प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ८
पुकार चले मेरे पिउजी, मैं तो नींदई में उरझीए । अब ढूंढे मेरा जीव रे, सो सजन अब कित पाइए ॥१॥
सई रे पिउ की बातें मैं कैसे कहूं, मोसों आए कियो मिलाप । मेरे वास्ते माया मिने, क्यों कर डारया आप ॥२॥
आए वतन से पिउ अपना, देखाए के चले राह । आधा गुन जो याद आवे, तो तबहीं उड़े अरवाह ॥३॥
साहेब चले वतन को, केहे केहे बोहोतक बोल । धिक धिक पड़ो मेरे जीव को, जिन देख्या न आंखां खोल ॥४॥
सई रे अनेक भांत मोसों कही, मोहे सालत हैं सो बैन रे । सो भी कह्या आंझू आन के, पर मैं पलक न खोले नैन रे ॥५॥
आंखां पानी भर के, हाथ पकड़ किया सोर । आग परो मेरे जीव को, जाको अजहूं एही मरोर ॥६॥
सई रे अब मैं कहा करूं, मेरा हाल होसी बिध किन । वतन बैठ सैयन में, क्यों कर करूं रोसन ॥७॥
अब सुनो रे तुम सैंयां, कहूं सो बीतक बात । पानी तो पिउजी ले चले, अब तलफूं मछली न्यात ॥८॥
कर कर सोर जो वल्लभा, फिरे जो आप वतन । चले जो मेरे देखते, केहे केहे अनेक वचन ॥९॥
दुलहा मेरा चल गया, मेरी वले न जुबां यों । पल पल वचन पिउ के, मोहे लगे कटारी ज्यों ॥१०॥
आग पड़ो तिन देसड़े, जित पिउ की नहीं पेहेचान । तो भी सुध मोहे न भई, जो हुई एती हान ॥११॥
काट जीव टुकड़े करूं, मांहें भरूं मिरच लोंन । ए दरद पिया इन भांत का, अब ए मेटे कौन ॥१२॥
आग लगी झाला उठियां, जीवरा जले रे मांहें । तलफ तलफ मैं तलफूं, पर ठंडक न दारू क्यांहें ॥१३॥
दुलहा सों जो मैं करी, ऐसी करे न दूजा कोए । विलख विलख पिउजी चले, पर मैं मूंदी आंखां दोए ॥१४॥
अब क्यों करूंगी मैं बातड़ी, सामी क्यों उठाऊंगी मोंह । मेरे हाथ ऐसी भई, खलड़ी उतारूं सिर नोंह ॥१५॥
काटूं तन तरवारसों, भूक करूं हड्डियां तोर । खलड़ी उतारूं पेहेले उलटी, जीव काढूं यों जोर ॥१६॥
तरवार भाले कटारियां, मोहे काट करी टूक टूक । मेरे अंग हुए मुझे दुस्मन, जीव करे मिने कूक ॥१७॥
धाम धनी पेहेचान के, सीधी बात न करी सनमुख । कबूं दिल धनी का मैं न रख्या, अब क्यों सहूंगी ए दुख ॥१८॥
दरद मीठा मेरे पिउ का, ए जो आग दई मुझे तब । अति सुख पाया मैं इनमें, सो मैं छोड़ ना सकों अब ॥१९॥
ऐता सुख तेरे सूल में, तो विलास होसी कैसा सुख । पर मैं ना पेहेचाने पिउ को, मोहे मारत हैं वे दुख ॥२०॥
सब अंग मेरे टुकड़े करूं, भूक करूं देह जिउ । सो वार डारूं तुम दिस पर, इत सेवा हुई कहां पिउ ॥२१॥
हड्डियां जारूं आग में, मांहें मांस डारूं सिर । ए भूली दुख क्योंए न मिटे, ए समया न आवे फिर ॥२२॥
जरा जरा मेरे जीव का, विरहा तेरा करत । चरनें ल्यो इंद्रावती, पेहेले जगाए के इत ॥२३॥
॥ प्रकरण ॥८॥ चौपाई ॥२०५॥
