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विषय-सूची

प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ७

जाटी भाखा का विलाप

मेरी सैयल रे, साह आए थे मेरे घर । मैं पेहेचान ना कर सकी, पिउ चले पुकार पुकार ॥१॥

पिउ आए ना पेहेचाने, मोहे ना परी सुध । वचन कहे जो हेत के, भांत भांत कई बिध ॥२॥

नींद ऐसी भई निगोड़ी, ए तुम देखो रे सई । दिन दो पोहोरे जागते, मोहे काली रैन भई ॥३॥

घर आए ना पेहेचाने, कहे विध विध के वचन । कान आंखां फूटियां, और फूटे हिरदे के नैन ॥४॥

सजन मेरा चल गया, अब रहूंगी विध किन । वस्त गई जब हाथ थें, अब रोवना रात दिन ॥५॥

मैं तो तब ना उठ सकी, पिउ चले बखत जिन । क्यों खोउं धनी अपना, जो तब पकड़ों चरन ॥६॥

जो मैं तबहीं जागती, तो क्यों जावे मेरा पिउ । क्यों छोड़ों खसम को, संग पिउ के मेरा जिउ ॥७॥

अब तरफ दसो दिस देखिए, तो गेहेरे मोह के जल । मेर जेसी लेहेरां मिने, मांहें मछ गलागल ॥८॥

जल मांहें भमरियां, कई बिध तीखे तान । कहूं सुख नहीं साइत का, ए दुख रूपी निदान ॥९॥

एक घोर अंधेरी आंखां नहीं, और ठौर नहीं बुध मन । विखम जल ऐसे मिने, पिउ आए मुझ कारन ॥१०॥

मांहें भभूके आग के, खाना अमल जेहेर अति जोर । पिउ पुकारे कई विध, मैं उठी ना अंग मरोर ॥११॥

पिउ मेरा मुझ वास्ते, आए ऐसे में आप । कई बिध जगाई मोहे, मैं कर ना सकी मिलाप ॥१२॥

अब कहा करूं कहां जाऊं, टूट गई मेरी आस । कहां वचन कौन बतावे, पिउ ना देखूं पास ॥१३॥

॥ प्रकरण ॥७॥ चौपाई ॥१८२॥

इसी सन्दर्भ में देखें-