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विषय-सूची

प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ३१

बेहद वानी

बेहद के साथी सुनो, बोली बेहद वानी । बड़े बड़े रे हो गए, पर काहूं न जानी ॥१॥

उपाय किए अनेको, पर काहूं ना लखानी । ए वानी निज बुध बिना, न जाए पेहेचानी ॥२॥

ना तो आए बुध के सागर, गुन खट ग्यानी । भगवानजी को महादेवजी, पूछे बेहद वानी ॥३॥

विष्णु कहे सिवजी सुनो, तुम पूछत हो जेह । आद करके अबलों, अगम कहियत हैं एह ॥४॥

कोट ब्रह्मांड जो हो गए, तित काहूं ना सुनी । खोज खोज खोजी थके, चौदे लोक के धनी ॥५॥

फेर पूछे सिव विष्णु को, कहे ब्रह्मांड और । और ब्रह्मांड की वारता, क्यों पाइए इन ठौर ॥६॥

ए बात तो सिवजी जाहेर, इत है कई भांत । ठौर ठौर कहे वचन, ए जो भेद कल्पांत ॥७॥

सुकजी और सनकादिक, कई और भी साध । तिन खोज खोज के यों कह्या, ए तो अगम अगाध ॥८॥

एक सब्द के कारने, लखमी जी आप । नेक भी जाहेर ना हुई, अंग दिए कई ताप ॥९॥

याही रस के कारने, कैयों किए बल । कैयों कलप्या अपना, पर काहूं ना प्रेमल ॥१०॥

सो रस बृज की सुंदरी, पायो सुगम । सो सेहेजे घर आइया, जो कहे वेद अगम ॥११॥

ए निध अपने घर की, इन यों तो बिलसी । अनूं चोंच पात्र या बिना, नाहीं काहूं कैसी ॥१२॥

अबलों काहूं ना जाहेर, श्री धाम के धनी । खेले आप इच्छा कर, अर्धांग जो अपनी ॥१३॥

साथ इच्छाएं सुपन में, खेल मांहें आया । बेहद थे पिउ आएके, बेहद साथ खेलाया ॥१४॥

ए वानी इत हम बिना, और काहूं न होवे । आधा लुगा ना पाइए, जो जीव अपना खोवे ॥१५॥

साथ देखने आइया, पिउ इछा कर । बेहद धनी साथ को, खेलावें चित धर ॥१६॥

ले चलसी सब साथ को, पार बेहद घर । पीछे अवतार बुध को, सब करसी जाहेर ॥१७॥

बैकुंठ जाए विष्णु को, सब देसी खबर । विष्णु को पार पोहोंचावसी, सब जन सचराचर ॥१८॥

खोज पाई जिन ए निध, धंन धंन सो बुध । दृढ़ करी सनेहसों, साथ को कही सुध ॥१९॥

नौतन पुरी भली पेरे, चितसों चरचानी । साथी जो बेहद के, तिनहूंं पेहेचानी ॥२०॥

बेहद वाट देखावहीं, पिउ आए के पास । तारतम ले आए धनी, ए जोत उजास ॥२१॥

जाहेर हुई जो साथ में, देखो रास प्रकास । तारतम वानी वतन की, जिन कियो तिमर सब नास ॥२२॥

हिरदे आद नारायन के, वेद जिनको स्वांस । ग्रन्थ सबों की उतपन, वानी वेद व्यास ॥२३॥

तामे फल श्री भागवत, सुकजी मुख भाख । पाती ल्‍याया बेहद की, साथ की पूरी साख ॥२४॥

और भी नाम केते कहूं, इंड वानी अलेखे । सब साख देवे बेहद की, जो कोई दिल दे देखे ॥२५॥

ए बानी ए वाटड़ी, कबूं ना जाहेर । धनी ब्रह्मांड के खोजिया, सब मांहें बाहेर ॥२६॥

एक जरा किनहूं न पाइया, इत अनेक जो धाए । नाम ब्रह्मांड के धनी कहे, दूजे कहा करूं सुनाए ॥२७॥

