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विषय-सूची

रास - प्रकरण १०

वृंदावन देखाड्यूं छे

राग धनाश्री

जीवन सखी वृंदावन रंग जोइएजी, जोइए अनेक रंग अपार । विगते वन देखाडूं तमने, मारा सुंदरसाथ आधार ॥१॥

आंबा आंबलियो ने आसोपालव, अंजीर ने अखोड । अननास ने आंबलियो दीसे, चारोली चंपा छोड ॥२॥

साग सीसम ने सेमला सरगू, सरस ने सोपारी । सूफ सूकड ने साजडिया, अगर ऊंचो अति भारी ॥३॥

वड पीपल ने वांस वेकला, बोलसरी ने वरणा जी । केवडी केल कपूर कसूंबों, केसर झाड अति घणा जी ॥४॥

मेहेदी नेवरी ने मलियागर, दाडम डोडंगी ने द्राख । बीयो बदाम ने बीली बिजोरो, रूद्राख ने भद्राख ॥५॥

पीपली पारस ने पारजातक, साले ने सीसोटा जी । फणस तूत ने तीन तेवरियां, ताड छे अति मोटा जी ॥६॥

रायण रोइण ने रामण रायसण, लिंबडा लिंबोई लवंग । तज तलसी ने आदू एलची, वाले अति सुगंध ॥७॥

केवडो काथो ने कपूर काचली, भरणी ने भारंगी । सेवण सेरडी सूरण सिगोंटी, नालियरी ने नारंगी ॥८॥

अरणी ऊंमर वेहेडा दीसे, जांबू ने वली जाल । गूंदी गूंदा गुंगल गंगोटी, गहुला ने गिरमाल ॥९॥

उंवरो अगथिया ने आंबलियो, अकलकरो अमृत जी । करमदी ने कगर करंजी, कदम छे अदभुत जी ॥१०॥

बूंद बकान ने कोठ करपटा, निगोड ने वली नेत्र । मरी पानरी ने वली मरूओ, अकोल ने आंकसेत्र ॥११॥

कमलकाकडी ने झाड चीभडी, बोरडी ने वली बहेडा । हिरवण हीमज हरडे मोटी, मोहोला ने वली महूडा ॥१२॥

धामणा धावडी ने वरीयाली, सफल जल भोज पत्र । खसखस फूल दीसे एक जुगते, छोत्रा ऊपर छत्र ॥१३॥

माया मस्तकी ने वरस बडबोहोनी, सकरकंद संदेसर । करोड भरोड ने पलासी, अकथ ने आक सुंदर ॥१४॥

टेवरू कुंदरू ने कबोई, कांकसी ने कलूंब । खेजड खजूरी ने खाखरा दीसे, केसू तणी अति लूंब ॥१५॥

परवती परवाली ने पाडर, पान वेल अति सार । आल अकोल ने बेर उपलेटा, दुधेला ने देवदार ॥१६॥

चंबेली ने चनी चणोठी, चंद्रवंसी चोली ने चीभडी । गलकी ने गिसोटी गोटा, गुलबांस ने गुलपरी ॥१७॥

जाई जुई ने जासू जायफल, जाए ने जावंत्री । सूरजवंसी ने सणगोटी, सूआ ने सेवंत्री ॥१८॥

कोली कालंगी ने कारेली, तुंबडी ने तडबूची । कोठवडी ने चनकचीभडी, टिंडुरी ने खडबूची ॥१९॥

गुलाबी ने कफी डोलरिया, दूधेली ने दोफारी । कमल फूल ने कनीयल केतकी, मोगरेमां झरमरी ॥२०॥

ओलिया वालोलिया ने परवालिया, इसक फाग वेल सार । आरिया तो अति उत्तम दीसे, जाणे कलंगे रंग प्रतकाल ॥२१॥

सहेस्त्र पांखडीनो दमणो दीसे, सोवरण फूली मकरंद । वन सिणगार कीधो वेलडिए, जुजवी जुगतनां रंग ॥२२॥

साक फल अंन अनेक विधना, कंदमूल मांहें सार । सारा स्वाद जुजवी जुगतना, वन फलियां रे अपार ॥२३॥

वन ऊपर वेलडियो चढियो, जो जो ते आ निकुंज । मंदिरना जेम जुगतें दीसे, मांहें अनेक विधना रंग ॥२४॥

बृध आडी तरवर नी डालो, जुगतें वन कुलंभ । भोम ऊपर ऊभा फल लीजे, एम केटली कहूं एह सनंध ॥२५॥

बीजी विध विधनी वनस्पती मौरी, केटला लऊं तेना नाम । जमुनाजी ना त्रट घणूं रूडा, रूडा मोहोल बेसवा ना ठाम ॥२६॥

बेहू कांठे वनस्पति दीसे, झलूबे ऊपर जल । नेहेचल रंग सदा विध विधना, ए वन छे अविचल ॥२७॥

कांठे जल ऊपर वेलडियो, तेमां रंग अनेक । फूलडे जल छाह्युं छे जुगते, विध विधना विसेक ॥२८॥

जमुनाजीना जल जोरावर, मध्य वहे छे नीर । वहेतां जल वले रे खजूरिया, दरपण रंग जाणो खीर ॥२९॥

वृंदावन फूल्यूं बहु फूलडे, सोभा धरे अपार । वन फल उत्तम अति घणूं ऊंचा, कुसम तणा वेहेकार ॥३०॥

रेत सेत सोभा धरे, वृंदावन मंझार । सकल कलानो चंद्रमा, तेज धरा धरे अपार ॥३१॥

गूंजे भमरा स्वर कोयलना, घूमे कपोत चकोर । सूडा बपैया ने वली तिमरा, रमे ते वांदर मोर ॥३२॥

मांहें ते मृग कस्तूरिया, प्रेमल करे अपार । बीजा अनेक विधना पसु पंखी, ते रमे रामत अति सार ॥३३॥

छूटक थड ने घाटी छाया, रमवाना ठाम अति सार । इंद्रावती बाई अति उछरंगे, आयत करे अपार ॥३४॥

आरोग्यां वन फल स्वादे, जल जमुना त्रट सार । वृंदावन वाले जुगतें देखाड्यूं, आगल रही आधार ॥३५॥

एह सरूपने एह वृंदावन, ए जमुना त्रट सार । घरथी तीत ब्रह्मांडथी अलगो, ते तारतमे कीधो निरधार ॥३६॥

॥ प्रकरण ॥१०॥ चौपाई ॥४११॥

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