प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ३३
श्री भागवत को सार
सुनियो साथ कहूं विचार, फल वस्त जो अपनों सार । सो ए देखके आओ वतन, माया अमल से राखो जतन ॥१॥
इन अमल को बड़ो विस्तार, सो ए देखना नहीं निरधार । पेहेले आपन को बरजे सही, श्री मुख बानी धनिएं कही ॥२॥
तिन कारन तुमें देखाऊं सार, मूल वतन के सब प्रकार । धनी अपनों धनी को विलास, जिनथें उपज अखंड हुओ रास ॥३॥
ए सुनियो आतम के श्रवन, सो नाहीं जो सुनिए ऊपर के मन । बेद को सार कह्यो भागवत, ए फल उपज्यो सास्त्रों के अंत ॥४॥
सो फल सार सुकजीऐं लियो, सींच के अमृत पकव कियो । ए फल सार जो भागवत भयो, ताको सार दसम स्कंध कह्यो ॥५॥
दसम के नब्बे अध्याय, तिनका सार भी जुदा कह्या । ताको सार अध्याय पैंतीस, जो बृजलीला करी जगदीस ॥६॥
जगदीस नाम विष्णु को होए, यों न कहूं तो समझे क्यों कोए । ए जो प्रेम लीला श्री कृष्णजीऐं करी, सो गोपन में गोपियों चित धरी ॥७॥
ए ब्रह्म लीला भई जो दोए, बृज लीला रास लीला सोए । तामे तीस अध्याय जो बाल चरित्र, ए ब्रह्म लीला उत्तम पवित्र ॥८॥
पंच अध्यायी ताको जो सार, किसोर लीला जोगमाया विस्तार । बृज लीला को जो ब्रह्मांड, रात दिन जित होत अखंड ॥९॥
जोग माया जो लीला रास, रात अखंड सब चेतन विलास । ए लीला सुकें आवेस में कही, राजा परीछितें सही ना गई ॥१०॥
ए लीला क्यों सही जाए, बैकुंठ को अधिकारी राए । सुक के अंग हुओ उलास, जानूं बरनन करूंगो रास ॥११॥
या समें प्रश्न कियो राजान, सुक को जोस दियो तिन भान । प्रश्न चूकयो भयो अजान, रास लीला ना बरनवी प्रवान ॥१२॥
तब हाथ निलाटें दियो सही, सुकें दुख पाए के कही । मैं जोगी तें राजा भयो, रास को सुख न जाए कह्यो ॥१३॥
ए वानी मेरे मुख थें ना परे, ना तेरे श्रवना संचरे । ए जोग आपन नाहीं दोए, तो इन लीला को सुख क्यों होए ॥१४॥
याके पात्र होसी इन जोग, या लीला को सो लेसी भोग । केसरी दूध ना रहे रज मात्र, उत्तम कनक बिना जो पात्र ॥१५॥
एह वचन सुनके राए, पड़यो भोम खाए मुरछाए । कंपमान होए कलकल्या, रोवे बोहोत अंतस्करन गल्या ॥१६॥
तलफ तलफ दुख पावे मन, अंग मांहें लागी अगिन । तब सुकजिऐं दिलासा दिया, आंसूं पोंछ के बैठा किया ॥१७॥
सुनहो राजा द्रढ़ कर मन, अंतरगत केहेता वचन । सो केहेने वाला उठके गया, मैं अकेला बैठा रह्या ॥१८॥
अब राजा पूछत मोहे कहा, तुझ सरीखा मैं हो रह्या । तब परीछित चरन पकड़ के कहे, स्वामी ए दाझ जिन अंगमें रहे ॥१९॥
मुनीजी मैं बोहोत दुख पाऊं, एह दाझ जिन लिए जाऊं । तब भागे जोस कही पंच अध्याई, रास बरनन ना हुआ तिन तांई ॥२०॥
ना तो पंच अध्यायी क्यों कहे सुक मुन, रासलीला अखंड बरनन । ए लीला क्यों अध बीच रहे, एकादस द्वादस स्कंध कहे ॥२१॥
ए रास लीला को छोड़ के सुख, आधा लुगा न निकसे मुख । पर ए केहेवाए धनी के जोस, सो उतर गया वचन के रोस ॥२२॥
क्या करे अधबीच में लिया, अखंड सुख पूरा केहेने ना दिया । दोष नहीं राजा को इत, ब्रह्मसृष्टी बिना न पोहोंचे तित ॥२३॥
जाको जाना बैकुंठ बास, सो क्यों सहे अखंड प्रकास । तो पार दरवाजे मूंदे रहे, हद के संगिए खोलने ना दिए ॥२४॥
अब सुकजी की केती कहूं बान, सार काढ़ने ग्रह्यो पुरान । सबको सार कह्यो ए जो रास, ए जो इंद्रावती मुख हुओ प्रकास ॥२५॥
अब कहूं इन रास को सार, जो तारतम वचन है निरधार । तारतम सार जागनी विचार, सबको अर्थ करसी निरवार ॥२६॥
निराकार के पार के पार, तारतम को जागनी भयो सार । अछर पार घर अछरातीत, धाम के यामें सब चरित्र ॥२७॥
इत ब्रह्म लीला को बड़ो विस्तार, या मुखथें कहा कहूं प्रकार । ए तारतम को बड़ो उजास, धनी आएके कियो प्रकास ॥२८॥
संसे काहूं ना रेहेवे कोए, ए उजाला त्रैलोकी में होए । प्रगट भई परआतमा, सो सबको साख देवे आतमा ॥२९॥
उड़यो अंधेर काढ़यो विकार, निरमल सब होसी संसार । ए प्रकास ले धनी आए इत, साथ लीजो तुम मांहें चित ॥३०॥
इन घर बुलावे ए धनी, ब्रह्मसृष्ट जो है अपनी । खेल किया सो तुम कारन, ए विचार देखो प्रकास वचन ॥३१॥
देख्यो खेल मिल्यो सब साथ, जागनी रास बड़ो विलास । खेलते हंसते चले वतन, धनी साथ सब होए प्रसंन ॥३२॥
इतहीं बैठे जागे घर धाम, पूरन मनोरथ हुए सब काम । उड़यो अग्यान सबों खुली नजर, उठ बैठे सब घर के घर ॥३३॥
हांसी ना रहे पकरी, धनिऐं जो साथ पर करी । हंसते ताली देकर उठे, धनी महामत साथ एकठे ॥३४॥
॥ प्रकरण ॥३३॥ चौपाई ॥१०१८॥
