प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ३७
श्री प्रगटवाणी
निजनाम श्री जी साहिब जी, अनादि अछरातीत । सो तो अब जाहेर भए, सब विध वतन सहीत ॥१॥
श्री स्यामाजी वर सत्य हैं, सदा सत सुख के दातार । विनती एक जो वल्लभा, मो अंगना की अविधार ॥२॥
वानी मेरे पिउ की, न्यारी जो संसार । निराकार के पार थें, तिन पार के भी पार ॥३॥
अंग उत्कण्ठा उपजी, मेरे करना एह विचार । ए सत वानी मथ के, लेऊं जो इनको सार ॥४॥
इन सार में कई सत सुख, सो मैं निरने करूं निरधार । ए सुख देऊं ब्रह्मसृष्ट को, तो मैं अंगना नार ॥५॥
जब ए सुख अंग में आवहीं, तब छूट जाएं विकार । आयो आनन्द अखण्ड घर को, श्री अछरातीत भरतार ॥६॥
अब लीला हम जाहेर करें, ज्यों सुख सैयां हिरदे धरें । पीछे सुख होसी सबन, पसरसी चौदे भवन ॥७॥
अब सुनियो ब्रह्मसृष्ट विचार, जो कोई निज वतनी सिरदार । अपनों धनी श्री स्यामा स्याम, अपना वासा है निज धाम ॥८॥
सोई अखंड अछरातीत घर, नित्य बैकुंठ मिने अछर । अब ए गुझ करूं प्रकास, ब्रह्मानंद ब्रह्मसृष्ट विलास ॥९॥
ए बानी चित दे सुनियो साथ, कृपा करके कहें प्राणनाथ । ए किव कर जिन जानो मन, श्री धनीजी ल्याए धामथें वचन ॥१०॥
सो केहेती हूं प्रगट कर, पट टालूं आड़ा अंतर । तेज तारतम जोत प्रकास, करूं अंधेरी सबको नास ॥११॥
अब खेल उपजे के कहूं कारन, ए दोऊ इछा भई उतपन । बिना कारन कारज नहीं होए, सो कहूं याके कारन दोए ॥१२॥
ए उपजाई हमारे धनी, सो तो बातें हैं अति घनी । नेक तामें करूं रोसन, संसे भान देऊं सबन ॥१३॥
अब सुनियो मूल वचन प्रकार, जब नहीं उपज्यो मोह अहंकार । नाहीं निराकार नाहीं सुन्य, ना निरगुन ना निरंजन ॥१४॥
ना ईस्वर ना मूल प्रकृती, ता दिन की कहूं आपा बीती । निज लीला ब्रह्म बाल चरित्र, जाकी इछा मूल प्रकृत ॥१५॥
नैन की पाओ पल में इसारत, कई कोट ब्रह्मांड उपजत खपत । इत खेल पैदा इन रवेस, त्रैलोकी ब्रह्मा विष्णु महेस ॥१६॥
कई बिध खेलें यों प्रकृत, आप अपनी इछासों खेलत । या समें श्री बैकुंठ नाथ इछा दरसन करने साथ ॥१७॥
अछर मन उपजी ए आस, देखों धनीजी को प्रेम विलास । तब सखियों मन उपजी एह, खेल देखें अछर का जेह ॥१८॥
तब हम जाए पियासों कही, खेल अछर का देखें सही । जब एह बात पिया ने सुनी, तब बरजे हांसी करने घनी ॥१९॥
मने किए हमको तीन बेर, तब हम मांग्या फेर फेर फेर । धनी कहें घर की ना रेहेसी सुध, भूलसी आप ना रेहेसी ए बुध ॥२०॥
तो मने करत हैं हम, हमको भी भूलोगे तुम । तब हम फेर धनीसों कह्या, कहा करसी हमको माया ॥२१॥
तब हम मिल के कियो विचार, कह्या एक दूृजी को हूजो हुसियार । खेल देखन की हम पियासों कही, तब हम दोऊ पर अग्या भई ॥२२॥
ए कहे दोऊ भिंन भिंन, खेल देखन के दोऊ कारन । उपज्यो मोह सुरत संचरी, खेल हुआ माया विस्तरी ॥२३॥
इत अछर को विलस्यो मन, पांच तत्व चौदे भवन । यामें महाविष्णु मन मन थें त्रैगुन, ताथें थिर चर सब उतपन ॥२४॥
या बिध उपज्यो सब संसार, देखलावने हमको विस्तार । जो अग्या भई हम पर, तब हम जान्या गोकुल घर ॥२५॥
