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विषय-सूची

प्रकास हिन्दुस्तानी - प्रकरण ९

चौपाई प्रगटी है

एक लवो याद आवे सही, तो जीव रहे क्यों काया ग्रही । अब सुनियो साथ कहूं विचार, भूले आपन समें निरधार ॥१॥

गयो अवसर फेर आयो है हाथ, चेतन कर दिए प्राणनाथ । तब जो वासना बाई रतन, लीलबाई के उदर उतपन ॥२॥

श्री देवचंदजी पिता परवान, देख के आवेस दियो निरवान । वचन धनी के कहे निरधार, आवेस पिउजी को है अपार ॥३॥

इन बानिऐं ब्रह्मांड जो गले, तो वासना वानी से क्यों पीछी टले । वासना कारन बांधे बंध, कई भांते अनेक सनंध ॥४॥

ए वानी कही मेरे धनी, आगे कृपा होसी घनी । हरखें साथ जागसे एह, रेहेसे नहीं कोई संदेह ॥५॥

साथ को घरों ले जाना सही, कोई माया में ना सके रही । खैंचे सबों को ए वानी, फिरसी घरों धनी पेहेचानी ॥६॥

भी वाही चरचाने वाही बान, वचन केहेते जो परवान । बृज रास श्रीधाम के सुख, साथ को केहेते जो श्रीमुख ॥७॥

पख पचीस वरनवे जेह, भी सुख वल्लभ देवे एह । अंतरध्यान समे ज्यों भए, भी आए वचन पिया सोई कहे ॥८॥

पेहेले फेरे हुआ है ज्यों, भी इत पिया ने किया है त्यों । सोई पिया और सोई दिन, देखो तारतम के वचन ॥९॥

सोई घड़ी ने सोई पल, मायाऐं बीच डारयो वल । साथ को खिन न्यारे ना करे, बिना साथ कहूं पांउ ना धरे ॥१०॥

बेर ना हुई एक अधखिन, किया मायाऐं बिछोहा घन । मारकंड माया द्रष्टांत, मांगी धनी पे करके खांत ॥११॥

देखो माया को वृतांत, ए दूर होए तो पाइए स्वांत । ततखिन कंपमान सो भयो, माया मिने भिलके गयो ॥१२॥

कल्पांत सात छियासी जुग, कियो मायाऐं बेसुध एते लग । कछुए ना भई खबर, अति दुख पायो रिखीस्वर ॥१३॥

तब नारायनजीऐं कियो प्रवेस, देखाई माया लवलेस । फिरी सुरत आए नारायन, याद आवते गए निसान ॥१४॥

याद आया सरूप बैठा जांहें, तब उड़ गई माया जानों हती नांहें । जाग देखे तो सोई ताल, बीच मायाऐं कियो ऐसो हाल ॥१५॥

माया की तो एह सनंध, निरमल नेत्रे होइए अंध । ता कारन कियो प्रकास, तारतम को जो उजास ॥१६॥

सो ए लेके आए धनी, दया आपन ऊपर है घनी । जाने देखसी माया न्यारे भए, तारतम के उजियारे रहे ॥१७॥

भले तारतम कियो प्रकास, देखाया माया में अखंड विलास । तारतम वचन उजाला करया, दूजा देह माया में धरया ॥१८॥

॥ प्रकरण ॥९॥ चौपाई ॥२२३॥

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