प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ५
श्री सुंदरबाई के अंतरध्यान की बीतक
श्री सुंदरबाई स्यामाजी अवतार, पूरन आवेस दियो आधार । ब्रह्मसृष्ट मिने सिरदार, श्री धाम धनीजी की अंगना नार ॥१॥
कई खेल किए ब्रह्मसृष्ट कारन, धनी दया पूरन अति घन । अनेक वचन सैयन को कहे, पर नींद आड़े कछू हिरदे ना रहे ॥२॥
तब भी अनेक विध कही, पर नींद पेड़ की आड़ी भई । भी फेर अनेक दिए द्रष्टांत, पर साथ पकड़ के बैठा स्वांत ॥३॥
तब अनेक धनिऐं किए उपाए, पर सुभाव हमारा क्योंए न जाए । तब अनेक विध कह्या तारतम, पर तो भी अपना न गया भरम ॥४॥
तब अनेक आपन को कहे विचार, कई विध कृपा करी आधार । तब अनेक पखें समझाए सही, तो भी कछू टांकी लागी नहीं ॥५॥
तब विध विध कह्या अनेक प्रकार, तो भी भई सुध न सार । अनेक सनंधें केहे केहे रहे, पख पचीस आपन को कहे ॥६॥
सो भी सेहे कर रहे आपन, नींद ना गई मांहें जागे सुपन । तो भी धनी की बोहोतक दया, अखंड बृज का सुख सब कह्या ॥७॥
भी वरन्यो सुख नेहेचल रास, पहेले फेरे के दोऊ किए प्रकास । रास अखंड रात रोसन, बृज लीला अखंड रात दिन ॥८॥
दोऊ जुदी लीला कही अखंड, तीसरी अखंड लीला ए ब्रह्मांड । किए तारतमें मन वांछित काम, भी देखाया सुख अखंड धाम ॥९॥
दया धनी की है अति घन, कई विध सुख लिए सैयन । सेवा करी धनबाईऐं पेहेचान के धनी, सोभा साथ में लई अति घनी ॥१०॥
साथ सों हेत कियो अपार, धंन धंन धनबाई को अवतार । कछुक लेहेर लागी संसार, ना दई गिरने खड़ी राखी आधार ॥११॥
बेहेवट पूर सह्यो न जाए, कर पकर के दई पोहोंचाए । तो भी सुध न भई आपन, क्योंए न छूटे मोह जल गुन ॥१२॥
तब लरे हमसों अपनायत करी, तो भी नींद हम ना परहरी । कई विध कह्या आप आंझू आन, पर या समें हमको सुध न सान ॥१३॥
तब फेर धनिऐं कियो विचार, साथ घरों ले जाना निरधार । तब संवत सत्रे बारोतरा बरख, भादों मास उजाला पख ॥१४॥
चतुरदसी बुधवारी भई, सनंध सबे श्री बिहारीजीसों कही । मध्यरात पीछे किया परियान, बिहारीजी को सुध भई कछु जान ॥१५॥
इन अवसर मैं भई अजान, मोहे फजीत करी गिनान । ना तो मोहे बुलाए के दई निध, पर या समें न गई मोहजल बुध ॥१६॥
इन समें हुती माया की लेहेर, तो न आया आतम को वेहेर । तब मेरी निध गई मेरे हाथ, श्री धाम तरफ मुख कियो प्राणनाथ ॥१७॥
तब हमसों इसारत करी, कह्या धाम आड़े इंद्रावती खड़ी । मैं पैठ न सकों वह करे विलाप, तब मोहे बुलाए के कियो मिलाप ॥१८॥
ए केहेके साथ को सुनाई, ए इसारत तब हम न पाई । आप भी इत विरह कियो, पर मैं हिरदे में कछू न लियो ॥१९॥
तब अद्रष्ट भए हममें से इत, हम सारे साजे बैठे तित । जो कछू जीव को उपजे भाउ, तो क्यों छोड़े हम पिउ के पांउ ॥२०॥
सो तो सब मैं देख्या द्रष्ट, पर बैठा जीव होए कोई दुष्ट । न तो क्यों सहिए धनी को बिछोह, जो जीव कछू जाग्रत होए ॥२१॥
एक वचन का न किया विचार, न कछू पेहेचान भई आधार । सुनो हो रतनबाई ए कैसा फेर, कौन बुध ऐसी हिरदे अंधेर ॥२२॥
ए बेसुधी कैसी आई, कछू पाई न सुध मूल सगाई । देखो रे सई ऐसी क्यों भई, ए सुख छोड़ मैं अकेली रही ॥२३॥
ए दुख की बातें हैं जो घनी, पर रह्यो जीव कछू अग्या धनी । इन समें जो निध न जाए, तो क्यों आवेस सरूप सहे अंतराए ॥२४॥
फिट फिट रे भूंडी तूं बुध, तें क्यों ना करी अखंड घर सुध । महादुष्ट तूं अभागनी, ना सुध दई जीव को जाते धनी ॥२५॥
ए बातें तें क्योंकर सही, के या समें घर छोड़ के गई । के तूं विकल भई पापनी, बिना खबर निध गई आपनी ॥२६॥
होए आवेस सरूप पेहेचान, पेहेचान पीछे न सहिए हान । तिन कारन जो यों न होए, तो प्रगट लीला क्यों करे कोए ॥२७॥
अब तोको कहा देऊं रे गाल, तूं भूली अवसर अपनो इन हाल । फिट फिट रे भूंडें तूं मन, तें अधरम कियो अति घन ॥२८॥
जीव बराबर बैठा होए, क्यों बैठा तूं ए निध खोए । एती बड़ाई तुझ पर भई, तुझ देखते ए निध गई ॥२९॥
तें ना दई जीव को खबर, नेठ झूठा सो झूठा आखिर । ए क्रोध है बड़ा समरथ, पर आया न मेरे समें अरथ ॥३०॥
गुन अंग इंद्री सबे घारन, कोई न जाग्या जीव के कारन । इन सूरमों किनहूं न खोल्या द्वार, जीव बैठा पकड़ आकार ॥३१॥
धिक धिक रे भूंडा जीव अजान, तेरी सगाई हुती निरवान । रे मुरख तोको कहा भयो, धनी जाते कछू पीछे ना रह्यो ॥३२॥
एती अगनी तें क्योंकर सही, अनेक विध तोको धनिऐं कही । निपट जीव तूं हुआ निठोर, झूठी प्रीत न सक्या तोर ॥३३॥
ऐसा अबूझ अकरमी हुआ इन बेर, कछू न विचारया न छोड़ी अंधेर । ऐसी आपसे ना करे कोए, खोया अपना परवस होए ॥३४॥
ऐसा होए खांगडू जुदा पड़या, एती अगनिऐं अजू न चुड़या । पांच बरस का होए जो बाल, सो भी कछुक करे संभाल ॥३५॥
धनिऐं तोको बोहोतक कह्या, गए अवसर पीछे कछू ना रह्या । तेरी दोरी क्यों न टूटी तिन ताल, फिट फिट रे भूंडा कहां था काल ॥३६॥
ए तो केहेर बड़ा हुआ जुलम, जान्या विरह क्यों सहे खसम । सो मैं अपनी नजरों देख्या, धरम हमारा कछू ना रह्या ॥३७॥
॥ प्रकरण ॥५॥ चौपाई ॥८८॥
