रास - प्रकरण २९
राग कल्याण
वाला तमे निरत करो मारा नाहोजी रे, अमने जोयानी खांत । साथ जोई आनंदियो रे, कांई वेख देखी एक भांत ॥१॥
तमे निरत करो रे भामनी, निरत रूडी थाय नार । तमे वचन गाओ प्रेमना, पासे स्वर पूरूं रसाल ॥२॥
सुणो सुन्दर वल्लभजी मारा, निरत केणी पेरे थाय । अमने देखाडो आयत करी, कांई उलट अंग न माय ॥३॥
जेणी सनंधे पांउं भरो, अने अंग वालो नरम । भमरी फरो जेणी भांतसुं, अमे नाचूं फरूं तेम ॥४॥
हस्त करी देखाडिए, अने ठमके दीजे पाय । वचन गाइए प्रेमनां, कांई तेना अरथज थाय ॥५॥
कंठ करीने राग अलापिए, कांई स्वर पूरे सकल साथ । वेण वेणा रबाब सों, कांई ताल बाजे पखाज ॥६॥
करताल मां बाजे झरमरी, कांई श्रीमंडल हाथ । चंग तंबूरे रंग मले, वालो नाचे सकल साथ ॥७॥
भूखण बाजे भली भांतसूं, धरती करे धमकार । सब्द उठे सोहांमणा, उछरंग वाध्यो अपार ॥८॥
निरत करी नरम अंगसूं, कांई फेरी फरया एक पाय । छेक वाले छेलाईसूं, तत्ता थेई थेई थाय ॥९॥
एक पोहोर आनंद भरी, कांई रंग भर रमिया एह । साथ सकलमां वालेजी ए, रमतां कीधां सनेह ॥१०॥
आनंद घणो इंद्रावती, वालाजीने लागे पाए । अवसर छे कांई अति घणो, वाला रासनी रामत मांहें ॥११॥
ते सर्वे चित धरी, अमसूं रमो अति रंग । कहे इंद्रावती साथने, रमवानी घणी उमंग ॥१२॥
॥ प्रकरण ॥२९॥ चौपाई ॥५९४॥
