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विषय-सूची

प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ३०

प्रगटबानी प्रकास की - राग सामेरी

सोई ने सोई सूते क्या करो जी, या अगिन जेहेर जिमी मांहीं जी । जाग देखो आप याद करो, ए नींद निगल गई जीव के तांई जी ॥१॥

ए नींद तिनको ले गई रे, जो नाहीं साथी आपन जी । इन ठगनी जिमिऐं बोहोतक ठगे रे, तुम जिन सोओ इत खिन जी ॥२॥

नाहीं रे नींद कोई घेन घारन, नींद होए तो लीजे उठाए जी । उठाए जीव को खड़ा कीजे, फेर पड़े सोई उलटाए जी ॥३॥

सोई घेनने सोई घारन रे, सोई घूटन अधकी आवे जी । याही जिमी और याही नींद से, धनी बिना कौन जगावे जी ॥४॥

इन जेहेर जिमी से कोई न उबरया, तुम सूते तिन ठाम जी । इन जेहेर जिमी अगिन उजाड़ रे, नहीं वसती इन गाम जी ॥५॥

ए विख की जिमी और विख के बिछौने, विखै की आकार जी । अष्ट धात मिने सब विख के, विखै का विस्तार जी ॥६॥

गुन पख इंद्री सब विख के, विखै को सब आहार जी । आतम निरमल एक वतन की, सो तो कही निराकार जी ॥७॥

विख की तलाई ने विख के ओढ़ना, विख पलंग दिया बिछाए जी । विख का सिराने विख का ओछाड़, विख पंखा विख वाए जी ॥८॥

जागते विख और सुपने विख रे, नींद में विख निदान जी । बाहेर का विख क्यों कर कहूं रे, वहे आंधी वाए अग्यान जी ॥९॥

वस्तर विख के भूखन विख के, सकल अंग विख साज जी । ए विख नख सिख जीव को भेदयो, सो क्यों छूटे बिना श्री राज जी ॥१०॥

जोर कर तुम जागो जीव जी, नहीं सूते की एह जिमी जी । ज्यों ज्यों सोइए त्यों त्यों बाढ़े विख विस्तार, पीछे दुख पावे जीव आदमी जी ॥११॥

ए जिमी तुम क्यों न छोड़ो, अजूं नाहीं नींद बाढ़ी जी । इन जिमी नींद दुखड़े घनें रे, पीछे क्योंए न जाए काढ़ी जी ॥१२॥

बोहोत देखे दुख अनेक होएसी, ताथें उठो तत्काल जी । जल के जीव को घर जल में, ज्यों रहे मकड़ी मांहें जाल जी ॥१३॥

सब कोई जाली गूंथे अपनी, फेर अपनी गूंथी में उरझाए जी । उरझे पीछे कई दुख देखे, दुखै में जीव जाए जी ॥१४॥

बोहोत दुख देखे जीव जाते, तो भी गूंथे जाली फेर फेर जी । दोष नहीं इन मकड़ी का रे, इनका घर हुआ जाली अंधेर जी ॥१५॥

अपने घर इत नाहीं साथजी, चौदे भवन में कित जी । ता कारन पिउजी करें रे पुकार, तुम क्यों सूते इत जी ॥१६॥

ओ दुख के घर सो भी ना छोड़े, तुम याद ना करो सुख के घर जी । सास्त्र सबों पे साख देवाई, तुम अजहूं ना देखो चित धर जी ॥१७॥

बेहद सुख पार बेहद घर, बेहद पार श्री राज जी । अछरातीत सुख अखंड देवे को, मैं जगाऊं तुमारे काज जी ॥१८॥

पिउ पुकार पुकार थके, तुम अजहुं जल बिन गोते खात जी । दिन उगते संझा होत है, पीछे आड़ी पड़ेगी रात जी ॥१९॥

रात पड़ी तब कोई न जागे, पीछे कोई ना करे पुकार जी । निसाएँ नींद जोर बाढ़ेगी, पीछे बढ़ेगा विख विस्तार जी ॥२०॥

संझा लगे धनी रेहेसी साथ कारन, तुम अजहूं ना नींद निवारो जी । पेहेचान पिउ सुख लीजिए, तुम अपना आप वार डारो जी ॥२१॥

पुकार करते रात पड़ी, पिउ रात ना रेहेसी निरधार जी । जो दुस्मन तुमको भुलावत हैं, सो तुम क्यों न करत विचार जी ॥२२॥

ए विखम भोम छोड़ते जो आड़ी करे, सो जानियों तेहेकीक दुस्मन जी । जो लेने न देवे सुख अखंड, सो क्यों न देखो सुन वचन जी ॥२३॥

ए दुस्मन तेरे विख भरे, जिन लियो संसार घेर जी । ओ भुलावत तुमको जुदी भांतें, तुम जिन भूलो इन बेर जी ॥२४॥

भी तुमको दिखाऊं दुस्मन, जिनहूं न छोड़या कोए जी । सो तुमको दिखाऊं जाहेर, तुमको अंदर झूठ लगावे सोए जी ॥२५॥

गुन अंग इंद्री देखो रे चलते, जो उलटे लगे संसार जी । एही दुस्मन विसेखे अपने, सो करत हैं सिर पर मार जी ॥२६॥

