प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ४
लीला को प्रकास होना - आत्मा को प्रकास उपज्यो
ना कछू मन में ना कछू चित, ना कछू मेरे हिरदे एती मत । एक वचन सीधा कह्या न जाए, ए तो आयो जैसे पूर दरियाए ॥१॥
श्री सुंदरबाई धनी धाम दुलहिन, इंद्रावती पर दया पूरन । हिरदे बैठ कहे वचन एह, कारन साथ किए सनेह ॥२॥
वचन एक केहेते इन पर, हम घरों जाए के लेसी खबर । अद्रष्ट होए के कहे वचन, साथजी द्रढ करी लीजो मन ॥३॥
आपन करी जो पेहेले चाल, प्रेम मगन बीते ज्यों हाल । ए सब किया अपने कारन, एही पैंडा अपना चलन ॥४॥
दिखलाया सब प्रगट कर, साथ सकल लीजो चित धर । ए जिन करो तुम हलकी बान, धनी कहावत अपनी जान ॥५॥
कहियत सदा प्रबोध वचन, पर कबूं न बानी ए उतपन । तिन कारन तुम सुनियो साथ, आपन में आए प्राणनाथ ॥६॥
बोहोत सिखापन विध विध कही, पर नींद आड़े कछु हिरदे ना रही । नीद उड़ाओ देख नेहेचल रास, ज्यों हिरदे होए पिउ को प्रकास ॥७॥
अब नींद किए की नाहीं ए बेर, पिउ आए बुलावन उड़ाए अंधेर । पेहेले कह्या पिउ प्रगट पुकार, अंतर रहे केहेलाया आधार ॥८॥
मोहे एक वचन ना आवे अस्तुत, पर सोभा दई ज्यों कालबुत । अस्तुत की इत कैसी बात, प्रगट होने करी विख्यात ॥९॥
फल वस्त जो भारी वचन, जीव भी न कहे आगे मन । सो प्रगट किए अपार, जो हुता अखंड घर सार ॥१०॥
प्रगट करी मूल सगाई, कई दिन आपन राखी छिपाई । वचन बड़ा एक ए निरधार, श्री सुंदरबाई केहेते जो सार ॥११॥
ए लीला होसी विस्तार, सूरज ढांप्या ना रहे लगार । ए लीला क्यों ढांपी रहे, जाकी रास धनी एती अस्तुत कहे ॥१२॥
ता कारन तुम सुनियो साथ, प्रगट लीला करी प्राणनाथ । कोई मन में ना धरियो रोष, जिन कोई देओ महामती को दोष ॥१३॥
ए तुम नेहेचे करो सोए, ए वचन महामती से प्रगट न होए । अपने घर की नहीं ए बात, जो किव कर लिखिए विख्यात ॥१४॥
ए बोहोत विध मैं जानूं घना, जो किव नहीं ए काम अपना । पर ए तो नहीं कछू किव की बात, केहेलाया बैठ हिरदे साख्यात ॥१५॥
ए वचन सबे आवेस में कहे, उत्तमबाईऐं भली विध ग्रहे । यों कर कह्या आवेस दे, प्रगट लीला सबमें होसी ए ॥१६॥
मैं मन मांहें जान्या यों, जो किव होसी तो खेलसी क्यों । किव भी हुई वचन विचार, खेली इंद्रावती अनेक प्रकार ॥१७॥
कारज यों सब हुए पूरन, श्री सुंदरबाई की सिखापन । हिरदे बैठ केहेलाया रास, पेहेले फेरे के दोऊ किए प्रकास ॥१८॥
सुनियो साथ तुम एह कारन, धनी ल्याए धाम से आनंद अति घन । ज्यों ना रहे माया को लेस, त्यों धनिऐं कियो उपदेस ॥१९॥
ज्यों तुम पेहेले भरे पांउ, योंही चलो जिन भूलो दाउ । भी देखो ए पेहेले वचन, प्रेम सेवा यों राखो मन ॥२०॥
अब कहूंगी तारतम रोसन कर, ए लीजो साथ नेहेचे चित धर । कहे इंद्रावती अब ऐसा होए, साथ को संसे न रहेवे कोए ॥२१॥
बृज रास तुमको लीला कही, तारतम सों रोसनाई कर दई । अब इन फेरे के कहूं प्रकार, सब साथ ढूंढ काढों निरधार ॥२२॥
॥ प्रकरण ॥४॥ चौपाई ॥५१॥
