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विषय-सूची

सागर - प्रकरण ५

सागर चौथा जुगल किसोर का सिनगार

श्री राजजी का सिनगार पेहेला

॥ मंगला चरण ॥

चौदे तबक की दुनी में, किन कहया न बका हरफ । ए हरफ कैसे केहेवहीं, किन पाई न बका तरफ ॥१॥

आया इलम लदुन्नी, कहे साहेदी एक खुदाए । तरफ पाई हक इलमें, मैं बका पोहोंची इन राह ॥२॥

अर्स देख्या रूहअल्ला, हक सूरत किसोर सुन्दर । कही वाहेदत की मारफत, जो अर्स के अंदर ॥३॥

नदी ताल बाग जानवर, जो अर्स की हकीकत । रूहअल्ला दई साहेदी, हक हादी खास उमत ॥४॥

महंमद पोहोंचे अर्स में, देखी हक सूरत । हौज जोए बाग जानवर, कही सब हक मारफत ॥५॥

देखी अमरद जुल्फें हक की, और बोहोत करी मजकूर । कही बातें जाहेर बातून, पोहोंच के हक हजूर ॥६॥

ए साहेदी आई इन विध की, कहे खुदा एक महंमद बरहक । सो क्यों सुध परे बिना इलम, हक इलमें करी बेसक ॥७॥

महंमद की फुरमान में, कही तीन सूरत । बसरी मलकी और हकी, एक अव्वल दो आखिरत ॥८॥

मेरी रूह जो बरनन करत है, करी हादियों मेहेरबानगी । ना तो अव्वल से आज लगे, कहूं जाहेर न बका की ॥९॥

आतम चाहे बरनन करूं, जुगल किसोर विध दोए । ए दोए बरनन कैसे करूं, दोऊ एक कहावत सोए ॥१०॥

बरनन होए इलम से, जो इलम हक का होए । एक देखाऊं बातून में, जाहेर बरनवूं दोए ॥११॥

रूह चाहे बका सरूप की, बरनन करूं जिमी इन । इलम लदुन्नी खुदाई से, जो कबहूं न सुनिया किन ॥१२॥

जिन जानो ए बरनन, करत आदमी का । ए सब थें न्यारा सुभान जो, अर्स अजीम में बका ॥१३॥

मलकूत ऊपर हवा सुन्य, तिन पर नूर अछर । नूर पार नूरतजल्ला, ए जो अछरातीत सब पर ॥१४॥

अर्स ठौर हमेसगी, हमेसा हक सूरत । सिनगार सबे हमेसगी, ना चल विचल इत ॥१५॥

जित जैसा रूह चाहत, तहाँ तैसा बनत सिनगार । नित नए वाहेदत में, सोभा अखंड अपार ॥१६॥

या वस्तर या भूखन, जो दिल रूह चहे । सो उन अंगों सोभा लिए, जानों आगूं ही बन रहे ॥१७॥

हाथ न लगे भूखन को, जो दीजे हाथ ऊपर । चित्त चाहया अंगों सब लग रहया, जुदा होए न अग्या बिगर ॥१८॥

जिन खिन चित्त जो चाहे, सो आगूंही बनि आवे । इन विध सिनगार सब समें, नित नए रूप देखावे ॥१९॥

ना पेहेन्या ना उतारिया, दिल चाहया नित सुख । वाहेदत हमेसा ए सुख, हक सींचल सनमुख ॥२०॥

सब्द न लगे सोभा असलें, पर रूह मेरी सेवा चाहे । तो बरनन करूं इनका, जानों रूहों भी दिल समाए ॥२१॥

इन जिमी जरे की रोसनी, मावत नहीं आसमान । तो ए बरनन क्यों होवहीं, अर्स साहेब सुभान ॥२२॥

आसिक क्यों बरनन करे, इस्क लिए रेहेमान । एक अंग को देखन लगी, सो तित हीं भई गलतान ॥२३॥

सोभा जुगल किसोर की, सुख सागर चौथा ए । आवें लेहेरें नेहेरें अति बड़ी, झीलें अरवाहें जो इन के ॥२४॥

खूबी जुगल किसोर की, प्रेम वचन इन रीत । आसिक इन मासूक की, भर भर प्याले पीत ॥२५॥

मेरी रूह नैन की पुतली, तिन पुतलियों के नैन । तिन नैनों में राखूं मासूक को, ज्यों मेरी रूह पावे सुख चैन ॥२६॥

॥ मंगला चरण सम्पूर्ण ॥

सिर पाग बांधी चतुराई सों, हकें पेच हाथ में ले । भाव दिल में लेय के, सुख क्यों कहूं विध ए ॥२७॥

केस चुए में भीगल, लिए जुगतें पेच फिराए । पेच दिए ता पर बहु बिध, बांधी सारंगी बनाए ॥२८॥

उज्जल हस्त कमल सों, कोमल नरम अतंत । बांधी हिरदे विचार के, दोऊ क्यों कर करूं सिफत ॥२९॥