सो निध जाहेर इत हुई, धंन धंन संसार । धंन धंन खंड भरथ का, धंन धंन नर नार ॥२८॥

धंन धंन पांचों तत्व, धंन धंन त्रैगुन । धंन धंन जुग सो कलजुग, धंन धंन पुरी नौतन ॥२९॥

अब कहूं लीला प्रथम की, सुनियो तुम साथ । जो कबूं कानों ना सुनी, सो पकड़ देऊं हाथ ॥३०॥

धोखा कोई न राखहूं, करूं निरसंदेह । मुक्त होत सचराचर, आयो वतनी मेह ॥३१॥

धंन गोकुल जमुना त्रट, धंन धंन बृजवासी । अग्यारे बरस लीला करी, करी अविनासी ॥३२॥

चौदे लोक सुपन के, साथ आया देखन । मुक्त दे पीछे फिरे, सदासिव चेतन ॥३३॥

और ब्रह्मांड जोगमाया को, कियो खेलने रास । खेल करे श्री राजसों, साथ सकल उलास ॥३४॥

नौतन खेल या रास को, कबहूं ना होवे भंग । खेल साथ सुपन में, जोगमाया के रंग ॥३५॥

तुम देखो साथ सुपन में, खेल खेले ज्यों । एक विधें साथ जागिया, खेल त्यों का त्यों ॥३६॥

एह ब्रह्मांड तीसरा, हुआ उतपन । धाख रही कछू अपनी, तो फेर आए देखन ॥३७॥

ब्रह्मांड तीनों देखे हम, खेल बिना हिसाब । जाग वतन बातां करसी, जो देखी मिने ख्वाब ॥३८॥

ए जो ब्रह्मांड उपज्या, जिनमें राख्या सेर । साथ घरों सब पोहोंचिया, और इत आए फेर ॥३९॥

ज्यों हरे ब्रह्मांए बाछरू, गोवाला संघातें । ततखिन सो नए किए, आप अपनी भांतें ॥४०॥

गोकुल मिने आप अपने, घर सब कोई आया । खबर ना पड़ी काहूं को, ऐसी रची माया ॥४१॥

एह दृष्टांते समझियो, राह राख्या इन विध । ए बल माया देखियो, और ऐसी किध ॥४२॥

साथ चल्या सब वतन, अपने पिउ साथ । और खेले रासमें अखंड, इत उठे प्रभात ॥४३॥

सोई गोकुल जमुना त्रट, जानों सोई बृजवासी । रास लीला जाने खेल के, इत आए उलासी ॥४४॥

जाने सोई ब्रह्मांड, जो खेलत सदाए । ए ब्रह्मांड जो उपज्या, ऐसी रे अदाए ॥४५॥

दोऊ ब्रह्मांडों बीच में, सेर राख्या सार । खबर ना पड़ी काहू को, बेहद का बार ॥४६॥

इत फेर उठे जो प्रतिबिंब, यामें साथ पिउ । खेल आए जाने हम नहीं, धोखा रहया जिउ ॥४७॥

धोखा इनों का भी ना मिट्या, तो कहा करे और । बेहद वानी के माएने, क्यों होवे दूजे ठौर ॥४८॥

यों साथ पिछला आइया, इत इन दरवाजे । मूल साथ फेर आवसी, ए किया जिन काजे ॥४९॥

क्या जाने हद के जीवड़े, बेहद की बातें । रास में खेले अखंड, इत उठे प्रभातें ॥५०॥

खेले पिछले साथ में, सात दिन तांई । अक्रूर चल्या बुलाए के, पोहोंचे मथुरा मांहीं ॥५१॥

तोलों भेख जो पिउ का, कुबलापील मारया । चांडूल मुष्टक संघार के, जाए कंस पछाड़या ॥५२॥

टीका दिया उग्रसेन को, भए दिन चार । छोड़ वसुदेव भेख उतारिया, या दिन थें अवतार ॥५३॥

अब इहां से लीला हद की, सोतो सारे केहेसी । पर बेहद वानी हम बिना, दूजा कौन देसी ॥५४॥

