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विषय-सूची

रास - प्रकरण ४४

राग मलार

सखी सखी प्रते स्याम, वालेजीए देह धरया । कांई वल्लभसूं आ वार, आनन्द अति करया ॥१॥

मारा पूरण मनोरथ जेह, थया वरसूं मली । कांई रही नहीं लवलेस, वालाजीसूं रंग रली ॥२॥

अमे जेम कहयूं वाले तेम, कीधी रामत घणी । हाम हुती हेडा मांहें, वाले टाली अमतणी ॥३॥

एणे समे जे सुख, थया जे साथमा । कां जाणे वल्लभ, कां जाणे मारी आतमा ॥४॥

जेहेना मनमां जेह, उछाह हुता घणां । सुख दीधां तेहेने तेह, पार नहीं तेहतणां ॥५॥

एम रामत कीधी वन मांहें, रमीने आवियां । ए सुख आ वन मांहें, भला भमाडियां ॥६॥

कहे इंद्रावती साथ, एणी वातो जेटली । न केहेवाय कोटमों भाग, मारे अंग एटली ॥७॥

॥ प्रकरण ॥४४॥ चौपाई ॥८२३॥

इसी सन्दर्भ में देखें-