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विषय-सूची

रास - प्रकरण ३६

राग वेराडी चरचरी

रमत रास करत हांस, कान्ह मोहन वेल री । कान्ह मोहन वेल, सखी कान्ह मोहन वेल री ॥१॥

रासमां विनोद हांस, हांसमा करूं विलास । पूरतो अमारी आस, करे रंग रेल री ॥२॥

वालैयो वन विलासी, गयो तो अमथी नासी । कठण करीने हांसी, दीधां दुख दोहेल री ॥३॥

सखियो करती मान, तेणे विरह ना कीधां पान । विसरी सरीर सान, एवो कीधो खेल री ॥४॥

मन तामसियो हरती, मान माननियो करती । अंगे न विरह धरती, तो अम पर थई हेल री ॥५॥

आतुर करी सर्वे जन, मीठडां बोले वचन । हेतसूं हरतो मन, एवो अलवेल री ॥६॥

हवे न मूकूं अधखिण, धुतारो छे अतिघण । पल न वालूं पांपण, भूलियो पेहेल री ॥७॥

इंद्रावती कहे साथ, हवे न कीजे विस्वास । खिण न मूकिए पास, एवी बांधो वेल री ॥८॥

॥ प्रकरण ॥३६॥ चौपाई ॥७२१॥

इसी सन्दर्भ में देखें-