नरसैयां इन पेंडे खड़ा, लीला बेहद गाए । बल करे अति निसंक, मिने पैठ्यो न जाए ॥५५॥

जो बल किया नरसैऐं, कोई करे ना और । हद के जीव बेहद की, लीला देखी या ठौर ॥५६॥

नरसैयां दौड़या रस को, वानी करे रे पुकार । रस जाए हुआ अंदर, आड़े दरवाजे चार ॥५७॥

द्वारने इन बेहद के, लेहेरें आवें सीतल । सो इत खड़ा लेवहीं, रस की प्रेमल ॥५८॥

इन दरवाजे नरसैयां, प्रेमें लपटाना । लीला पीछले साथ में, सुख ले समाना ॥५९॥

लीला सुकें बरनन करी, बृज रास बखाना । बेहद की बानी बिना, ठौर ठौर बंधाना ॥६०॥

ना तो ए क्यों ऐसे वरनवे, क्यों कहे पंच अध्याई । ए रस छोड़ और वचन, मुख काढ्यो न जाई ॥६१॥

होवे अस्कंध द्वादस थें, इत कोट गुने । पर क्या करे आग्या इतनी, बस नांहीं अपने ॥६२॥

ना हुई जाहेर या मुख, बेहद की बान । धाख रही बोहोत हिरदे, कलप्या दुख आन ॥६३॥

कंपमान होए कलप्या, रस गया याथें । सोए दुख क्यों सेहें सके, रस जाए जाथें ॥६४॥

बेहद के सब्द कहे का, था हरख अपार । दरवाजा ना खोलिया, रह्या रस सार ॥६५॥

रास रात बरनन करी, देखो मन विचार । नारायनजी की रात को, कोईक पावे पार ॥६६॥

पार नहीं रास रात को, ए तो बेहद कही । तामें अखंड लीला रास की, पंच अध्याई भई ॥६७॥

देखो जाहेर याके माएने, चित ल्याए वचन । रात ऐसी बड़ी तो कही, लीला बड़ी वृंदावन ॥६८॥

ए पंच अध्याई होवे क्यों कर, मेरे मुनीजी की बान । पर सार समें बीच अटक्या, रस आए सुजान ॥६९॥

दुख हुआ बोहोत कलप्या, पर कहा करे जान । पात्र बिना पावे नहीं, रस बेहद वान ॥७०॥

पात्र बिना तुम पाइया, मुनीजी क्यों करो दुख । आज लगे बेहद का, किन लिया है सुख ॥७१॥

एतो हमारा कागद, तुम साथे आया । खबर हद बेहद की, देकर पठाया ॥७२॥

विध सारी कागद में, हम लिए विचार । तुम साथे मुनीजी संदेसड़ा, आए समाचार ॥७३॥

या सुध कागद हम लई, समझे सब सार । औरन को ए कोहेड़ा, ना खुले द्वार ॥७४॥

और विचारे क्या जानहीं, जाने जाको होए । हम बिना द्वार बेहद के, खोल ना सके कोए ॥७५॥

लाख बेर देखो फेर, न पावे कड़ी कल । पाई नहीं त्रिगुन ने, कर कर गए बल ॥७६॥

ए तो कोहेड़ा हद का, बेहदी समाचार । ए देखावें हम जाहेर, साथ को खोल द्वार ॥७७॥

सुकजी इत ले आइया, बेहद के बोल । फेर टालो अंदर का, देखो आंखां खोल ॥७८॥

अस्कंध दूजा मुनिऐं कह्या, चत्रश्लोकी जित । ब्रह्मांड की जहां उतपन, अर्थ देखो तित ॥७९॥

ए द्वार देखोगे जाहेर, होसी माया पेहेचान । ए माएना नीके लीजियो, हिरदे में आन ॥८०॥

मोह तत्व कह्या नींद को, सुरत अहंकार । सुपन को कह्या ब्रह्मांड, नाम धरे बेसुमार ॥८१॥

पैंड़ा बेहद वतन का, ए वतनी जाने । हद का जीव बेहद का, द्वार क्यों पेहेचाने ॥८२॥

देख्यो द्वार बेहद के, सुकजी बलवंत । पर कल किल्ली क्यों पावहीं, जोर किया अनंत ॥८३॥

