प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ३
राग धनाश्री
साथ सकल तुम याद करो, जिन जाओ वचन विसर जी । धनी मिले आपन को माया में, जिन भूलो ए अवसर जी ॥१॥
सुंदरबाई अंतरगत कहे, प्रकास वचन अति भारी जी । साथ वचन ए चित दे सुनियो, देखियो तारतम विचारी जी ॥२॥
एही चाल तुम चलियो साथजी, एही पांउ परवान जी । प्रगट मैं तुमको पेहेले कह्या, भी कहूं निरवान जी ॥३॥
अब जिन माया मन धरो, तुम देखी अनेक जुगत जी । कई कई विध कह्या मैं तुमको, अजहूँ ना हुए त्रपत जी ॥४॥
जब लग तुम रहो माया में, जिन खिन छोड़ो रास जी । पचीस पख लीजो धाम के, ज्यों होए धनी को प्रकास जी ॥५॥
अनेक विध कही मैं तुमको, ढील करो अब जिन जी । पांउ भरो ए वचन देखके, पेहेले बृज रास चलन जी ॥६॥
रास प्रकास छोड़ो जिन खिन, जो बीतक अपनी परवान जी । ए छल तुमसे क्योंए न छूटे, पर मैं ना छोडूं तुमें निरवान जी ॥७॥
कहे इंद्रावती वचन पिउके, जिन देखाया धाम वतन जी । अब कोटक छल करे जो माया, तो भी ना छूटे धनी के चरन जी ॥८॥
॥ प्रकरण ॥३॥ चौपाई ॥२९॥