रंग लाल जरी माहें बेल कई, कई फूल पात नकस कटाव । कई रंग नंग जवेर झलकें, बलि जाऊं बांधी जिन भाव ॥३०॥

आसिक एही विचार हीं, तब याही में रहे लपटाए । अंदर हक पेचन से, क्यों कर निकस्यो जाए ॥३१॥

ऊपर कलंगी लटकत, झलकत है अति जोत । याको नूर आसमान में, भराए रहयो उद्दोत ॥३२॥

ऊपर सारंगी दुगदुगी, करे जो झलझलाट । ए देखे अंतर आंखें खुलें, ए जो हैड़े के कपाट ॥३३॥

इन परन का नूर क्यों कहूं, देख देख रूह अटकत । और न्यारी जोत नंगन की, ए जो दुगदुगी लटकत ॥३४॥

ऊपर दुगदुगी जो मानिक, आसमान भरयो ताके तेज । आसमान जिमी के बीच में, जोत पोहोंची रेजा रेज ॥३५॥

सुन्दरता इन मुख की, सब्द न पोहोंचे कोए । नूर को नूर जो नूर है, किन मुख कहूं रंग सोए ॥३६॥

ए उज्जल रंग अंग अर्स का, माहें गेहेरी लालक ले । मुख चौक छबि इनकी, किन विध कहूं मैं ए ॥३७॥

तिलक सोभित रंग कंचन, असल बन्यो सुन्दर । चारों तरफों करकरी, सोहे लाल बिंदी अंदर ॥३८॥

लवने केस कानों पर, तिन केसों का जो नूर । आसमान जिमी के बीच में, जोत भराए रही जहूर ॥३९॥

नैनन की मैं क्यों कहूं, नूर रंग भरे तारे । सेत माहें लालक लिए, सोहें टेढ़े अनियारे ॥४०॥

रूह के नैनों से देखिए, अति मीठे लगें प्यारे । कई रंग रस छबि इनमें, निमख न होंए न्यारे ॥४१॥

नासिका की मैं क्यों कहूं, कोई इनका निमूना नाहें । जिन देख्या सो जानहीं, वाके चुभ रहे हैड़े माहें ॥४२॥

कानन मोती लटकत, उज्जल जोत प्रकास । बीच लाल की लालक, जोत मावत नहीं आकास ॥४३॥

लाल बाला अर्स धात का, करड़े बने चार चार । इन मोती और लाल की, रूह देख देख होए करार ॥४४॥

गौर रंग अति गालों के, माहें गेहेरी लालक लिए । दोऊ भ्रकुटी बीच नासिका, ऊपर सुन्दर तिलक दिए ॥४५॥

गौर हरवटी अति सुन्दर, बीच लांक ऊपर अधूर । बल बल जाऊं मीठे मुख की, मिल दोऊ करें मजकूर ॥४६॥

कटि कोमल अति पेट पांसली, पीठ गौर सोभे सरस । गरदन केस पेच पाग के, छबि क्यों कहूं अंग अर्स ॥४७॥

कोमल अंग कंठ हैड़ा, खभे मछे गौर लाल । कोनी कांड़े कोमल देखत, आसिक बदलत हाल ॥४८॥

लीकें सोभित हथेलियां, रंग उज्जल कहूं के गुलाल । रूह थें पलक न छूटहीं, अंग कोमल नूरजमाल ॥४९॥

नरम अंगुरियां पतली, पोहोंचे सलूकी जुदे भाए । रंग सलूकी पोहोंचे हथेलियां, किन मुख कहूं चित्त ल्याए ॥५०॥

नैन श्रवन मुख नासिका, मुख छबि अति सुन्दर । ए देखत हीं आसिक अंगों, चुभ रहत हैड़े अन्दर ॥५१॥

बीड़ी सोभित मुख मोरत, लेत तम्बोल रंग लाल । ए बरनन रूह तोलों करे, जोलों लगे न हैड़े भाल ॥५२॥

जानों के जोवन नौतन, अजूं चढ़ता है रंग रस । ऐसा कायम हमेसा, इन विध अंग अर्स ॥५३॥

सेत जामा अंग लग रहया, मिहीं चूड़ी बनी दोऊ बांहें । दावन क्यों बरनन करूँ, इन अंग की जुबांए ॥५४॥

बेल नकस दोऊ बगलों, चीन झलकत मोहोरी जड़ाव । नकस बेल गिरबान बन्ध, पीछे अतंत बन्यो कटाव ॥५५॥

ए देत देखाई रंग जवेर, नकस कटाव बेली जर । लगत नाहीं हाथ को, रंग नंग धागा बराबर ॥५६॥

इजार रंग जो केसरी, झांईं जामें में लेत । दावन जड़ाव अति जगमगे, रंग सोभे केसरी पर सेत ॥५७॥

नीले पीले के बीच में, झांईं लेत रंग दोए । सो पटुका कमर बन्या, रंग कहया सुन्दरबाई सोए ॥५८॥

