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विषय-सूची

रास - प्रकरण ८

श्री राजजीनो सिणगार

पेहेलो सिणगार कीधो मारे वालेजीए, तेहेनो ते वरणवुं लवलेस । पछे संवाद वालाजी साथनो, ते मारी बुध सारूं कहेस ॥१॥

सोभा रे मारा स्याम तणी, सखी केणी पेरे वरणवुं एह । सब्दातीत मारा वालाजीनी सोभा, मारी जिभ्या आंणी देह ॥२॥

चरण तणा अंगूठा कोमल, नख हीरा तणा झलकार । रंग तो जोई जोई मोहिए, पासे कोमल आंगलियो सार ॥३॥

फणा नसो अने कांकसा, अति रंग घणू रे सोहाए । जीव थकी अलगां नव कीजे, राखिए चरण चित मांहें ॥४॥

चरण तले पदमनी रेखा, करे ते अति झलकार । पानी लांक लाल रंग सोभे, इंद्रावती निरखे करार ॥५॥

टांकन घूंटी ने कांडा कोमल, कांबी कडला बाजे रसाल । घूंघरडी घम घम स्वर पूरे, मांहें झांझर तणो झमकार ॥६॥

कांबी कडला जुगते जडियां, सात वानि ना नंग सार । लाल पाना हीरा माणक नीलवी, कुन्दनमां मोती झलकार ॥७॥

झांझरियां जडाव जुगतनां, करकरियां सोभंत । घूंघरडी करडा जडतरमां, झलहल हेम करंत ॥८॥

कनक तणां वाला माहें गठिया, निरमल नाका झलकंत । झांझरियांमां जुगते जडियां, भली पेरे मांहें भलंत ॥९॥

पीडी ऊपर पायचा, ने झीणी कुरली झलवार । केसरिए रंग सूथनी, इंद्रावती निरखे करार ॥१०॥

मोहोलिए मोती ने वली नेफे, वेल टांकी बेह भांत । नाडी मांहें नव रंग दीसे, मानकदे जुए करी खांत ॥११॥

सेत स्याम ने सणिए सेंदुरिए, कखूवर बंने कोर । नीलो पीलो जांबू गुलालियो, ए सोभा अति जोर ॥१२॥

पीली पटोली पेहेरी एक जुगते, मांहें विविध पेरे जडाव । जीव तणु जीवन ज्यारे जोइए, त्यारे नव मूकाय लगार ॥१३॥

कोरे वेल जडाव जुगतनी, मध्य जडावना फूल । जडाव झलहल जोर करे, चीर कानियांनी कोरे मस्तूल ॥१४॥

माणक मोती ने नीली चुंन्नी, फूल वेल माहे झलकंत । सोभा मारा स्यामजीनी जोई जोई जोइए, मारी तेणे रे काया ठरंत ॥१५॥

नीलो ने कांई पीलो दीसे, कणा तणो रंग जेह । काणी छेडा जडाव जुगते, लवलेस कहूं हूं तेह ॥१६॥

छेडे हेम हीराने पुखराज पाना, कोरे माणक नीलवी ने मोती । काणी छेडा जुजवी जुगते, इंद्रावती खांत करी जोती ॥१७॥

अंगनो रंग कह्यो न जाय, जाणे तेज तणो अंबार । पेट पासा उरकंठ निरखता, इंद्रावती पामे करार ॥१८॥

रतन हीराना बे हार दीसे, त्रीजो हेम तणो जडाव । चौथो हार मोती निरमलनो, करे जुजवी जुगत झलकार ॥१९॥

उतरी जडाव सर बे सोभंती, चुंनी राती नीली जुगत । निरखी निरखी ने नेत्र ठरे, पण केमे न पामिए तृपत ॥२०॥

रंग सेंदुरिए पछेडी, अने माहें कसवनी भांत । छेडे तार ने कसवी कारे, इंद्रावती जुए करी खांत ॥२१॥

अंग ऊपर आणी बंने चौकडी, छेडा बंने पासे लटकंत । नवल वेख लीधो एक भांतनो, जोई जोई ने जीव अटकंत ॥२२॥

कोमल कर एक जुई रे जुगतना, जो वली जोइए रंग । झलकत नख अंगूठा आंगलियो, पोहोंचा कलाई पतंग ॥२३॥

झीणी रेखा हथेली आंगलिए, सात वीटी सोभंत । त्रण वीटी ऊपर नंग दीसे, अति घणुं ते झलकंत ॥२४॥

अंगूठिए लाल चुन्नी जडतर, बे वीटी हीरा रतन । एक वीटी ने नीलू पानू, बीजा वाकडा वेलिया कंचन ॥२५॥

