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विषय-सूची

सागर - प्रकरण १५

सागर आठमा मेहेर का

और सागर जो मेहेर का, सो सोभा अति लेत । लेहेरें आवें मेहेर सागर, खूबी सुख समेत ॥१॥

हुकम मेहेर के हाथ में, जोस मेहेर के अंग । इस्क आवे मेहेर से, बेसक इलम तिन संग ॥२॥

पूरी मेहेर जित हक की, तित और कहा चाहियत । हक मेहेर तित होत है, जित असल है निसबत ॥३॥

मेहेर होत अव्वल से, इतहीं होत हुकम । जलूस साथ सब तिनके, कछू कमी न करत खसम ॥४॥

ए खेल हुआ मेहेर वास्ते, माहें खेलाए सब मेहेर । जाथें मेहेर जुदी हुई, तब होत सब जेहेर ॥५॥

दोऊ मेहेर देखत खेल में, लोक देखें ऊपर का जहूर । जाए अन्दर मेहेर कछू नहीं, आखिर होत हक से दूर ॥६॥

मेहेर सोई जो बातूनी, जो मेहेर बाहेर और माहें । आखिर लग तरफ धनी की, कमी कछुए आवत नाहें ॥७॥

मेहेर होत है जिन पर, मेहेर देखत पांचों तत्व । पिंड ब्रह्माण्ड सब मेहेर के, मेहेर के बीच बसत ॥८॥

दुख रूपी इन जिमी में, दुख न काहूं देखत । बात बड़ी है मेहेर की, जो दुख में सुख लेवत ॥९॥

सुख में तो सुख दायम, पर स्वाद न आवत ऊपर । दुख आए सुख आवत, सो मेहेर खोलत नजर ॥१०॥

इन दुख जिमी में बैठके, मेहेरें देखें दुख दूर । कायम सुख जो हक के, सो मेहेर करत हजूर ॥११॥

मैं देख्या दिल विचार के, इस्क हक का जित । इस्क मेहेर से आइया, अव्वल मेहेर है तित ॥१२॥

अपना इलम जिन देत हैं, सो भी मेहेर से बेसक । मेहेर सब बिध ल्यावत, जित हुकम जोस मेहेर हक ॥१३॥

जाको लेत हैं मेहेर में, ताए पेहेले मेहेरें बनावें वजूद । गुन अंग इंद्री मेहेर की, रूह मेहेर फूंकत माहें बूद ॥१४॥

मेहेर सिंघासन बैठक, और मेहेर चँवर सिर छत्र । सोहोबत सैन्या मेहेर की, दिल चाहे मेहेर बाजंत्र ॥१५॥

बोली बोलावें मेहेर की, और मेहेरै का चलन । रात दिन दोऊ मेहेर में, होए मेहेरें मिलावा रूहन ॥१६॥

बंदगी जिकर मेहेर की, ए मेहेर हक हुकम । रूहें बैठी मेहेर छाया मिने, पिएं मेहेर रस इस्क इलम ॥१७॥

जित मेहेर तित सब है, मेहेर अव्वल लग आखिर । सोहोबत मेहेर देवहीं, कहूं मेहेर सिफत क्यों कर ॥१८॥

ए जो दरिया मेहेर का, बातून जाहेर देखत । सब सुख देखत तहां, मेहेर जित बसत ॥१९॥

बीच नाबूद दुनी के, आई मेहेर हक खिलवत । तिन से सब कायम हुए, मेहेरै की बरकत ॥२०॥

बरनन करूं क्यों मेहेर की, सिफत ना पोहोंचत । ए मेहेर हक की बातूनी, नजर माहें बसत ॥२१॥

ए मेहेर करत सब जाहेर, सब का मता तोलत । जो किन कानों ना सुन्या, सो मेहेर मगज खोलत ॥२२॥

बरनन करूं क्यों मेहेर की, जो बसत हक के दिल । जाको दिल में लेत हैं, तहां आवत न्यामत सब मिल ॥२३॥

बरनन करूं क्यों मेहेर की, जो बसत है माहें हक । जाको निवाजें मेहेर में, ताए देत आप माफक ॥२४॥