तुम करो लड़ाई इनसों, मार टूक करो दुस्मन जी । फेर वाको उलटाए चेतन करो, ज्यों होवें तुमारे सजन जी ॥२७॥

सनमंधी साथ को कहे वचन, जीव को एता कौन कहे जी । ए वानी सुन ढील करे क्यों वासना, सो ए विखम भोम क्यों रहे जी ॥२८॥

छल की भोम को तुम समझत नाहीं, ना सुनत मेरी बात जी । जानत हो दिन दो पोहोर रेहेसी, पाओ पल में हो जासी रात जी ॥२९॥

अबही रात आई देखोगे, उठसी अनेक अंधेर जी । जीव अंधेर जब देख उरझसी, तब आवसी विख के फेर जी ॥३०॥

विख के फेर अनेक उपजसी, करम केरा जे दुख जी । भी फिरसी फेर अनेक विधके, काहूं जीव को न होवे सुख जी ॥३१॥

सुनियो जो तुम हो ब्रह्मसृष्ट के, जिन आओ मांहें रात जी । इन रात के दुख घने दोहेले, पीछे उड़सी अंधेर प्रभात जी ॥३२॥

दूर होसी इन रात के प्रभात, रात छेह क्योंए न आवे जी । दुख की रात घनूं लागसी दोहेली, पीछे फजर मुख न देखावे जी ॥३३॥

महाप्रले होसी जब लग, तबलों रेहेसी अंधेर जी । ता कारन पिउजी करे रे पुकार, जिन भूलो इन बेर जी ॥३४॥

तारतम के उजाले कर, रोसन कियो इन सूल जी । कई कोट ब्रह्मांड देखाई माया, पाया अंकूर पेड़ मूल जी ॥३५॥

पिउ पधारे बुलावन तुमको, तो होत है एती पुकार जी । यों करते जो नहीं मानो, तो दुख पाए चलसी निरधार जी ॥३६॥

विखम बड़ा जल मांहें अंधेर, कई लगसी लेहेरें निघात जी । विसेखें जीव बेसुध होसी, नहीं सुनोगे निध साख्यात जी ॥३७॥

मांहें मछ गलागल, लेहेरें आड़े टेढ़े बेहेवट जी । दसो दिसा कोई ना सूझे, फिरवलसी अंधकार पट जी ॥३८॥

तुम हो अंग मेरे के, जिन देखो माया को मरम जी । धाम धनी आए तुम कारन, तुमें अजहूं न आवे सरम जी ॥३९॥

ए नींद तुम को क्यों कर उड़सी, जोलों न उठो बल कर जी । सेवा करो समें पिउ पेहेचान, याद करो आप घर जी ॥४०॥

ए अमल तुमको क्यों रे उतरसी, जो जेहेर चढ़या अति भारी जी । पिउजी के बान तो तोड़े संधान, पर तुमको केहे केहे हारी जी ॥४१॥

जो जानो घर पाइए अपना, तो एक राखियो रस वैराग जी । सकल अंगे सुध सेवा कीजो, इन विध बैठो घर जाग जी ॥४२॥

जो जानो इत जाग चलें, तो लीजो अर्थ प्रकास जी । जीव को कहियो ए कह्या सब तोको, सिर लिए होसी उजास जी ॥४३॥

इन उजाले जेहेर उतरसी, तब बढ़ते बल नहीं बेर जी । परआतम को आतम देखसी, तब उतर जासी सब फेर जी ॥४४॥

एह विध कर कर आतम जगाई, तब होसी सब सुध जी । सुध हुए पूर चलसी प्रेम के, होसी जाग्रत हिरदे बुध जी ॥४५॥

निरमल हिरदे में लीजो वचन, ज्यों निकसे फूट बान जी । ए कह्या ब्रह्मसृष्ट ईश्वरी को, ए क्यों लेवे जीव अग्यान जी ॥४६॥

माया जीव हममें रहे ना सके, सो ले न सके एह वचन जी । ना तो सब्द घने लागसी मीठे, पर रेहेने ना देवे झूठा मन जी ॥४७॥

जो कोई जीव होए माया को, सो चलियो राह लोक सत जी । जो कोई होवे निराकार पार को, सो राह हमारी चलत जी ॥४८॥

वासना को तो जीव न कहिए, जीव कहिए तो दुख लागे जी । झूठ की संगते झूठा केहेत हों, पर क्या करों जानों क्योंए जागे जी ॥४९॥

ए कठन वचन मैं तो केहेती हों, ना तो क्यों कहूं वासना को जीव जी । जिन दुख देखे गुन्हेंगार होत हो, आग्या ना मानो पिउ जी ॥५०॥

प्रकास बानी तुम नीके कर लीजो, जिन छोडो एक खिन जी । अंदर अर्थ लीजो आतम के, विचारियो अंतस्करन जी ॥५१॥

अंदर का जब लिया अर्थ, तब नेहेचे होसी प्रकास जी । जब इन अर्थें जागी वासना, तब वृथा ना जाए एक स्वांस जी ॥५२॥

ए प्रगट बानी कही प्रकास की, इंद्रावती चरने लागे जी । सो लाभ लेवे दोनों ठौर को, जाकी वासना इत जागे जी ॥५३॥

॥ प्रकरण ॥३०॥ चौपाई ॥७८८॥

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