श्री सागर
श्री कुलजम सरूप के चौदह ग्रन्थों में से एक सागर है । यह ज्ञान परब्रह्म के आवेश स्वरूप श्री प्राणनाथ जी के मुख से पन्ना में प्रकट हुआ और इसकी शैली चौपाइयों के रूप में है ।
विषय सूची-
- भोम तले की क्यों कहूं (सागर पेहेला नूर का)
- हक बैठे रूहों मिलाए के (सागर दूसरा रूहों की शोभा)
- लेहेरी सुख सागर की (ढाल दूसरा इसी सागर)
- अब कहूं सागर तीसरा (सागर तीसरा एक दिली रूहन की)
- चौदे तबक की दुनी में (सागर चौथा जुगल किसोर का सिनगार - श्री राजजी का सिनगार पेहेला)
- बरनन करूं बड़ी रूह की (श्री ठकुरानी जी को सिनगार पेहेलो)
- इन बिध साथजी जागिए (चौसठ थंभ चौक खिलवत का बेवरा)
- अर्स तुमारा मेरा दिल है (श्री राजजी को सिनगार दूसरो)
- बरनन करूं बड़ी रूह की (श्री ठकुरानी जी का सिनगार दूसरा)
- फेर फेर सरूप जो निरखिए (श्री राजजी का सिनगार तीसरा)
- सुन्दर साथ बैठा अचरज सों (श्री सुन्दर साथ को सिनगार)
- पांचमा सागर पूरन (सागर पांचमा इस्क का)
- सागर छठा है अति बड़ा (सागर छठा खुदाई इलम का)
- अब कहूं दरिया सातमा (सागर सातमा निसबत का)
- और सागर जो मेहेर का (सागर आठमा मेहेर का)