ज्यों नींद में देखिए सुपन, यों उपजे हम बृज वधू जन । उपजत ही मन आसा घनी, हम कब मिलसी अपने धनी ॥२६॥
जेती कोई हैं ब्रह्मसृष्ट, प्रेम पूरन धनी पर द्रष्ट । कंस के बंध वसुदेव देवकी, इत आई सुरत चत्रभुज की ॥२७॥
सुरत विष्णु की चत्रभुज जोए, दियो दरसन वसुदेव को सोए । पीछे फिरे केहेके हकीकत, अब दोए भुजा की कहूं विगत ॥२८॥
मूल सुरत अछर की जेह, जिन चाह्या देखों प्रेम सनेह । सो सुरत धनी को ले आवेस, नंद घर कियो प्रवेस ॥२९॥
दो भुजा सरूप जो स्याम, आतम अछर जोस धनी धाम । ए खेल देख्या सैयां सबन, हम खेले धनी भेले आनंद घन ॥३०॥
बाल चरित्र लीला जोबन, कई विध सनेह किए सैयन । कई लिए प्रेम विलास जो सुख, सो केते कहूं या मुख ॥३१॥
ए काल माया में विलास जो करे, सो पूरी नींद में सब बिसरे । पूरी नींद को जो सुपन, काल माया नाम धराया तिन ॥३२॥
तब धाम धनिऐं कियो विचार, ए दोऊ मगन हुए खेलें नर नार । मूल वचन की नाहीं सुध, ए दोऊ खेलें सुपने की बुध ॥३३॥
एह बात धनी चितसों ल्याए, आधी नींद दई उड़ाए । अग्यारे बरस और बावन दिन, ता पीछे पोहोंचे वृन्दावन ॥३४॥
तहां जाए के बेन बजाई, सखियां सबे लई बुलाई । तामसियां राजसियां चलीं, स्वांतसियां सरीर छोड़ के मिलीं ॥३५॥
और कुमारका बृज वधू संग जेह, सुरत सबे अछर की एह । जो व्रत करके मिली संग स्याम, मूल अंग याके नाहीं धाम ॥३६॥
बेन सुनके चली कुमार, भव सागर यों उतरी पार । इनकी सुरत मिली सब सखियों मांहें, अंग याके रास में नांहें ॥३७॥
या विध मुक्त इनों की भई, कुमारका सखियां जो कही । ए जो अग्यारे बरस लो लीला करी, काल माया तितही परहरी ॥३८॥
कछू नींद कछू जाग्रत भए, जोग माया के सिनगार जो कहे । जोगमाया में खेले जो रास, आनन्द मन आनी उलास ॥३९॥
जोगमाया में खेल जो खेले, संग जोस धनी के भेले । जोगमाया में बाढ़यो आवेस, सुध नहीं दुख सुख लवलेस ॥४०॥
फेर मूल सरूपें देख्या तित, ए दोऊ मगन हुए खेलत । जब जोस लियो खेंच कर, तब चित चौंक भई अछर ॥४१॥
कौन बन कौन सखियां कौन हम, यों चौंक के फिरी आतम । रास आया मिने जाग्रत बुध, चुभ रही हिरदे में सुध ॥४२॥
कई सुख रास में खेले रंग, सो हिरदे में भए अभंग । या विध रास भयो अखंड, थिरचर जोगमाया को ब्रह्मांड ॥४३॥
तब इत भए अंतरध्यान, सब सखियां भई मृतक समान । जीव न निकसे बांधी आस, करने धनीसों प्रेम विलास ॥४४॥
विरह सैयों ने कियो अत, धनी दियो आवेस फेर आई सुरत । तब सैयों को उपज्यो आनंद, सब विरहा को कियो निकंद ॥४५॥
आया सरूप कर नए सिनगार, भजनानंद सुख लिए अपार । दोऊ आतम खेले मिने खांत, सुख जोस दियो कई भांत ॥४६॥
कई विरह विलास लिए मिने रात, अंग आनंद भयो जोलों प्रात । रास खेल के फिरे सब एह, साथ सकल मन अधिक सनेह ॥४७॥
पीछे जोग माया को भयो पतन, तब नींद रही अछर सैयन । बृज लीलासों बांधी सुरत, अखंड भई चढ़ आई चित ॥४८॥
अछर चितमें ऐसो भयो, ताको नाम सदा सिव कह्यो । बृज रास दोऊ ब्रह्मांड, ए ब्रह्म लीला भई अखंड ॥४९॥
