प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ३४
पख पुष्ट मरजाद प्रवाह
अब कहूं सो हिरदे रख, अठोत्तर सौ जो है पख । एक विचार सुनियो प्रवान, याको सार काढूं निरवान ॥१॥
माया जीव कोई है समरथ, दौड़ करत है कारन अरथ । निसंक आपोपा डारया जिन, निहकर्म पैंडा लिया तिन ॥२॥
पुष्ट मरजाद जो प्रवाह पख, याको सार बताऊं लख । ताके हिसे किए नौं, चढ़े सीढ़ी भगत जल भौं ॥३॥
भी ताके बांटे किए सताईस, चढ़े ऊंचे सुरत बांध जगदीस । सो बांटे किए असी और एक, पोहोंचे बैकुंठ चढ़े या विवेक ॥४॥
तहां चार विध की कही मुगत, करनी माफक पावे इत । इतथें जो कोई आगे जाए, निराकार से ना निकसे पाए ॥५॥
पख बयासिमां जो कह्या, वल्लभाचारज तहां पोहोंचिया । स्यामा वल्लभियों करी बड़ी दौर, ए भी आए रहे इन ठौर ॥६॥
छेद इंड में कियो सही, पर अखंड दृष्टें आया नहीं । आड़ी सुंन भई निराकार, पोहोंच ना सके ताके पार ॥७॥
इनों की तो एह सनंध, पीछे फेर पकड़या प्रतिबिंब । और साध अलेखे केते कहूं, निसंक दौड़ करी जिनहूं ॥८॥
ग्यानी अनेक कथें बहु ग्यान, ध्यानी कई बिध धरें ध्यान । पर ए सबही सुन्य के दरम्यान, छूट्या न काहूं संसे उनमान ॥९॥
उपासनी निरगुन या निरंजन, किन उलंघ्यो न जाय विष्णु को कारन । या सास्त्र या साधू जन, द्वैत सबे समानी सुंन ॥१०॥
इन ऊपर पख है एक, सुनियो ताको कहूं विवेक । पुरुख प्रकृती उलंघ के गए, जाए अखंड सुख मांहें रहे ॥११॥
त्रासिमा पख प्रवान, जो वासना पांचों लिया निरवान । ए पांचो कहूं अपनायत कर, देखांऊं सब्दातीत घर ॥१२॥
ना तो प्रबोध काहे को कहूं, चरन पिया के प्रेमें ग्रहूँ । पर साथ कारन कहूं फेर फेर, ए पांचो नाम लीजो चित धर ॥१३॥
एक भगवानजी बैकुंठ को नाथ, महादेवजी भी इनके साथ । सुकजी और सनकादिक दोए, कबीर भी इत पोहोंच्या सोए ॥१४॥
लखमी नारायन जुदे ना अंग, सो तो भेले विष्णु के संग । ए पांचो कहे मैं तिन कारन, चित ल्याए देखो याके वचन ॥१५॥
देखो सब्द इनों की रोसनी, पर जानेगा बड़ी मत का धनी । पख पचीस या ऊपर होय, तारतम के वचन हैं सोए ॥१६॥
इन वचनों में अछरातीत, श्री धाम धनी साथ सहीत । ए देखो तारतम को उजास, धनी ल्याए कारन साथ ॥१७॥
तुम आपको ना करो पेहेचान, बोहोत ताए कहिए जो होए अजान । तुम जो हो इन घर के प्रवान, सुनते क्यों ना होत गलतान ॥१८॥
सनेहसों सेवा कीजो धनी, घर की पेहेचान देखियो अपनी । तुम प्रेम सेवाएं पाओगे पार, ए वचन धनी के कहे निरधार ॥१९॥
पीछला साथ आवेगा क्योंकर, प्रकास वचन हिरदे में धर । चरने हैं सो तो आए सही, पर पीछले कारन ए बानी कही ॥२०॥
आवसी साथ ए देख प्रकास, अंधकार सब कियो नास । एह वचन अब केते कहूं, इन लीला को पार ना लहूं ॥२१॥
या वानी को नाहीं पार, साथ केता करसी विचार। तिन कारन बोहोत कह्यो न जाए, ए तो पूर बहे दरियाए ॥२२॥
याको नेक विचारे जो एक वचन, ताए घर पेहेचान होवे मिने खिन । जो वासना होसी इन घर, सो एह वचन छोड़े क्यों कर ॥२३॥
ए वचन सुनते बाढ़े बल, सोई लेसी तारतम को फल । तारतम फल जागिए इन घर, कहे महामती ए हिरदे धर ॥२४॥
॥ प्रकरण ॥३४॥ चौपाई ॥१०४२॥
