रास - प्रकरण १९
राग कल्याण - चरचरी
आज राज पूरण काज, मन मनोरथ सुन्दरी । मन मनोरथ सुन्दरी, सखी मन मनोरथ सुन्दरी ॥१॥
विध विधना विलास, मगन सकल साथ । मरकलडे करे हाँस, रेहेस रामत विस्तरी ॥२॥
कह्यो न जाय आनन्द, अंग न माय उमंग । विकसियां अमारा मन, रहियो सर्वे हरवरी ॥३॥
आ समेनो वृन्दावन, जुओ रे आ सोभा चन्द । फूलडे अनेक रंग, रमे साथ परवरी ॥४॥
काबर कोयल स्वर, कपोत घूमे चकोर । मृगला वांदर मोर, नाचत फेरी फरी ॥५॥
स्यामनां उलासी अंग, उलट अमारे संग । मांहों मांहें मकरन्द, व्यापियो विविध पेरी ॥६॥
रामत करे कामनी, विलसतां वाधी जामनी । सखी सखी प्रते स्याम घन, दिए सुख दया करी ॥७॥
रमतां दिए चुमन, एक रस जुवती जन । करी जुगत नौतन, चितडा लीधा हरी ॥८॥
कंठ बाहों वली वली, अनेक विधे रंग रली । लिए अमृत मुख मेली, पिए रस भरी भरी ॥९॥
रस घणो उपजावती, सखी मीठड़े स्वर गावती । नव नवा रंग ल्यावती, इंद्रावती अंग धरी धरी ॥१०॥
॥ प्रकरण ॥१९॥ चौपाई ॥५०८॥
