी कहावे तो यों कहूं, ना तो ए सुख औरों क्यों देऊं । ए देते मेरा जीव निकसे, ए बानी मेरे जीव में बसे ॥३॥
ए निध लई मैं कसनी कर, श्री धाम धनी चरणों चित धर । मैं बोहोतक करूं अंतर, पर सागर पूर प्रगट करे घर ॥४॥
ए बानी धनी अंतरगत कही, केहेने की सोभा कालबुत को भई । ना तो एह वचन क्यों कहे जाएं, अंदर कलेजे ज्यों लगे घाए ॥५॥
जिन जानो वचन अचेत में कहे, ए केहेते अनेक दुख भए । जब मैं विचारूं चित में आन, ए कैसी मुख निकसी बान ॥६॥
मेरी बुधें लुगा न निकसे मुख, धनी जाहेर करें अखंड घर सुख । अब साथ कछुक करो तुम बल, तो पूरन सोभा ल्यो नेहेचल ॥७॥
ए बोहोत भांत है भारी वचन, जो कदी देखो आप होए चेतन । इन वचन पर एक कहूं विचार, सुनो साथ मेरे धाम के आधार ॥८॥
धड़थें सिर कोई न्यारा करे, तो आधा वचन ना मुखथें परे । जो कोई सारे सकल संधान, तो कह्या न जाए पाओ लुगा निरवान ॥९॥
साथ कारन जीव सगाई जान, सेवियो धाम धनी पेहेचान । यों केहेके पकड़ न देवे कोए, यों देते न लेवे सो अभागी होए ॥१०॥
तुम साथ मेरे सिरदार, एह दृष्टांत लीजो विचार । रोसन वचन करूं प्रकास, सुकजी की साख लीजो विस्वास ॥११॥
ए देख के नींद टालो भरम, इन वचनों जीव करो नरम । वचन जीवसो करो विचार, तब सुख अखंड होए आधार ॥१२॥
पिउ पेहेचान टालो अंतर, परआतम अपनी देखो घर । इन घर की कहा कहूं बात, वचन विचार देखो साख्यात ॥१३॥
अब जाहेर लीजो दृष्टांत, जीव जगाए करो एकांत । चौद भवन का कहिए धनी, लीला करे बैकुंठ विखे घनी ॥१४॥
लखमीजी सेवे दिन रात, सो ए कहूं तुमको विख्यात । जो चाहे आप हेत घर, सो सेवे श्री परमेस्वर ॥१५॥
ब्रह्मदिक नारद कई देव, कई सुर नर करे एह सेव । ब्रह्मांड विखे केते लेऊं नाम, सब कोई सेवें श्री भगवान ॥१६॥
ए लीला सेवे कर सार, सेवतां न पावें पार । पेहेले सेवा करी है घनें, सो देखियो सुकव्यास वचनें ॥१७॥
ए तो है ऐसा समरथ, सेवक के सब सारे अरथ । अब तुम याको देखो ग्यान, बड़ी मत का धनी भगवान ॥१८॥
एक समें बैठे धर ध्यान, बिसरी सुध सरीर की सान । ए हमेसा करे चितवन, अंदर काहूं न लखावे किन ॥१९॥
ध्यान जोर एक समें भयो, लाग्यो सनेह ढांप्यो न रह्यो । लखमीजी आए तिन समें, मन अचरज भए विस्मे ॥२०॥
आए लखमीजी ठाढ़े रहे, भगवानजी तब जाग्रत भए । करी विनती लखमीजी ताहें, तुम बिन हम और कोई सुन्या नाहें ॥२१॥
किनका तुम धरत हो ध्यान, सो मोहे कहो श्री भगवान । मेरे मनमें भयो संदेह, कहे समझाओ मोको एह ॥२२॥
कौन सरूप बसे किन ठाम, कैसी सोभा कहो कहा नाम । ए लीला सुनो श्रवन, फेर फेर के लागों चरन ॥२३॥
सुनो लखमीजी एह वचन, एह बात प्रकासो जिन । लखमीजी कहो त्यों करूं, मेरा अंग तुमथें न परूं ॥२४॥
सुनो लखमीजी कहूं तुमको, पेहेले सिवे पूछा हमको । इन लीला की खबर मुझे नांहें, सो क्यों कहूं मैं इन जुबांए ॥२५॥
एह वचन जिन करो उचार, न तो दुख होसी अपार । और इतका जो करो प्रस्न, सो चौदे लोक की करूं रोसन ॥२६॥
