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विषय-सूची

प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ६

विलाप - राग रामश्री

ओहि ओहि करती फिरों, और करों हाए हाए रे । पिउजी बिछोहा क्यों सहूं, जीवरा टूक टूक होए न जाए रे ॥१॥

फिट फिट रे भूंडा तूं सब्द, क्यों आई मुख बान रे । वाओ ना लगी तिन दिस की, निकस ना गए क्यों प्रान रे ॥२॥

तूं रे जुबां ऐसी क्यों वली, कहेते एह वचन रे । खैंच निकालूं तोको मूल थें, जहां से तूं उतपन रे ॥३॥

ए रे पिउजी सिधावते, वाचा क्यों रही तूं अंग । उजड़ ना पड़े दंतड़े, घन घाय मुख भंग रे ॥४॥

तें क्या सुने नहीं श्रवना, प्यारे पिउ के वचन रे । ए रे लवा तुझे सुनते, क्यों ना लगी कानों अगिन रे ॥५॥

चलना पिउ का सुनते, तोहे सब अंगों अगिन ना आई । सुनते आग झाला मिने, दोड़ के क्यों न झंपाई ॥६॥

नीच नैंन ए तुझ देखते, आया न आंखों लोहू । पिउ लौकिक जिनों बिछुरे, ऐसे भी रोवे सोऊ ॥७॥

रोवे लोहू आंखों आंझू चले, सो कहा भयो रोवनहारे । देखत ही पिउ चलना, निकस न पड़े तारे रे ॥८॥

क्यों ना आई बास नासिका, पेहेचान के प्रेमल । पिउ संग जीवरा न चल्या, अंदर लेता था सुगंध सकल ॥९॥

गुन अंग इन्द्रियों की, पिउ बांधते गोली प्रेम काम । पेहेचान करते पोहोंचावने, सनमंध देख धनी धाम ॥१०॥

गुन अंग इंद्री आकार के, आग पड़ो तुम पर रे । प्रेम न उपज्या तुमको, चलते धामधनी घर रे ॥११॥

एती जोगवाई ले तूं आकार, धनी चलते पीछे क्यों रह्या रे । अब जलो रे उड़ो खाखड़े, इन समें गल पिघल न गया रे ॥१२॥

अंग तोहे विरह अगिन की, न लगी कलेजे झाल रे । ए विरहा ले अंग खड़ा रह्या, फिट फिट करम चंडाल रे ॥१३॥

हाथ पांव सब अंग के, सब उजड़ न पड़े संधान । अंग रोम रोम जुदे न हुए, अस्त होते तेज भान ॥१४॥

ए रे निमूना भान का, मेरे पिउजी को दिया न जाए रे । ए जोत धनी इन भांत की, कोट ब्रह्मांड में न समाए रे ॥१५॥

ए जोत पकड़ी ना रहे, चली इंड फोड सुन्य निराकार । सदासिव महाविष्णु निरंजन, सब प्रकृत को कियो निरवार ॥१६॥

सब्दातीत हुते जो ब्रह्मांड, जाए तिनमें करी रोसन रे । अछर प्रकास करके, जाए पोहोंची धाम के बन रे ॥१७॥

सब गिरदवाए बन देखाए के, किए धाम मंदिर प्रकास । ब्रह्मानंद ब्रह्मसृष्ट में, प्रगट कियो विलास ॥१८॥

हांरे ए सुख सैयां लेवहीं, मेरे पिउजी की विरहिन । पीछे तो जाहेर होएसी, देसी अखंड सुख सबन ॥१९॥

ए रे धनी मेरे चलते, ना टूटी रगां क्यों रही खाल रे । रूप रंग रस लेयके, क्यों ना पड़ी आग झाल रे ॥२०॥

हड्डी मांस रगां भेली क्यों रही, ए पकड़ के अंग अंधेर रे । धनी का बिछोहा क्यों सह्या, लोहू ना सूक्या तिन बेर रे ॥२१॥

अंग मेरे आकार के, सातों धात ना गई क्यों सूक रे । एहेरन घन के बीच में, क्यों ना हुई भूक भूक रे ॥२२॥

नैंन नासिका मुख श्रवना, भूंडी खोपड़ी पकड़ तूं क्यों रही रे । तोड़ इनों को जुदे जुदे, तूं क्यों उजड़ ना गई रे ॥२३॥

ए रे पिउजी सिधावते, क्यों ना लग्या कलेजे घाय । काल मेरा कहां चल गया, क्यों न काढी खैंच अरवाय ॥२४॥

नेहेचल निध रे बिछुड़ते, कहां गई वह बुध । धिक धिक रे चंडालनी, तें क्यों भई ऐसी असुध ॥२५॥

ग्यान मेरा तिन समें, क्यों ना किया वतन उजास । तिन समें दगा दिया मुझको, मैं रही तेरे विस्वास ॥२६॥

गुन अंग इंद्री मेरे मुझसों, उलटे क्यों हुए दुस्मन रे । जिन समें हुआ रे बिछोहा, मेरे क्यों न हुए सजन रे ॥२७॥