बात बड़ी है मेहेर की, जित मेहेर तित सब । निमख ना छोड़ें नजर से, इन ऊपर कहा कहूं अब ॥२५॥

जहां आप तहां नजर, जहां नजर तहां मेहेर । मेहेर बिना और जो कछू, सो सब लगे जेहेर ॥२६॥

बात बड़ी है मेहेर की, मेहेर होए ना बिना अंकूर । अंकूर सोई हक निसबत, माहें बसत तजल्ला नूर ॥२७॥

ज्यों मेहेर त्यों जोस है, ज्यों जोस त्यों हुकम । मेहेर रेहेत नूर बल लिए, तहां हक इस्क इलम ॥२८॥

मीठा सुख मेहेर सागर, मेहेर में हक आराम । मेहेर इस्क हक अंग है, मेहेर इस्क प्रेम काम ॥२९॥

काम बड़े इन मेहेर के, ए मेहेर इन हक । मेहेर होत जिन ऊपर, ताए देत आप माफक ॥३०॥

मेहेरें खेल बनाइया, वास्ते मेहेर मोमिन । मेहेरें मिलावा हुआ, और मेहेर फरिस्तन ॥३१॥

मेहेरें रसूल होए आइया, मेहेरें हक लिए फुरमान । कुंजी ल्‍याए मेहेर की, करी मेहेरें हक पेहेचान ॥३२॥

दई मेहेरें कुंजी इमाम को, तीनों महंमद सूरत । मेहेरें दई हिकमत, करी मेहेरें जाहेर हकीकत ॥३३॥

सो फुरमान मेहेरें खोलिया, करी जाहेर मेहेरें आखिरत । मेहेरें समझे मोमिन, करी मेहेरें जाहेर खिलवत ॥३४॥

ए मेहेर मोमिनों पर, एही खासल खास उमत । दई मेहेरें भिस्त सबन को, सो मेहेर मोमिनों बरकत ॥३५॥

मेहेरें खेल देख्या मोमिनों, मेहेरें आए तले कदम । मेहेरें कयामत करके, मेहेरें हँसके मिले खसम ॥३६॥

मेहेर की बातें तो कहूं, जो मेहेर को होवे पार । मेहेरें हक न्यामत सब मापी, मेहेरें मेहेर को नहीं सुमार ॥३७॥

जो मेहेर ठाढ़ी रहे, तो मेहेर मापी जाए । मेहेर पल में बढ़े कोट गुनी, सो क्यों मेहेरें मेहेर मपाए ॥३८॥

मेहेरें दिल अर्स किया, दिल मोमिन मेहेर सागर । हक मेहेर ले बैठे दिल में, देखो मोमिनों मेहेर कादर ॥३९॥

बात बड़ी है मेहेर की, हक के दिल का प्यार । सो जाने दिल हक का, या मेहेर जाने मेहेर को सुमार ॥४०॥

जो एक वचन कहूँ मेहेर का, ले मेहेर समझियो सोए । अपार उमर अपार जुबांए, मेहेर को हिसाब न होए ॥४१॥

निपट बड़ा सागर आठमा, ए मेहेर को नीके जान । जो मेहेर होए तुझ ऊपर, तो मेहेर की होय पेहेचान ॥४२॥

सात सागर बरनन किए, सागर आठमा बिना हिसाब । ए मेहेर को पार न आवहीं, जो कई कोट करूँ किताब ॥४३॥

ए मेहेर मोमिन जानहीं, जिन ऊपर है मेहेर । ताको हक की मेहेर बिना, और देखें सब जेहेर ॥४४॥

महामत कहे ए मोमिनों, ए मेहेर बड़ा सागर । सो मेहेर हक कदमों तले, पिओ अमीरस हक नजर ॥४५॥

॥ प्रकरण ॥१५॥ चौपाई ॥११२८॥

प्रकरण तथा चौपाइयों का संपूर्ण संकलन

प्रकरण ४३९, चौपाई १४१६५

॥ सागर सम्पूर्ण ॥

इसी सन्दर्भ में देखें-