द्वार खोलने दौड़िया, सुकजी सपराना । ले चल्या संग परीछित, सो तो बोझे दबाना ॥८४॥

बल किया बलिऐं घना, द्वार द्वार पछटाना । पर साथे संघाती हद का, इत सो उरझाना ॥८५॥

रास लीला सुख अखंड, इत तो ना केहेलाना । पाछल तान हुई घनी, अध बीच लेवाना ॥८६॥

पात्र बिना रस क्यों रहे, आवत ढलकाना । पात्र हुते तिन पाइया, भली भांत पेहेचाना ॥८७॥

बरस असी लगे ए रस, सारी पेरे सचवाना । लिया पिया साथ में, जिन जैसा जाना ॥८८॥

एक बूंद बाहेर न निकस्या, साथ मिने समाना । जिन का था तिन बिलसिया, मिनो मिने बटाना ॥८९॥

अब हम मिने थें ए रस, इत आए छलकाना । छोल आई ज्यों सागर, अंग थें उभराना ॥९०॥

जोर किया हम बोहोतेरा, रस रह्या न ढ़पाना । ए अब जाहेर होएसी, बाहेर प्रगटाना ॥९१॥

ए रस आज के दिन लों, कित काहू न लखाना । आवसी साथ इन विध, ए रस लपटाना ॥९२॥

जान होए सो जानियो, ए ‍क्योंकर रहे छाना । क्यों कर ए छिपा रहे, सब सुनसी जहाना ॥९३॥

ए बानी बेहद प्रगटी, इंद्रावती मुख । बोहोत विधें हम रस पिए, बेहद के सुख ॥९४॥

या बानी के कारने, कई करें तपसन । या बानी के कारने, कई पीवें अगिन ॥९५॥

या बानी के कारने, कई दमे देह । या बानी के कारने, कई करें कष्ट सनेह ॥९६॥

या बानी के कारने, कई गले हेम । या बानी के कारने, कई लेवे अंनसन नेम ॥९७॥

या बानी के कारने, कई भैरव झंपावे । या बानी के कारने, तिल तिल देह कटावे ॥९८॥

या बानी के कारने, कई संधान सारे । या बानी के कारने, कई देह जारे ॥९९॥

या बानी के कारने, करें कई बिध ताब । सो मुख थें केते कहूं, हुए जो बिना हिसाब ॥१००॥

किन एक बूंद न पाइया, रसना भी वचन । ब्रह्मांड धनियों देखिया, जो कहावें त्रैगुन ॥१०१॥

और भी नाम अनेक हैं, पर लेऊं कहा के । ब्रह्मांड के धनियों ऊपर, लिए जाए न ताके ॥१०२॥

सो रस सागर इत हुआ, लेहेरें उछले । साथ सबे हम बिलसहीं, बाहेर पूर भी चले ॥१०३॥

पेहेले बीज उदे हुआ, पुरी जहां नौतन । सब पुरियों में उत्तम, हुई धंन धंन ॥१०४॥

फेर कहूं विध सकल, जासों सब समझाए । संसा कोई साथ को, मैं राख्यो न जाए ॥१०५॥

जो रस गोकुल प्रगट्या, सो तो सुख अलेखे । बिन जाने सुख बिलसिया, घर कोई न देखे ॥१०६॥

ए सुख सुपने बिलसिया, साथ पिउ संघाते । घर देखे भागे सुपना, ना देखाय ताथे ॥१०७॥

सुपन भागे सुख क्यों होए, खेल क्यों देखाए । जब सुख वतन लीजिए, नींद उड़के जाए ॥१०८॥

नींद उड़े भागे सुपना, तब फेर फेरा होए । सुख सुपन और वतन, लिए जांए ना दोए ॥१०९॥

या विध साथ समझियो, सुख साथ को दियो । यों बिन जाने बृजमें, सुख सुपने लियो ॥११०॥

अब सुख रास कहा कहूं, जाने निज सुख होए । ए सुख साथ पिउ बिना, न जाने कोए ॥१११॥

ए पिउ सरूप नौतन, नौतन सिनगार । नेह हमारा नौतन, नौतन आकार ॥११२॥

ए बन सुंदर नौतन, नौतन वाओ वाए । जल जमुना नौतन, लेहेरां लेवें बनराए ॥११३॥

सुगंध बेलियां नौतन, जिमी रेत सेत प्रकास । नेहेकलंक चंद्रमा नौतन, सकल कला उजास ॥११४॥