जिन आसंका आनो एह, एह जिन पूछो संदेह । लखमीजी तुम करो करार, मुखथें वचन ना आवे बाहार ॥२७॥
तब लखमीजी बड़ो पायो दुख, कह ना सके कलपे अति मुख । मोसों तो राख्यो अंतर, अब रहूंगी मैं क्यों कर ॥२८॥
नैंनों आंसू बहुविध झरे, फेर फेर रमा विनती करे । धनी एह अंतर सह्यो न जाए, जीव मारो मांहें कलपाए ॥२९॥
अब क्यों कर राखूं जीव हटाए, कलेजा मेरा कटाए । कंपमान होए कलकले, उठी आह अंतस्करन जले ॥३०॥
अब जो धनी करो मेरी सार, तो ए लीला केहेनी निरधार । बोहोत बेर मने किया सही, अनेक विध सिखापन दई ॥३१॥
मेरा जीव क्योंए न रहे, लखमीजी फेर फेर यों कहे । तब बोले श्री भगवान, लखमीजी तूं नेहेचे जान ॥३२॥
कोटान कोट करो प्रकार, तो एता तुम जानो निरधार । मेरी जुबां न वले एह वचन, एह दृढ़ करो जीवके मन ॥३३॥
लखमीजी कहे सुनो अब राज, मेरे आतम अंग उपजत दाझ । नहीं दोष तुमारा धनी, अप्राप्त मेरी है घनी ॥३४॥
अब सरीर मेरा क्यों रहे, ए अगनी जीव न सहे । अब अग्या मांगूं मेरे धनी, करूं तपस्या देह कसनी ॥३५॥
भगवान जी बोले तिन ताओ, लखमीजी बेर जिन ल्याओ । तब कलप्या जीव दुख अनंत कर, उपज्यो वैराग लियो हिरदे धर ॥३६॥
लखमीजी को आसा थी घनी, जानों विछोहा ना देसी धनी । अब चरनों लाग लखमीजी चले, प्यादे पांउ रोवे कलकले ॥३७॥
इन समें विरह कियो अति जोर, बड़ो दुख पाए कियो अति सोर । एक ठौर बैठे जाए दमे देह, भगवानजी सों पूरन सनेह ॥३८॥
सीत धूप बरखा ना गिने, करे तपस्या जोर अति घने । सनेह धर बैठे एकांत, एते सात भए कल्पांत ॥३९॥
तब ब्रह्माजी खीरसागर, आए विष्णु पे बैकुंठ घर । ए प्रभुजी ए क्या उतपात, लखमीजी तप करे कल्पांत सात ॥४०॥
भगवानजी बोले तब तांहें, दोष हमारा कछुए नांहें । तो भी वचन तुमको कहे जाए, लखमीजी बोहोत दुख पाए ॥४१॥
एता रोष तुम ना धरो, लखमीजी पर दया करो । तुम स्वामी बड़े दयाल, लखमीजी दुख पावे बाल ॥४२॥
स्वामीजी ए ढील करो जिन, लखमीजी बुलाओ ततखिन । चरन ग्रहे तब खीरसागरें, और फेर फेर ब्रह्मा विनती करे ॥४३॥
चलो प्रभुजी जाइए तित, बुलाए लखमीजी आइए इत । तब दया कर आए भगवान, लखमीजी बैठे जिन ठाम ॥४४॥
लखमीजी परनाम कर आए, भगवानजी तब सनमुख बुलाय । लखमीजी चलो जाइए घरे, तब फेर रमा बानी उचरे ॥४५॥
धनी मेरे कहो वाही वचन, जीव बोहोत दुख पावे मन । जो तप करो कल्पांत एकईस, तो भी जुबां ना वले कहे जगदीस ॥४६॥
देखलाऊं मैं चेहेन कर, तब लीजो तुम हिरदे धर । तब ब्रह्मा और खीरसागर दोए, लखमीजी की विनती होए ॥४७॥
लखमीजी उठो तत्काल, दया करी स्वामी दयाल । अब जिन तुम हठ करो, आनंद अंतस्करन में धरो ॥४८॥
तब लखमीजी लागे चरनें, यों बुलाए ल्याए आनंद अति घनें । तब ब्रह्मा खीरसागर सुख पाए फिरे, दोऊ आए आप अपने घरे ॥४९॥
अब ए विचार तुम देखो साथ, ना वली जुबां बैकुंठनाथ । ग्रही वस्त भारी कर जान, तो भी वचन ना कहे निरवान ॥५०॥
