Logo  Kuljam.org

विषय-सूची

रास - प्रकरण ६

श्री ठकुराणीजीनो सिणगार - राग धनाश्री

अखंड सरूपनी अस्थिर आकारे, सोभा कहूं घणवे करीने सनेह । जोई जोई वचन आंणूं कै ऊंचा, पण न आवे वाणी मांहें तेह । सोभा सिणगार, स्यामाजीनो निरखूंजी ॥१॥

ए सोभा न आवे वाणी माहें, पण साथ माटे कहेवाणी । ए लीला साथना रूदेमां रमाडवा, तो में सबदमां आणी ॥२॥

चरण अंगूठा अति भला, पासे कोमल आंगलियो सार । रंग तो अति रलियामणो दीसे, नख हीरा तणां झलकार ॥३॥

हीरा ते पण तेहज भोमना, आ जिभ्या तिहां न पोहोंचाय । आणी जिभ्याए जो न कहूं साथने, तो रूदे प्रकास केम थाय ॥४॥

फणा तो रंग पतंग छे, कांकसा नसो निरमल निरधार । कूकम रंगे पानी सोभे, चरण तली वली सार ॥५॥

लांक तो दीसे अति लेहेकतो, रेखा सोभित अति पायजी । टांकण घूंटीने कांडा कोमल, पीडी ते वरणवी न जायजी ॥६॥

कुंदन केरा अनवट सोहे, विछुडा करे ठमकार । माणक मोती ने नीला पाना, जुगते अति जडाव ॥७॥

कांबी कडला रणझण बाजे, घुंघरी तणां घमकार । हेम तणां वाला मांहें गठिया, मांहें झांझर तणो झमकार ॥८॥

कांबिए नंग आसमानी फूल वेल, जुगते कुंदन जडाव । जडाव लाल नंग नीला पीला, कडले सोभा अति थाए ॥९॥

घूंघरडीनो घाट जुगतनो, कोरे करडा कुंदन । मांहें मोती फरतां दीसे, मध्य जडिया नीला नंग ॥१०॥

झांझरिया एक जुई जुगतना, कोरे लाल जडाव कांगरी । एक हार बे हीरा तणी, बीजी मध्य दरपण रंग दोरी ॥११॥

भूखन चरणे सोभंता, अने बोलंता रसाल । जुजवी जुगतना जवेरज दीसे, करे ते अति झलकार ॥१२॥

वस्तर केणी पेरे वरणवूं, ए तां सायर अति सरूप । मारा जीवनी खेवना भाजवा, हूं तो कहूं गजा सारूं कूप ॥१३॥

नीली ते लाहिनो चरणिया, अने मांहें कसवनी भांत । कोरे कोरे कांगरी, इंद्रावती जुए करी खांत ॥१४॥

कांगरी केरी जुगत जोइए, द्रढ करीने मन । माणक मोती हीरा कुंदन, नीला ते पाच रतन ॥१५॥

भांत तो भली पेरे वरणवुं, मांहें वेल सुनेरी सार जी । वस्तर समियल बणियल दीसे, नव सूझे कोए तार जी ॥१६॥

अनके विध ना फूलज दीसे, मांहे जवेर तणां झलकार जी । नाडी तो अति सोभा धरे, जेमां रंग दीसे अग्यार जी ॥१७॥

नीलो पीलो सेत सेंदुरियो, मांहें कसवनी भांत जी । स्याम गुलालियो अने केसरियो, मांहें जांबू ते रंगनी जात जी ॥१८॥

जुगत एक वली जुई छे, ऊभी लाखी लिबोईनी दोर । मानकदे द्रढ करीने जुए, सोभित बंने कोर ॥१९॥

चीण चरणिए जोइए, मांहें वेल मोती झलकंत । राती नीली चुन्नी कुंदनमां, भली पेरे मांहें भलंत ॥२०॥

ए ऊपर जे सोभा धरे, कांई तेहेनो न लाभे पार । अंग चरणियो प्रगट दीसे, साडी मांहें सिणगार ॥२१॥

छूटक छापा कुंदन केरा, साडी सेंदुरिए रंग । हीरा माणक मोती लसणिया, मध्य पांच वानिना नंग ॥२२॥

सोभा तो घणुए सोहामणी, जो द्रढ करी जोइए मन । झीणा वस्तर ने अति उत्तम, कानिए दोरी त्रण ॥२३॥