नौतन रंग पसु पंखी, बानी नई रसाल । नौतन वेन बजावहीं, नए सुख देवें लाल ॥११५॥

या रस सुख केते कहूं, कई रेहेस प्रकार । साथ पिउ संग विलास, हम किए अपार ॥११६॥

कई बातें या सुख की, जीव हिरदे जाने । ए सुख पेहेले थें अलेखे, अति अधिकाने ॥११७॥

तेज सबों में मूल का, सबहीं चेतन । थिर चर चेतन ए लीला, ऐसी उतपन ॥११८॥

पर ए सुख सबे सुपन में, नेठ नींद जो मांहें । ए सुख जोग माया मिने, दृष्ट ना घर तांहें ॥११९॥

एक सुख कहे गोकुल के, और सुख रास सुपन । सुख दोऊ क्यों होवही, विचारियो मन ॥१२०॥

जब लीजे सुख सुपन, नहीं वतन दृष्ट । जब सुख वतन देखिए, नहीं सुपन की सृष्ट ॥१२१॥

यों सुख सुपने लिए, कछुए नहीं खबर । इन दोऊ लीला मिने, सुध नाहीं घर ॥१२२॥

या विध लीला दोऊ करी, सिधारे वतन । ए ब्रह्मांड जो तीसरा, ले आए आपन ॥१२३॥

जो मनोरथ मूल का, हुआ नहीं पूरन । बिन सुध विरह विलास किए, यों रही धाख मन ॥१२४॥

धाख क्यों रहे अपनी, ए किया इंड फेर । साथें आए पिउजी, इत दूजी बेर ॥१२५॥

लीला दोऊ पेहेले करी, दूजे फेरे भी दोए । बिना तारतम ए माएने, न जाने कोए ॥१२६॥

एक में उपज्या तारतम, दूजे मिने उजास । सब विध जाहेर होएसी, जागनी प्रकास ॥१२७॥

तारतम जोत उद्दोत है, तिनथे कहा होए । एक सुपन दूृजा वतन, जीव देखे दोए ॥१२८॥

वतन देखते जाहेर, दूजी दोए लीला जो करी । ए सब याद आवहीं, इत दोए दूसरी ॥१२९॥

याद आवें सारे सुख, और जीव नैनों भी देखे । तारतम सब सुख देवहीं, विध विध अलेखे ॥१३०॥

या लीला की बातें इत, जुबां कही न जाए । सुख दोऊ इत लीजिए, मनोरथ पुराए ॥१३१॥

या लीला को जो बल, वचन सब केहेसी । वचन माएने देखके, सब सुख लेसी ॥१३२॥

धंन धंन ब्रह्मांड ए हुआ, धंन धंन भरथखंड । धंन धंन जुग सो कलजुग, जहां लीला प्रचंड ॥१३३॥

धंन धंन पुरी नौतन, जहां लीला उदे हुई । केताक साथ आइया, दूजिऐं सब कोई ॥१३४॥

धंन धंन धनी साथसों, धंन धंन तारतम । पूरन प्रकास ल्‍याए के, सुख दिए हम ॥१३५॥

तारतम रस बेहद का, सब जाहेर किया । बोहोत विधें सुख साथ को, खेल देखते दिया ॥१३६॥

तारतम रस वानी कर, पिलाइए जाको । जेहेर चढ़या होए जिमी का, सुख होवे ताको ॥१३७॥

जो जीव नींद छोड़े नहीं, पिलाइए वानी । ल्याए पिउ वतन थें, बल माया जानी ॥१३८॥

जेहेर उतारने साथ को, ल्याए तारतम । बेहद का रस श्रवनें, पिलावें हम ॥१३९॥

ए रस श्रवनों जाके झरे, ताए कहा करे जेहेर । सुपन ना होवे जागते, देखी तां वैर ॥१४०॥