साहेब मेरा चलते, मेरी सकल सैन्या अंग मांहें । सो काम न आए आतम के, अवसर ऐसो न क्यांहें ॥२८॥

फिट फिट रे सैन्या तुमको, क्या न हुती तुमे पेहेचान रे । जाते जीव का जीवन, तुम क्यों ले न निकसे प्रान रे ॥२९॥

जीवन चलते जीवरा, क्यों छोड़या तें संग रे । अब कहूं रे तोको करम चंडाल, तूं तो था तिनका अंग रे ॥३०॥

नीच करम ऐसा चंडाल, तुझ बिना कोई न करे रे । श्री धनी धाम चले पीछे, इन जिमी में देह कौन धरे रे ॥३१॥

कौन विध कहूं मैं तुझको, कुकरमी करम चंडाल रे । तोहे अंग न उठी अगिन, तो तूं क्यों न झंपाया झाल रे ॥३२॥

झांप न खाई तें भैरव, क्यों कायर हुआ अवसर । तिल तिल तन न ताछिया, जाते ए सुख सागर ॥३३॥

गुन सागर धनी चलते, क्यों किया ऐसा हाल रे । बज्रलेपी रे स्वाम द्रोही, जीव क्यों चूक्या चंडाल रे ॥३४॥

दुष्ट अधरमी केता कहूं, हुआ बेमुख देते पीठ रे । ऐसा समया गमाइया, निपट निठुर जीवरा ढीठ रे ॥३५॥

सब्दातीत के पार के पार, तिन पार जोत का था तेज रे । यासों था तेरा सनमंध, पर तें कछुए न राख्या हेज रे ॥३६॥

तुझमें भी तेज है उन जोत का, और वाही कमल की बास रे । वह तेज फिरते रे तूं तेज, क्यों न पोहोंच्या जोत प्रकास रे ॥३७॥

अब कहा करूं कहां जाऊं, ए बानी धनी ढूंढों कित रे । पिउ पोहोंचाए मैं पीछे रही, करने विलाप रही इत रे ॥३८॥

अब ए बानी तूं कहां सुनसी, मेरे धाम धनी के वचन रे । बरनन करते जो श्रीमुख, सो अब काहूं न पाइए ठौर किन रे ॥३९॥

अब तारतम कौन केहेसी, कौन विचार कर देसी हेत । चौदे भवन में इन धनी बिना, ए बानी कोई ना देत ॥४०॥

बृजलीला रात दिन अखंड, रासलीला अखंड रात रे । पिउजी बिना विवेक कौन केहेसी, हुआ प्रतिबिम्ब तीसरा प्रभात रे ॥४१॥

भेख बागे का बेवरा, रह्या अग्यारे दिन रे । सात गोकुल चार मथुरा, कौन केहेसी विवेक वचन रे ॥४२॥

उत्तम विचार उत्तम बंधेज, और कई विध के द्रष्टांत रे । इन धनी बिना ए दया कर, कौन देसी कर खांत रे ॥४३॥

पन बांध बरस चौदेलो, सास्त्र को अर्थ कौन लेसी । सो ए प्रकास इन पिउ बिना, एक साइत में समझाए कौन देसी ॥४४॥

दूध पानी रे जुदा कर, कौन केहेसी कर रोसन रे । मोहजल गेहेरे में डूबते, कौन काढे या धनी बिन रे ॥४५॥

अठोतर सौ पख का, कौन काढ देसी सार रे । सुख अछर अछरातीत के, कौन देसी बिना आधार रे ॥४६॥

नरसैयां कबीर जाटीय के, और कई साधों सास्त्र वचन रे । काढ दे सार कौन इनका, करके एह मथन रे ॥४७॥

महाप्रले लों जो कोई, सास्त्र पढ करे अभ्यास । बहु विध लेवे विवेकसों, कर मन द्रढ विस्वास ॥४८॥

तो भी न आवे ए विवेक, ना कछू ए मुख बान रे । सो संग धनी के एक खिन में, कर देवें सब पेहेचान रे ॥४९॥

अब अबूझ टाल सुबुध देय के, कौन करसी चतुर वचिखिन रे । नेहेचल निध धनी धाम की, सो कहूं पाइए न चौदे भवन रे ॥५०॥

दूजा कौन देसी रे लड़ के, ऐसी जाग्रत बुध सुजान रे । साथ धाम का जान के, कौन केहेसी हेत चित आन रे ॥५१॥

नींद उड़ाए जगाए के, कौन देसी घर आप पेहेचान रे । खेल देखाए आप देह धर, कौन काढ़सी होए गलतान रे ॥५२॥

त्रैलोकी त्रिगुन माया मिने, हम बैठे थे रचके घर रे । सो नेहेचल धाम में बैठाए के, याको कौन देखावे खेल कर रे ॥५३॥

अब ए चरचा कहां सुनसी, मूल वचन तारतम रे । ए सुने बिना हम क्यों गलसी, बिना बानी इन खसम रे ॥५४॥