बृज रास लीला दोऊ मांहें, दुख तामसियों देख्या नांहें । प्रेम पियासों ना करे अंतर, तो ए दुख देखें क्यों कर ॥५०॥
कछुक हमको रह्यो अंदेस, सो राखे नहीं धनी लवलेस । ता कारन ए भयो सुपन, हुए हुकमें चौदे भवन ॥५१॥
काल माया को ए जो इंड, उपज्यो और जाने सोई ब्रह्मांड । ए तीसरा इंड नया भया जो अब, अछर की सुरत का सब ॥५२॥
याही सुरत की सखियां भई, प्रतिबिंब वेद रूचा जो कही । जाको कह्यो ऊधो ग्यान जोगारंभ, सो क्यों माने प्रेमलीला प्रतिबिंब ॥५३॥
जो ऊधो ने दई सिखापन, सो मुख पर मारे फेर वचन । याही विरह में छोड़ी देह, सो पोहोंची जहां सरूप सनेह ॥५४॥
अछर हिरदे रास अखंड कह्यो, ए प्रतिबिंब साथ तहां पोहोंचयो । ए प्रतिबिंब लीला भई जो इत, सो कारन ब्रह्मसृष्ट के सत ॥५५॥
जो प्रगट लीला न होवे दोए, तो असल नकल की सुध क्यों होए । ता कारन ए भई नकल, सुध करने संसार सकल ॥५६॥
सारे अर्थ तब होवें सत, जो प्रगट लीला दोऊ होवें इत । याही इंड में श्रीकृष्णजी भए, सो अग्यारे दिन बृज मथुरा रहे ॥५७॥
दिन अग्यारे ग्वालो भेस, तिन पर नहीं धनी को आवेस । सात दिन गोकुल में रहे, चार दिन मथुरा के कहे ॥५८॥
गज मल कंस को कारज कियो, उग्रसेन को टीका दियो । काला ग्रह में दरसन दिए जिन, आए छुड़ाय बंध थें तिन ॥५९॥
वसुदेव देवकी के लोहे भांन, उतारयो भेख किए अस्नान । जब राज बागे को कियो सिनगार, तब बल पराक्रम ना रह्यो लगार ॥६०॥
आय जरासिंध मथुरा घेरी सही, तब श्रीकृष्णजी को अति चिंता भई । यों याद करते आया विचार, तब कृष्ण विष्णु मय भए निरधार ॥६१॥
तब बैकुंठ में विष्णु ना कहे, इत सोले कला संपूरन भए । या दिन थें भयो अवतार, ए प्रगट वचन देखो विचार ॥६२॥
सिसुपाल की जोत वैकुण्ठ गई, समाई श्रीकृष्ण में तित ना रही । आउध अपने मंगाए के लिए, कई बिध जुध असुरों सों किए ॥६३॥
मथुरा द्वारका लीला कर, जाए पोहोंचे विष्णु बैकुंठ घर । अब मूल सखियां धाम को जेह, तिन फेर आए धरी इत देह ॥६४॥
उमेदां तामसियां रही तिन बेर, सो देखन को हम आइयां फेर । इन ब्रह्मांड को एह कारन, सुनियो आतम के श्रवन ॥६५॥
रास खेलते उमेदां रहियां तित, सो ब्रह्मसृष्ट सब आइयां इत । यामें सुरत आई स्यामाजी की सार, मतू मेहेता घर अवतार ॥६६॥
कुंवरबाई माता को नाम, उत्तम काइथ उमरकोट गाम । आए श्री देवचंदजी नौतनपुरी, सुख सबों को देने देह धरी ॥६७॥
इन इत आए करी बड़ी खोज, चाहे धनी को मूल संजोग । अंग मूल उपजी ए दृष्ट, सास्त्र सब्द खोजे कई कष्ट ॥६८॥
चौदे बरसलों नेष्टा बंध, वचन ग्रहे सारी सनंध । कई जप तप किए व्रत नेम, सेवा सरूप सनेह अति प्रेम ॥६९॥
कई कसनी कसी अति अंग, प्रेम सेवा में ना कियो भंग । कई कसौटी करी दुलहिन, सो कारन हम सब सैयन ॥७०॥
पिया किए अति प्रसन, तीन बेर दिए दरसन । तारतम बात वतन की कही, आप धाम धनी सब सुध दई ॥७१॥
धरयो नाम बाई सुन्दर, निज वतन देखाया घर । इत दया करी अति घनी, अंदर आए के बैठे धनी ॥७२॥