मांहें मोती कोरे कसवी, त्रीजी नीली चुंनी सार । अनेक विधनी वेल जो सोभे, छेडे करे झलकार ॥२४॥

सुन्दर लांक सोहामणो, वांसो दीसे साडीमां अंग । वेंण तले कंचुकीनी कसो, जुगते सोहे बंध ॥२५॥

अंगनो रंग निरख्यो न जाय, क्यांहें न माय क्रण क्रांत । पेट पांसा उर कंठ निरखतां, इंद्रावती पामे स्वांत ॥२६॥

अंगनो रंग अजवास धरे, तिहां स्याम चोली सोभावे । सुंदर सर्व सिणगार सोहावे, तिहां लेहेर भूखण क्रण आवे ॥२७॥

कसकसती चोली ने कठण पयोधर, पीला खडपा सोभंत । कस ठामे जे कांगरी, तिहां नीला जवेर झलकंत ॥२८॥

भरत भली पेरे सोभित, कांई पचरंग चुन्नी सार । अनेक विध ना फूल वेल, खुसबोए तणा वेहेकार ॥२९॥

कंचुकी जडाव छे जुगत जुजवी, ऊपर आभ्रण भली भांत । सुंदर सरूप जोई जोईने, मारो जीव थाय निरांत ॥३०॥

कंठ केणी पेरे वरणवु, मारा जीवने नथी कांई बल । पांच हार तिहां प्रगट दीसे, सोभित दोरे वल ॥३१॥

एक हार हीरा तणो, बीजो पाच वरण रतन । त्रीजो हार मोती निरमल नो, कांई चौथो हेम कंचन ॥३२॥

हेम तणो हार जुई रे जुगत नो, नवसर नव पाटली । जडाव हीरा पाच रतन मोती, मांहें माणक ने नीलवी ॥३३॥

उतरी त्रण सर सोभंती, कांई दोरो जडित अचंभ । हूं केणी पेरे वरणवुं, मारी जिभ्या आणे अंग ॥३४॥

कंचुकीना कांठला ऊपर कोरे, कांई दोरे तेज अपार । सात रंगना नंग पाधरा, जोत करे झलकार ॥३५॥

मांहें मोती माणक हीरा, पाना ने पुखराज जी । कुन्दन मांहें रतन नंग झलके, रमवा सुंदरी करे साज जी ॥३६॥

कांठले माणक ने वली मोती, कुन्दन मांहें पाना नंग । चीड तणी चारे सर सोभें, कोई धात वसेकना रंग ॥३७॥

ए ऊपर वली निरखी ने जोइए, तो कंठसरी भली गई अंग । कंठसरी केरी कली जुजवी, कांई जुजवा छे तेहेना नंग ॥३८॥

कंठसरी जडाव जुगतनी, मांहें राती नीली जवेरो नी हार । सकल सिणगार स्यामाजीने सोभे, कुन्दन मां मोती झलकार ॥३९॥

नख थकी कर वरणवुं, एह जुगत अति सारजी । आंगलियो अंगूठा कोमल, नख हीरा तणा झलकार जी ॥४०॥

झीणी रेखा हथेलिए दीसे, पोहोंचा सोभित पतंग जी । आंगलिए वीसा वीस दीसे, कोमल कलाई अति रंग जी ॥४१॥

वीटी जडाव छे छ आंगलिए, सातमी अंगूठी अति सार जी । आभलियोने फरतां पाना, दरपण मां मुख झलकार ॥४२॥

बे वीटी ने हीरा मोती, बीजी बे रंग बे रतन । पांच रंगनी पाच एकने, एकने करडा कंचन ॥४३॥

पोहोंची ने नवघरी दीसे, ऊपर ऊंचा नंग । माणक मोती पाना कुन्दन, ए सोभे पोहोंची ना नंग ॥४४॥

नवघरी ने निरमल मोती, हीरा ने रतन । कुन्दन मांहें पाना पुखराज, चूड मांहें नव रंग ॥४५॥

नव रंगना नंग जुजवा, तेहेना ते जुजवा रूप । हूं मारी बुध सारूं वरणवुं, पण एह छे अदभूत ॥४६॥

नीलवी ने लसणियां सोभित, पाना ने वली लाल । माणक मोती ने हीरा कुन्दन, मांहें रतन तणां झलकार ॥४७॥

