रास - प्रकरण ३४
चरचरी राग केदारो
उछरंग अंग सुंदरी, हेत चित मन धरी । सुख ल्यावियां वालो वली, सुख ल्यावियां वालो वली ॥१॥
कर मांहें कर करी, सकल मली हरवरी । बांहें न मूके स्यामतणी, अलगी न जाय कोय टली ॥२॥
एक एक लिए आलिंघण, एक एक दिए चुमण । बांहोंडी वाली जीवन, खेवना भाजे मली ॥३॥
जीवन मन विमासियूं, सखी केम भाजसे खेवना । आ तां पूर जाणे सायरतणां, एम आव्यां हलीमली ॥४॥
पछे एक वालो एक सुंदरी, एम रमूं रंगें रस भरी । लिए आलिंघण फरी फरी, दाझ अंगतणी गई गली ॥५॥
विनोद हांस अतिघणो, वाले वधारियो सुखतणो । कामनी प्रते कंथ आपणो, एणे सुखे दुख नाख्यां दली ॥६॥
अधुर अमृत पीवतां, कठण कुच खूंचता । स्याम संगे सुख लेवतां, ए लीला अति सवली ॥७॥
साथ मांहें इंद्रावती, वालातणे मन भावती । रस रंगे उपजावती, कांई उपनी छे अति रली ॥८॥
॥ प्रकरण ॥३४॥ चौपाई ॥७०१॥