दियो जोस खोले दरबार, देखाया सुन्य के पार के पार । ब्रह्मसृष्ट मिने सुन्दरबाई, ताको धनीजीएं दई बड़ाई ॥७३॥
सब सैयों मिने सिरदार, अंग याही के हम सब नार । श्री धाम धनीजी की अरधंग, सब मिल एक सरूप एक अंग ॥७४॥
श्री धाम लीला बैकुंठ अखंड, बृज रास लीला दोऊ ब्रह्मांड । ए सब हिरदे में चढ़ आए, ज्यों आतम अनुभव होत सदाए ॥७५॥
अब ए केते कहूं प्रकार, निजधाम लीला नित बड़ो विहार । अछरातीत लीला किसोर, इत सैयां सुख लेवें अति जोर ॥७६॥
मोहोल मंदिर को नाहीं पार, धाम लीला अति बड़ो विस्तार । इन लीला की काहूं ना खबर, आज लगे बिना इन घर ॥७७॥
ब्रह्मसृष्ट बिना न जाने कोए, ए सृष्ट ब्रह्मथें न्यारी न होए । सो निध ब्रह्मसृष्ट ल्याईयां इत, ना तो ए लीला दुनिया में कित ॥७८॥
ए बानी धनी मुखथें कहे, सो ए दुनियां क्यों कर लहे । गांगजी भाई मिले इन अवसर, तिन ए वचन लिए चित धर ॥७९॥
कर विचार पूछे वचन, नीके अर्थ लिए जो इन । जब समझाई पार की बान, तब धनी की भई पेहेचान ॥८०॥
अपने घरों लिए बुलाए, सेवा करी बोहोत चित ल्याए । सनेहसों सेवा करी जो घनी, पेहेचान के अपना धाम धनी ॥८१॥
तब श्रीमुख वचन कहे प्राणनाथ, ढूंढ काढ़नो अपनो साथ । माया मिने आई सृष्ट ब्रह्म, सो बुलावन आए हैं हम ॥८२॥
हम आए हैं इतने काम, ब्रह्मसृष्ट लेने घर धाम । तब गांगजी भाई पायो अचरज मन, कौन मानसी पार के वचन ॥८३॥
कह्या ब्रह्मसृष्ट क्यों मिलसी, चाल तुमारी क्यों चलसी । मोहजल पूर तीखा अति जोर, नख अंगुरी को ले जाए तोर ॥८४॥
तरंग बड़े मेर से होए, इत खड़ा ना रेहेने पावे कोए । लेहेरें पर लेहेरें मारे घेर, मांहें देत भमरियां फेर ॥८५॥
आड़े टेढ़े मांहें बेहेवट, विक्राल जीव मांहें विकट । दुख रूपी सागर निपट, किनार बेट न काहूं निकट ॥८६॥
ऊंचा नीचा गेहेरा गिरदवाए, कठन समया इत पोहोंच्या आए । हाथ ना सूझे सिर ना पाए, इन अंधेरी से निकस्यो न जाए ॥८७॥
चढ़यो माया को जोर अमल, भूलियां आप मांहें घर छल । ना सुध धनी ना मूल अकल, इन मोहजल को ऐसो बल ॥८८॥
वचन बेहद के पार के पार, सो क्यों माने हद को संसार । त्रैगुन महाविष्णु मोह अहंकार, ए हद सास्त्रों करी पुकार ॥८९॥
ब्रह्मसृष्ट भी धरे मोह के आकार, सो इत आवसी कौन प्रकार । तब श्रीधनीजीएं कहे वचन, बेहेर दृष्ट होसी रोसन ॥९०॥
ए बंधेज कियो अति जोर, रात मेट के करसी भोर । प्रतछ प्रमान देसी दरसन, ए लीला चित धरसी जिन ॥९१॥
साथ कारन आवसी धनी, घर घर वस्तां देसी घनी । साथ मांहें इत आरोगसी, विध विध के सुख उपजावसी ॥९२॥
अचरा पकर पिउ देखलावसी, एक दूजी को प्रेम सिखलावसी । ए लीला बढ़सी विस्तार, साथ अंग होसी करार ॥९३॥
तब बानी को करसी विचार, सब माएने होसी निरवार । तब आवसी ब्रह्मसृष्ट, जाहेर निसान देखसी दृष्ट ॥९४॥
ए बंधेज कियो उत्तम, पर धामकी निध सो कही तारतम । जिन सेती होवे पेहेचान, नजरों आवे सब निसान ॥९५॥
तब गांगजी भाई पाए मन उछरंग, किए करतब अति घनें रंग । सनेहसों सेवा करी जो अत, पेहेचान के धाम धनी हुए गलित ॥९६॥
