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विषय-सूची

रास - प्रकरण ४५

राग गोडी - झीलणां

अणी हांरे झीलण रंग सोहामणां रे, आपण झीलसूं वालाजीने साथ । रामत रमीने सहु आवियां, कांई पूरण थयो रंग रास ॥१॥

श्री राज कहे स्यामाजी सुणो, कांई तमारा मनमां जेह । साथ सहुने मनोरथ, कांई रह्यो छे एक एह ॥२॥

अंगे उमंग उपाइने, भेला नाहिए ते भली भांत । झीलणां कीजे मन गमतां, खरी पूरूं तमारी खांत ॥३॥

वेलडिए कुसम प्रेमल, कांई वन झलूवे वाए । फले रस चढ्या कै भांतना, भोम सोभा वाधंती जाए ॥४॥

जल उछले उछरंगमां, लेहेरडियो लेहेर तरंग । पसुपंखीना सब्द सुहामणां, कांई उलट पसरयो अंग ॥५॥

साथ मलीने भेलो थयो, आव्यो ते आनन्द मांहें । अमें सखियो त्रट ऊपर, वालाजीनी ग्रही बांहें ॥६॥

वागा वधारीने कांठे मूकियां, कांई वस्तर पेहेरया झीलण । सखी एक बीजीने आनन्दमां, जल मांहें लागी ठेलण ॥७॥

त्रट जोईने जलमां सांचरया, साथ वालो स्यामाजी संग । परियाणीने थया सहु जुजवा, जल मांहें कीजे आनंद ॥८॥

एकीगमां साथ स्यामाजी, कांई बीजी गमां प्राणनाथ । क्रीडा कीजिए जलमां, विलसिए वालाजीने साथ ॥९॥

जल उछाले उछरंगसूं, सहु वालाजीने छांटे । वालोजी छांटे एणी विधसूं, त्यारे सर्व नासंतियो कांठे ॥१०॥

वली सामी थाय सखियो, जल छांटतियो छोले । वालोजी उछाले जल जोरसूं, त्यारे नासंतियो टोले ॥११॥

वली आवतियो उमंगसूं, वालो वीट्यो ते चारे गंम । सूझे नहीं कांई जल आडे, आंखे आवी गयो छे तम ॥१२॥

एणे समे हवे जे थयूं, बाई इंद्रावतीनूं काम । विध विध विलसी वरसूं, भाजी हैडानीं हाम ॥१३॥

एम जल क्रीडा करी, पछे नाह्या ते पिउजी । घणां रस लीधां अंग चोलतां, वालैयाने विलसी ॥१४॥

स्यामाजीने नवरावियां, पेरे पेरे ते घणी प्रीत । साथ सहु एणी विधे, कांई नाह्यो छे रूडी रीत ॥१५॥

सुंदरबाई इंद्रावती, कांई रत्नावती संग । लालबाई पेहेले निसरयां, सिणगार कीधां सर्वा अंग ॥१६॥

वस्तर भूखण स्यामाजीने, पेहेराव्या भली भांत । अधवीच आवीने वालैए, वेण गूंथी करी खांत ॥१७॥

सिणगार सर्वे सजी करी, स्यामाजी घणूं सोहे । दरपण लईने हाथमां, मन वालानूं मोहे ॥१८॥

आसबाई कमलावती, कांई फूलबाई मल्या । चंपावती चारे मली, सिणगार कीधां भेला ॥१९॥

चार सखी मली श्रीराजने, कराव्या सिणगार । वस्तर भूखण विधोगते, कांई सोभ्या ते प्राण आधार ॥२०॥

एक बीजीने करावियां, सिणगार ते सर्वे एम । चितडू दईने में जोइयूं, कांई साथनो अतंत प्रेम ॥२१॥

परसेवे वस्तर साथना, नाहवा समे उतारया जेह । श्री राज बेठा तेह ऊपर, तमे प्रेम ते जो जो एह ॥२२॥

जमुनाजी ने कांठडे, कांई द्रुमवेलीनी छांहें । साथ सहु मलीने सामटो, कांई आव्यो ते आनंद मांहें ॥२३॥

बेठा मली आरोगवा, कांई सोभित जुजवी पांत । सो सखी सों इंद्रावती, थया प्रीसने भली भांत ॥२४॥

॥ प्रकरण ॥४५॥ चौपाई ॥८४७॥

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