सुपन होवे नींद थें, कई इंड अलेखे । जिन खिन आंखां खोलिए, तब कछुए ना देखे ॥१४१॥

एही रस तारतम का, चढ़या जेहेर उतारे । निरविख काया करे, जीव जागे करारे ॥१४२॥

जागे सुख अनेक हैं, इतही अलेखे । वतन सुख लीजिए, जीव नैनों भी देखे ॥१४३॥

सुख बड़े तारतम के, क्यों जाहेर कीजे । वानी माएने देखके, जीव जगाए लीजे ॥१४४॥

ए वचन साथ के कारने, मैं तो बाहेर पाड़े । दरवाजे बेहद के, अनेक उघाड़े ॥१४५॥

आधे अखर का पाओ लुगा, कबूं ना बाहेर । श्री धाम थें ल्‍याए धनी, तो हुए जाहेर ॥१४६॥

या खेल साथ देखहीं, जुदे जुदे होए । तो सुख ऐसा पसरया, नाहीं सुख बिना कोए ॥१४७॥

ऐसा खेल छल का, छोड़ाए नहीं । ब्रह्मांड की कारीगरी, सारी करी सही ॥१४८॥

कबूतर बाजीगर के, जैसे कंडिया भरिया । तबहीं देखे फूंक देए के, तुरत खाली करिया ॥१४९॥

ऐसी बाजी इन छल की, ब्रह्मांड जो रचियो । देख बाजी कबूतर, साथ मांहें मचियो ॥१५०॥

आंबों बोए जल सींचियो, तबहीं फूले फलियो । बिध बिध की रंग बेलियां, बन ऊपर चढ़ियो ॥१५१॥

एह देख चित भरमिया, सुध नहीं सरीर । विकल भई रंग बेलियां, चित नाहीं धीर ॥१५२॥

ततखिन कछू न देखिए, बाजीगर हाथ । आंबो ना कछू बेलियां, या रंग बांध्यो साथ ॥१५३॥

बिसरी सुध सरीर की, बिसर गए घर । चींटी कुंजर निगलिया, अचरज या पर ॥१५४॥

अचरज एक बड़ो सखी, देखो दिल मांहें । वस्त खरी को ले गई, जो कछुए नांहें ॥१५५॥

जोर हुई नींद साथ को, यों सुपन बाढ़या । खेल मिने थें बल कर, न जाए काढ़या ॥१५६॥

ता कारन बानी बेहद, केहे नींद टालों । ना देऊं सुपन पसरने, चढ़या जेहेर उतारों ॥१५७॥

कुंजर काढ़ों चींटी मुख, सुध आनो सरीर । तारतम केहे जुदे जुदे, करों खीर और नीर ॥१५८॥

झूठे को झूठा करूं, सांचा सागर तारूं । ए रस श्रवनो पिलाए के, साथ के कारज सारूं ॥१५९॥

मोह जेहेर ऐसा जान के, ल्याए तारतम । सब विध का ए औखद, प्रकासे खसम ॥१६०॥

सब किया उजाला खेल में, साथ देखन आया । और जीव बंधाने या बिध, बिध बिध की माया ॥१६१॥

दूजे तीजे मैं तो कहे, जो साथ को माया भारी । तुम देखो सुपना सत कर, तो मैं कह्या विचारी ॥१६२॥

विचार के छल छोड़िए, तो होवे दोऊ पर । सुपने भी सुख लीजिए, हरखें जागीए घर ॥१६३॥

तारतम पख दूजा कोई नहीं, बिना साथ सब सुपन । जो जगाऊं माया झूठी कर, धाख रहे जिन मन ॥१६४॥

हद के पार बेहद है, बेहद पार अछर । अछर पार वतन है, जागिए इन घर ॥१६५॥

ए दोऊ विध मैं तो कही, सुपन हरखें उड़ाऊं । कहे इंद्रावती उछरंगे, साथ जुगतें जगाऊं ॥१६६॥

॥ प्रकरण ॥३१॥ चौपाई ॥९५४॥

इसी सन्दर्भ में देखें-