प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ३५
गुनन की आसंका
अब कछुक मैं अपनी करूं, ना तो तुमे बोहोतक ओचरूं । भी एक कहूं वचन, तुमको संसे रेहेवे जिन ॥१॥
मैं धाम धनी गुन लिखे सही, एक आसंका मेरे मनमें रही । मैं गेहेरे सब्द कहे निरधार, सो साथ क्यों करसी विचार ॥२॥
जोलों आतम ना देवे साख, तोलों प्रबोध भले दीजे दस लाख । पर सो क्योंए ना लगे एक वचन, जोलों ना समझे आतम बुध मन ॥३॥
ताथें यों दिल आई हमको, जिन कोई संसे रहे तुमको । एक प्रवाही वचन यों कहे, मुख थें कहे पर अर्थ ना लहे ॥४॥
सुई के नाके मंझार, कुंजर कई निकसे हजार । ए अर्थ भी होसी इतहीं, तारतम आसंका राखे नहीं ॥५॥
मैं गुन लिखते कही लेखन अनी, ए आसंका जिन होसी घनी । कथुए के पांऊ प्रवान, कलमे गढ़िया हाथ सुजान ॥६॥
तिनकी भी मैं करी चीर, गुन जेती उतारी लीर । अब जिन किनको संसे रहे, तारतम संसे कछू ना सहे ॥७॥
या पर एक कहूं विचार, सुनियो ब्रह्मसृष्ट सिरदार । ए चौद भवन देखो आकार, याके मूल को करो विचार ॥८॥
याको सास्त्र सुपनांतर कहे, कोई याको जीव याको ना लहे । ए सुपन मूल तो है समरथ, याके मूल को देखो अर्थ ॥९॥
सुपन मूल तो नींद जो भई, जब जाग उठे तब कछुए नहीं । याको पेड़ कछू ना रह्यो लगार, कथुए के पांउ का तो मैं कह्या आकार ॥१०॥
बिना पेड़ देखो विस्तार, एता बड़ा किया आकार । एतो पेड़ कह्या आकार, तो ताको क्यों ना होए विस्तार ॥११॥
यों सूई के नाके मांहें, कई लाखों ब्रह्मांड निकसे जांए । अब ए नीके लीजो अर्थ, गुन लिखने वालो समरथ ॥१२॥
अब केता कहूं तुमको विस्तार, एक एह सब्द लीजो निरधार । फेर फेर कहूं मेरे साथ, नीके पेहेचानो प्राण को नाथ ॥१३॥
गुन लिखने वालो सो एह, आपन मांहें बैठा जेह । इंद्रावती कहे दिल दे रे दे, जिन गुन किए सो ए रे ए ॥१४॥
तेरे केहेना होए सो केहे रे केहे, लाभ लेना होए सो ले रे ले । तारतम केहेत है आ रे आ, हजार बार कहूं हां रे हां ॥१५॥
मायासों कीजो ना रे ना, नाबूद फेरा जिन खा रे खा । धनी के चरने जा रे जा, ऐसा न पावे दा रे दा ॥१६॥
जो चूक्या अबको ता रे ता, तो सिर में लगसी घा रे घा । संसार में नहीं कछू सा रे सा, श्री धामधनी गुन गा रे गा ॥१७॥
लीजो मूल को भाओ रे भाओ, जिन छोड़े अपनो चाहो रे चाहो । प्रेमें पकड़ पिउ के पाए रे पाए, ज्यों सब कोई कहे तोको वाहे रे वाहे ॥१८॥
॥ प्रकरण ॥३५॥ चौपाई ॥१०६०॥