और घाट बिना गले, क्यों जीव टल होसी आतम रे । तीन दिवाल आड़ी भई, सो उड़े ना बिना खसम रे ॥५५॥

पांच पचीस जो उलटे, होए बैठे दुस्मन रे । सो नेहेचल घर में बैठाए के, कौन कर देवे सीधे सजन रे ॥५६॥

वैरी मार के कौन जिवावसी, उलटे भान के करे सनमुख रे । या दुख में इन धनी बिना, कौन देवे सांचे सुख रे ॥५७॥

बीच पट आतम परआतमा, कौन उड़ाए कर दे संग रे । इन दुलहे बिना दुलहिनसों, क्यों होसी रस रंग रे ॥५८॥

मोहजल पूर अंधेर में, जित काहू ना किसी की गम रे । तहां से काढ़ देवे सुख नेहेचल, ऐसा कौन बिना इन खसम रे ॥५९॥

इन भवसागर के जीवों में, वासना ढूंढ़ काढे छुड़ाए के फंद रे । आतम अपनी पेहेचान के, कौन पावे आनंद रे ॥६०॥

अब कौन रे करसी ऐसा वरनन, नेहेचल बृज रास धाम रे । ए कौन सुख सैयों को देय के, कौन मिलावे स्यामाजी स्याम रे ॥६१॥

आतम को रे जगाए के, कौन खोले आतम के श्रवन रे । अंतर पट उड़ाए के, कौन केहेसी मूल वचन रे ॥६२॥

फोड़ ब्रह्मांड आड़े आवरण, ताए पोहोंचावे अछर पार रे । सुख अखंड अछरातीत के, कौन देवे बिना इन भरतार रे ॥६३॥

ऊपर बाड़े वाट धाम की, कौन बतावे और रे । इन भेदी बिना भोम क्यों छूटहीं, क्यों पोहोंचिए अखंड ठौर रे ॥६४॥

साथ अजान अबूझ को, कौन लेसी सुधार रे । वासना सगाई पेहेचान के, कौन खोल दे नेहेचल द्वार रे ॥६५॥

सत सागर सुतेज में, बतावत नेहेचल धन रे । सो पूर लेहेरां चल गई, आवत अमोल अखंड रतन रे ॥६६॥

ए धन मेरे धनीय का, आया था मुझ कारन रे । सो धन खोया मैं नींद में, धनी देते कर कर जतन रे ॥६७॥

ए धन जाते मेरे धनी का, सो तूं देख के कैसे रही रे । फिट फिट भूंडी पापनी, तें एती पुकार क्यों सही रे ॥६८॥

फिट फिट रे मेरी आतमा, तें क्यों खोई निध आई हाथ रे । कर दई धनी धाम पेहेचान, तो तूं क्यों न चली पिउ साथ रे ॥६९॥

संग पिउ के न चली, क्यों रही पिउसों बिछुर रे । अजहूं आह तेरी न उड़ी, याद कर अवसर रे ॥७०॥

त्राहि त्राहि करूं रे सजनी, पिउजी दियो मोहे छेह रे । जल बल विरहा आग में, भसम ना हुई जीव देह रे ॥७१॥

कई विध कह्या मोहे पिउजी, पर मैं कछू न कियो सनेह रे । अब तो बैठी धन खोए के, हाथ आया था जेह रे ॥७२॥

धनिऐं तो केहे केहे देखाइया, कर कर मुझसों एकांत रे । पर मैं चूकी चंडालन अवसर, अब पकड़ बैठी मैं स्वांत रे ॥७३॥

अब सब्दातीत निध धाम की, ए कौन केहेसी मुख बान रे । श्री धामके सुख की रे बीतक, कौन केहेसी वर्तमान रे ॥७४॥

उठते बैठते खेलन की, सुध कौन कहे एह सुकन रे । बन जाए अन्हाए के, कौन केहेसी सिनगार बरनन रे ॥७५॥

वस्तर भूखन की विगत, पिउ बिना कौन लेवे रे । ए सुख अनुभव अपना, सनमंध करके कौन देवे रे ॥७६॥

कई सुख अनुभव बन के, कई सुख सातों त्रट रे । सुख ताल मंदिर मोहोलन के, कौन देवे उड़ाए अंतर पट रे ॥७७॥

तीसरी भोम मोहोल सिनगार, और बैठ के आरोग पौढ़न रे । सुखपाल बैठ बन सिधावते, कौन केहेसी पीछला पोहोर दिन रे ॥७८॥

सुख चौथी भोम निरत के, सुख पांचमी भोम पौढ़न रे । ए सुख अनुभव कौन केहेसी, कई विध विलास रैन रे ॥७९॥

कई विध सुख तारतम के, जो कहे वचन सुख मूल रे । या विध हमें कौन कहे बरनन, सनमंध होए सनकूल रे ॥८०॥

देत बिछोहा धनीधाम के, तुम क्यों न किया एह विचार रे । हुती आसा मुखी इंद्रावती, सुख चाहती अखंड अपार रे ॥८१॥

॥ प्रकरण ॥६॥ चौपाई ॥१६९॥

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