साथसों हेत कियो अपार, सुफल कियो अपनो अवतार । मैं श्रीसुंदरबाई के चरने रहूं, एह दया मुख किन विध कहूं ॥९७॥
कह्यो ताको इंद्रावती नाम, ब्रह्मसृष्ट मिने घर धाम । मों पर धनी हुए प्रसन्न, सोंपे धाम के मूल वचन ॥९८॥
आद के द्वार ना खुले आज दिन, ऐसा हुआ ना कोई खोले हम बिन । सो कुंजी दई मेरे हाथ, तूं खोल कारन अपने साथ ॥९९॥
मोहे करी सरीखी आप, टालने हम सबों की ताप । आतम संग भई जाग्रत बुध, सुपनथें जगाए करो मोहे सुध ॥१००॥
श्रीधनीजी को जोस आतम दुलहिन, नूर हुकम बुध मूल वतन । ए पांचो मिल भई महामत, वेद कतेबों पोहोंची सरत ॥१०१॥
या कुरान या पुरान, ए कागद दोऊ प्रवान । याके मगज माएने हम पास, अंदर आए खोले प्राणनाथ ॥१०२॥
आप भी ना खोले दरबार, सो मुझ से खोलाए कियो विस्तार । मोहे दई तारतम की करनवार, सो काहूं न अटको निरधार ॥१०३॥
सब संसे को कियो निरवार, कोई संसा ना रह्या वार के पार । रोसन करूं लेऊं हुकम बजाए, ब्रह्मसृष्ट और दुनियां देऊं जगाए ॥१०४॥
द्वार तोबा के खुले हैं अब, पीछे तो दुनियां मिलसी सब । जब द्वार तोबा के मूंदयो, रैन गई भोर जो भयो ॥१०५॥
या भली या बुरी, जिनहूं जैसी फैल जो करी । तब आगूं आई सबों की करनी, जिन जैसी करी आप अपनी ॥१०६॥
तब कोई नहीं किसी के संग, दुख सुख लेवे अपने अंग । करूं ब्रह्मसृष्ट को मिलाप, अखंड सूर उदे भयो आप ॥१०७॥
विश्व मिली करने दीदार, पीछे कोई ना रहे मिने संसार । ब्रह्मसृष्ट को पिया संग सुख, सो कह्यो न जाए या मुख ॥१०८॥
ब्रह्मसृष्ट को ऐसो नूर, जो दुनियां थी बिना अंकूर । ताए नए अंकूर जो कर, किए नेहेचल देख नजर ॥१०९॥
श्री धनीजी को दीदार सब कोई देख, होए गई दुनियां सब एक । किनहूं कछुए ना कह्यो, क्रोध ब्रोध काहूको ना रह्यो ॥११०॥
श्री धनीजी को ऐसो जस, दुनियां आपे भई एक रस । तेज जोत प्रकास जो ऐसो, काहूं संसे ना रह्यो कैसो ॥१११॥
सब जातें मिली एक ठौर, कोई ना कहे धनी मेरा और । पिया के विरह सों निरमल किए, पीछे अखंड सुख सबों को दिए ॥११२॥
ए ब्रह्मलीला भई जो इत, सो कबहूं हुई ना होसी कित । ना तो कई उपज गए इंड, भी आगे होसी कई ब्रह्मांड ॥११३॥
ए तीन ब्रह्मांड हुए जो अब, ऐसे हुए ना होसी कब । इन तीनों में ब्रह्मलीला भई, बृज रास और जागनी कही ॥११४॥
ज्यों नींद में देखिए सुपन, यों बृज को सुख लियो सैयन । सुपन जोगमाया को जोए, आधी नींद में देख्या सोए ॥११५॥
कछुक नींद कछुक सुध, रास को सुख लियो या विध । जागनी को जागते सुख, ए लीला सुख क्यों कहूं या मुख ॥११६॥
जागनी में लीला धाम जाहेर, निसान हिरदे लिए चित धर । तब उपज्यो आनंद सबों करार, ले नजरों लीला नित विहार ॥११७॥
इतहीं बैठे घर जागे धाम, पूरन मनोरथ हुए सब काम । धनी महामत हँस ताली दे, साथ उठा हँसता सुख ले ॥११८॥
॥ प्रकरण ॥३७॥ चौपाई ॥११८५॥
प्रकरण तथा चौपाइयों का संपूर्ण संकलन
प्रकरण १४८, चौपाई ३८९८
॥ प्रकास हिन्दुस्तानी - जंबूर सम्पूर्ण ॥
