प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ३२
दूध पानी का निबेरा - राग सामेरी
हो वतनी बांधो कमर तुम बांधो, सुरत पिआसों साधो । तीनों कांडों बड़ा सुकदेव, ताकी बानी को कहूं भेव ॥१॥
बिन पूछे कहूं विचार, निज वतनी जो निरधार । जिन कोई संसे तुमें रहे, सो मेरी आतम ना सहे ॥२॥
एक वचन इत यों सुनाए, चींटी पांउ कुंजर बंधाए । तिनके पर्वत ढांपिया, सो तो काहूं न देखिया ॥३॥
चींटी हस्ती को बैठी निगल, ताकी काहूं ना परी कल । सनकादिक ब्रह्मा को कहे, जीव मन दोऊ भेले रहे ॥४॥
ए भेले हुए हैं आद, के भेले हैं सदा अनाद । कहे ब्रह्मा भेले नाहीं तित, ए आए मिले हैं इत ॥५॥
तब सनकादिके फेर यों कह्यो, तो ए जुदे करके देओ । फेर ब्रह्मांए करी फिकर, तब देखे वचन विचार चित धर ॥६॥
ए समझ मुझसे ना होए, क्यों कर करों जुदे मैं दोए । तब सरन विष्णु के गए, अंतरगतें वचन कहे ॥७॥
बैकुंठ नाथे सुने वचन, हंस होए आए ततखिन । हंसे रूप धरयो सुंदर, लिए सनकादिक के चित हर ॥८॥
जीवें हंससों करी पेहेचान, चारों चरन लगे भगवान । फेर मनें यों कियो विचार, ले नजरों देख्या आकार ॥९॥
जो जीवें करी पेहेचान, सो मनने तबही दई भान । फेर सनकादिकें यों पूछिया, तुम कौन हो यों कर कह्या ॥१०॥
तब हंसे कियो जवाब, समझे सनकादिक भान्यो वाद । चित किये चारों के धीर, पर ना हुए जुदे खीर नीर ॥११॥
आओ हंस या और कोए, पर कोई जुदे कर ना देवे दोए । दोऊ के जुदे बासन, यों कबहूं ना किए किन ॥१२॥
अब याकी कहूं समझन, जुदे कर देऊं जीव और मन । समझ के पेहेचानों जिउ, निज वतन जो अपना पिउ ॥१३॥
नहीं राखों तुमें संदेह, इन चारों का अर्थ जो एह । जो कोई साध पूछे क्यों, ताए सास्त्र सब केहेवे यों ॥१४॥
अकल अगम बैकुंठ का धनी, ए थोड़ी अजूं करे घनी । इन करते सब कछू होए, पर ए अर्थ ना देवे कोए ॥१५॥
यों धोखा रह्या सब मांहें, समझ काहूं ना परी क्यांहें । अब समझाऊं देखो बानी, दूध विछोड़ा कर देऊं पानी ॥१६॥
जो तुमें साख देवे आतम, तो सत माएने जानो तारतम । इन अंतर देखो उजास, या जीव को बड़ो प्रकास ॥१७॥
चौदे लोक उजाला करे, जो निज वतन दृष्टें धरे । याको नूर सदा नेहेचल, नेक कहूंगी याको आगे बल ॥१८॥
ए उजाला इंड न समाए, सो इन जुबां कह्यो न जाए । या मन को नाहीं कछू मूल, याथे बड़ा कहिए आक का तूल ॥१९॥
तूल का भी कोटमा हिसा, मन एता भी नहीं ऐसा । सो ए गया जीव को निगल, यों सब पर बैठा चंचल ॥२०॥
यों तिनके पर्वत ढांपिया, यों गज चींटी पांऊ बांधिया । जो जीव करे उजास, तो मन को आगे ही होए नास ॥२१॥
अब या पर एक कहूं दृष्टांत, देखो आप में वृतांत । सुकजी के कहे प्रवान, सात सागर को काढ़यो निरमान ॥२२॥
भव सागर को नाहीं छेह, सुकजी यों मुख जाहेर कहे । पेहेले पांउ भरे तुम जेह, कर सांचा मूल सनेह ॥२३॥
सखी बेन सुन ना रही कोई पल, देखियो एह जीव को बल । इन आड़ा था मन संसार, पर जीव निकस्या वार के पार ॥२४॥
देखो पांउ जीवने भरे, भव सागर ए क्यों कर तरे । जाको ना निकस्यो निरमान, सुकजीकी वानी प्रमान ॥२५॥
सो फेर कह्यो गोपद बछ, यों भवसागर होए गयो तुछ । एता भी ना दृष्टें आया, पर लिखने को नाम धराया ॥२६॥
भव सागर क्यों एता भया, जो जीव खरे जीवनजी ग्रह्या । यों मन जीवथें जुदा टल्या, तब झूठा मन झूठे में मिल्या ॥२७॥
खीर नीर देखो विचार, एक धनी दूजा संसार । दोऊ बासन में दोऊ जुद, यों नीके कर देखो हिरदे ॥२८॥
अंतरगत बैठे हैं सही, अंतर उड़ावने बानी कही । विचार देखो तो इतहीं पिउ, सागर तबहीं तूल करे जिउ ॥२९॥
तब इतहीं जो वतन पिउ पार, सखी भाव भजिए भरतार । आतम महामत है सूरधीर, प्रेमें देखाए जुदे खीर नीर ॥३०॥
॥ प्रकरण ॥३२॥ चौपाई ॥९८४॥