ना तो बैकुंठनाथ को कैसी खबर, बिना तारतम क्या जाने मूल घर । और भी खबर कछुए ना कही, तो भी निध भारी कर ग्रही ॥५१॥
बिना भारी कौन भार उठावे, मुखथें वचन कह्यो न जावे । जब भया कृष्ण अवतार, रूकमनी हरन कियो मुरार ॥५२॥
माधवपुर व्याही रूकमनी, धवल मंगल गावे सोहागनी । गाते गाते लिया बृज नाम, तब पीछे भोम पड़े भगवान ॥५३॥
तब नैनों आंसू बोहोत जल आए, काहूपे ना रहे पकराए । सुख आनंद गयो कहूं चल, अंग अंतस्करन गए सब गल ॥५४॥
तब सब किने पायो अचरज, यों लखमीजी को देखाया बृज । सोले कला दोऊ सरूप पूरन, ए आए हैं इन कारण ॥५५॥
लोक जाने आए असुरों कारन, विष्णु कृष्ण देह धर पूरन । ए हुकमें असुर कई देवे उड़ाए, ऐसा बल हैं बैकुंठराए ॥५६॥
क्या समझें लोक अंदर की बात, देखलावने लखमीजी को आए साख्यात । उठ बैठे श्री कृष्णजी पूरन किया काम, यों लखमीजी की भानी हाम ॥५७॥
ए चित में विचारो रही, ए इसारत सुकें कही । ए लीला सुकें नीके कर गाई, जो लखमीजी को भगवानें देखाई ॥५८॥
ए बृज लीला जो अपनी, जाकी अस्तुति करत हैं धनी । पेहेले जो लीला तुम बृज में करी, अछर सदासिव चित में धरी ॥५९॥
रास लीला जो तुम बनमें किध, सो अछर सरूपें ग्रही जाग्रत बुध । ता लीला को ए प्रतिबिंब, जो विष्णुए देखाई रमा को सनंध ॥६०॥
तो वचन तुमको कहे जांए, जो तुम धाम की लीला मांहें । बृजवालो पिउ सो एह, वचन अपन को केहेत हैं जेह ॥६१॥
रास मिने खेलाए जिने, प्रगट लीला करी हैं तिने । धनी धाम के केहेलाए, ए जो साथको बुलावन आए ॥६२॥
तुम कारन मैं कह्या दृष्टांत, जीव सो वचन विचारो एकांत । बैकुंठ ठौर तित का ग्यान, केहेने वाला श्री भगवान ॥६३॥
लखमीजी तहां श्रोता भई, कई विध कसनी कर कर रही । तो भी न पाया एक वचन, तुम धाम धनी ले बैठे धन ॥६४॥
अजहूं ना तुम टालो भरम, क्यों ना करत हो जीव नरम । ए नौतनपुरी जो कही नगरी, श्री देवचंदजीऐं लीला करी ॥६५॥
ए प्रगट वचन किए अपार, तो भी ना हुई तुमें सुध सार । छोड़ो अमल माया जोर कर, जीव जगाओ वचन चित धर ॥६६॥
ए माया देखो न्यारे होए, भई तारतम की रोसनाई दोए । जो बानी श्री धनिएँ दई, सो आतम के अंदर तुम क्यों ना लई ॥६७॥
माया गुन सब करो हाथ, पेहेचानो प्राण को नाथ । अब एता आतमसों करो विचार, कौन वचन कहे आधार ॥६८॥
जोलों जीव विचार विकार न काटे, ज्यों छींट ना लगे घड़े चिकटे । इंद्रावती कहे सुनो साथ, जिन छोड़ो अपनो प्राणनाथ ॥६९॥
फेर फेर ना आवे ए अवसर, जिन हाम ले जागो घर । थोड़े में कह्या अति घना, जान्या धन क्यों खोइए अपना ॥७०॥
हम आगे ना समझे भए ढीठ, तो दई श्री देवचंदजीऐं पीठ । ना तो क्यों छोड़े साथ को एह, जो कछू किया होए सनेह ॥७१॥
अब फेर आए दूजा देह धर, दया आपन ऊपर अति कर । अब ए चेतन कर दिया अवसर, ज्यों हंसते बैठ जागिए घर ॥७२॥
सब मनोरथ हुए पूरन, जो ए बानी विचारो अंतस्करन । ए तो इंद्रावती कहे फेर फेर, जो धाम धनी कृपा करी तुम पर ॥७३॥
॥ प्रकरण ॥२९॥ चौपाई ॥७३५॥