कोणी आगल कांकणी, जांबू रंग नंग जडाव । कुन्दन ना करकरियां सोभे, जोत करे अपार ॥४८॥

मोहोलिए मोती ने वली कांगरी, नीली राती चुन्नी कुन्दन । वेल मांहें हीरा हार दीसे, इंद्रावती जुए द्रढ मन ॥४९॥

सुंदर ने सोभे एक जुगते, झण बाजे रसाल । चूड केरा छापा अति सोभे, उर पर लटके माल ॥५०॥

गाल तणो रंग कह्यो न जाय, अधुर परवाली नी भांत । दंत सोभे रंग दाडिम नी कलियो, हरवटी अधुर वचे लांक ॥५१॥

मुख चौक सोभित अति मांडनी, अने झलके काने झाल । जडाव माणक मोती ने हीरा, कुन्दन मां पाना लाल ॥५२॥

नासिका बेसर लाल मोती लटके, आंखडिए अंजन सोहे । पापण चलवे ने पीउजीने पेखे, चतुराईए मन मोहे ॥५३॥

नेंणा चपल अति अणियाला, ने रेखा सोभे मांहें लाल । बेहुगमा भ्रकुटीनी सोभा, टीलडी ते मध्य गुलाल ॥५४॥

मारा साथ सुणो एक वातडी, आ सरूप ते केम वरणवाय । एक भूखण तणी जो भांत तमे जुओ, तो आणे देह जीव न खमाय ॥५५॥

एक बेसर ऊपर लालज दीसे, ते लालक नो न लाभे पार । जेटला मांहें मीट फरी वले, एटले दीसे झलकार ॥५६॥

खीटलडी जडाव भली पेरे, मांहें लाल हीरा सुचंग । माणक मोती नीला पाना, मांहें पांच वानि ना नंग ॥५७॥

करण लवने जे सोभा धरे, ऊपर साडी नी कोरे । सणगटडा मांहें पिउजीने पेखे, आडी द्रष्टें हेरे ॥५८॥

निलवट वेणा चोकडो, पांच मोती तिहां सोभे । लाल पाच कुंदन मांहें सोभित, जोई जोईने जीव थोभे ॥५९॥

पटली सामी छ फूली सोभे, मध्य सेंदुरनी रेखे । बेहू गमा मोती सर सोभे, इंद्रावती खांत करी पेखे ॥६०॥

चार फूली ते फरती दीसे, बे फूली अणियाली । मध्य लाल मोती फरतां पाना, ए जुगत क्यांहे न भाली ॥६१॥

राखडली मां रतन नंग झलके, हीरा पाना बेहू भांत । माणक मोती फरतां दीसे, वेण चुए गूंथी अख्यात ॥६२॥

पांच रंगना पांचे फुमक, सोहे मूल वेणनें बंध । गोफणडे फुमक जे दीसे, तेहेनो स्याम कसवी रंग ॥६३॥

गोफणडे घूंघरडी फरती, अने बोलंती रसाल । फरता पाना दोरी बंध सोभे, वेण लेहेके जेम व्याल ॥६४॥

मुख मांहें बीडी तंबोलनी, मंद मरकलडो सोभे । इंद्रावती नेंणेसूं निरखे, अति घणूं करीने लोभे ॥६५॥

मुखडूं निहाले अंगूठीमां, सोभा धरे सर्वा अंग । सणगटडो सिणगार सोभावे, श्री कृष्णजी केरी अरधंग ॥६६॥

मुखथी वाणी जे ओचरे, कांई ए स्वर अति रसाल । एक मात्र कणका जो रूदे आवे, तो थाय फेरो सुफल संसार ॥६७॥

सूच्छम सरूप ने उनमद अंगे, केणी पेरे ए वरणवाय । मारी बुध सारूं हूं वरणवुं, इंद्रावती लागे पाय ॥६८॥

पांउं भरे एक भांतसूं, स्यामाजी सोभे एणी चाल । जीव निरखीने नेत्र ठरे, इंद्रावती लिए रंग लाल ॥६९॥

ए सिणगार जोइए ज्यारे निरखी, त्यारे सूं करे मायानो पास । साथ सकल तमे जो जो विचारी, वली स्यामा ते आव्या साख्यात ॥७०॥

सुंदर सोभा स्यामाजी केरी, निरखी निरखी ने निरखूं जी । अंतर टालीने एक थया, इंद्रावती कहे हूं हरखूं जी ॥७१॥

॥ प्रकरण ॥६॥ चौपाई ॥२५५॥

इसी सन्दर्भ में देखें-