कोमल कांडे कडली सोभे, नीली जडित अति सार । कडली पासे पोहोंची घणी ऊंची, करे ते अति झलकार ॥२६॥

मध्य माणक ने फरता मोती, पाच तणो नीलास । किरण ज्यारे उठतां जोइए, त्यारे जोत न माय आकास ॥२७॥

कोमल कोणी चंदन अंग चरचित, मणि जडित बाजूबंध । कंचन कसवी फुमक बेह लटके, सूं कहूं सोभा सनंध ॥२८॥

जोइए मुखारविंद गाल बंने गमां, तेज कह्यो न जाय । अधखिण जो अलगा रहिए, त्यारे चितडां उपापला थाय ॥२९॥

हरवटी सोहे हंसत मुख दीसे, वली जोइए अधुरनो रंग । दंत जाणे दाडिमनी कलियो, अधुर परवालीनो भंग ॥३०॥

मुख ऊपर मोती निरमल लटके, बेसर ऊपर लाल । काने करण फूल जे सोभा धरे, ते ता झलके मांहें गाल ॥३१॥

करणफूल छे अति घणूं ऊंचा, राती नीली चुन्नी सार । निरखी निरखी जीव निरांते, मांहें मोतीडा करे झलकार ॥३२॥

खीटलडी वालाजी केरी, जीव करे रे जोयानी खांत । माणक मोती हीरा पुखराज, कुंदन मांहें जडियां भांत ॥३३॥

आंखडली अणियाली सोभे, मध्य रेखा छे लाल । निरखत नेंण कोडामणा, जीवने ताणी ग्रहे तत्काल ॥३४॥

मीठी पांपण चलवे एक भांते, तारे तेज अपार । बेहुगमां भ्रुकुटीनी सोभा, इंद्रावती निरखे करार ॥३५॥

निलवट सोभे तिलक नी रेखा, नीली पीली गुलाल । बेहुगमां सुन्दर ने सोभे, रेखा मध्य बिंदका लाल ॥३६॥

मस्तक मुकट सोहामणो, कांई ए सोभा अति जोर । लाल सेत ने नीली पीली, दोरी सोभित चारे कोर ॥३७॥

ए ऊपर जवदाणा नी सोभा, एह जुगत अदभूत । ते ऊपर वली फूलोनी जडतर, तेना केम करी वरणवुं रूप ॥३८॥

बीजा अनेक विधना फूल दोरी बंध, करे जुजवी जुगत झलकार । माणक मोती हीरा पुखराज, पिरोजा पाना पांचों सार ॥३९॥

लाल लसणिया नीलवी गोमादिक, साढ सोलू कंचन । फूल पांखडियो मणि जवेरनी, मध्य जड्या छे रतन ॥४०॥

मुकट ऊपर ऊभी जवेरोनी हारो, तेमां रंग दीसे अपार । अनेक विधनी किरणज उठे, ते तां ब्रह्मांड न माय झलकार ॥४१॥

चार हारना चारे फुमक, तेहेना जुजवी जुगतना रंग । लाखी लिबोई ने स्याम सेत, सुंदर ने ए सोभंत ॥४२॥

वेण गूंथी एक नवल भांतनी, गोफणडे विविध जडाव । फरती फरती घूंघरडी, ने बोलंती रसाल ॥४३॥

गोफणडे फुमक जे दीसे, तेनो लाल कसवी रंग । जडाव मांहें माणक ने मोती, पाना पुखराज नंग ॥४४॥

वांसा ऊपर वेंण लेहेकती, सोभा ते वरणवी न जाए । खुसबोय मांहें रंग भीनो, बीडी तंबोल मुख मांहें ॥४५॥

नवल वेख ल्याव्या एक भांतनो, कसबटिए वांसली लाल । अधुर धरीने ज्यारे वेण बजाडे, त्यारे चितडा हरे तत्काल ॥४६॥

वेण तणी विगत कहूं तमने, कोरे कांगरी जडाव । मोहोवड नीला मध्य लाल, छेडे आसमानी रंग सोहाय ॥४७॥

वस्तर वरणव्यां सब्द मांहें सखियो, वली वरणवी भूखणनी भांत । रेसम हेम कह्या में जवेरना, पण ए छे वसेक कोय धात ॥४८॥

सज थया सिणगार करीने, रास रमवानूं मन मांहें । साथ सकल मारा पिउ पासे आव्यो, इंद्रावती लागे पाए ॥४९॥

दई प्रदखिणा अति घणी, साथें कीधा दंडवत परणाम । हवे करसूं रामत रंग तणी, अने भाजसूं हैडानी हाम ॥५०॥

॥ प्रकरण ॥८॥ चौपाई ॥३१७॥

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