जरी पटुका कटाव कई, कई नकस बेल किनार । पाच पांने हीरे पोखरे, कई रंग नंग झलकार ॥५९॥

मनी मानिक लसनियां नीलवी, अतंत उद्दोतकार । फूल पात बेल नकस, ए जोत न छेड़ों सुमार ॥६०॥

हेम वस्तर नंग नूर में, नरमाई अतंत । जो कोई चीज अर्स की, खुसबोए अति बेहेकत ॥६१॥

एक हार मोती एक नीलवी, और हार हीरों का एक । एक हार लाल मानिक का, एक लसनियां विसेक ॥६२॥

इन हारों बीच दुगदुगी, नूर नंग कहयो न जाए । जोत अम्बर लों उठ के, अवकास रहयो भराए ॥६३॥

इन पांचों हार के फुमक, तिन फुमक पांचों रंग । रंग पांचों सोभें जुदे जुदे, जरी सोभित धागे संग ॥६४॥

ए पांच रंग एक कंचन, ताके बने जो बाजूबन्ध । इन जुबां सोभा क्यों कहूं, झूलें फुन्दन भली सनन्ध ॥६५॥

दोए पोहोंची दोए जिनस की, मनी मानिक मोती पुखराज । हेम हीरा लसनियां नीलवी, दोऊ पोहोंची रही बिराज ॥६६॥

एक पोहोंची एक दुगदुगी, और सात सात दूजी को । सो सातों जिनस जुदी जुदी, आवत ना अकल मों ॥६७॥

पाच पांने हीरे पोखरे, मुंदरी अंगुरियों सात । नीलवी मोती लसनियां, साज सोभित हेम धात ॥६८॥

एक अंगूठी आठमी, सो सोभा लेत सब पर । सो ए एक मानिक की, जुड़ बैठी अंगूठे भर ॥६९॥

इन मुख नख जोत क्यों कहूं, कई कोट सूरज ढंपाए । ए सुखकारी तेज सीतल, ए सिफत न कही जाए ॥७०॥

अजब रंग आसमानी का, जुड़ी जामें मिहीं चादर । ए भूखन बेल कटाव जामें, सब आवत माहें नजर ॥७१॥

लाल नीले पीले रंग कई, सोभें छेड़ों बीच किनार । जामें चादर मिल रही, लेहेरी आवत किरनें अपार ॥७२॥

गेहेरा रंग जो केसरी, लेत दावन झांईं इजार । सेत केसर दोऊ रंग के, सोभा होत सुखकार ॥७३॥

नेफे मोहोरी चीन के, बेल बनी मोती नंग । लाल नीली पीली चूनियां, सोभित कंचन संग ॥७४॥

कई रंग इजार बंध में, अनेक विध के नंग । सारी उमर बरनन करूं, तो होए ना सुपन के अंग ॥७५॥

एक एक नंग नाम लेत हों, रंग रंग में रंग अनेक । एकै इजार बंध में, क्यों कहूं रंग नंग विवेक ॥७६॥

याकी रंग सलूकी क्यों कहूं, बका धनी के चरन । लांक तली रंग सोभित, ग्रहूं रूह के अन्तस्करन ॥७७॥

देखूं रंग चरन अंगूठे, और सलूकी कहूं क्यों कर । नख उतरते छोटे छोटे, सोभा लेत अंगुरियों पर ॥७८॥

पोहोंचे सोभित रंग सुन्दर, टांकन घूंटी काड़े कोमल । लांक एड़ी पीड़ी पकड़, बेर बेर जाऊँ बल बल ॥७९॥

ए चरन नख अति सोभित, जानो तेज पुंज भर पूर । लेहेरें लगें आकास को, नेहेरें चलत तेज नूर ॥८०॥

अब जो भूखन चरन के, हेम झांझर घूंघर कड़ी । अनेक रंग नंग झलकें, जानों के जवेर जड़ी ॥८१॥

जड़ी न घड़ी समारी किने, ए तो कायम सदा असल । नई न पुरानी अर्स में, इत होत न चल विचल ॥८२॥

जरी जवेर रंग रेसम, नकस बेल फूल पात । ए सिनगार सोभा कही इन जुबां, पर सब्द न इत समात ॥८३॥

अब जो वस्तर भूखन की, क्यों कर होए बरनन । इत अकल ना पोहोंचत, और ठौर नहीं बोलन ॥८४॥

ए भूखन अर्स जवेर के, हक सूरत के अंग । कहा कहे रूह इन जुबां, रंग रेसम सोब्रन नंग ॥८५॥

आसिक इन चरन की, अर्स मेला रूहन । ए खिलवत खाना गैब का, जिन इत किया रोसन ॥८६॥

चरन तली ना छूटत, रंग लाल लिए उज्जल । ताए क्यों कहिए आसिक, जो इतथें जाए चल ॥८७॥

पांउं तले पड़ी रहे, याको इतहीं खान पान । एही दीदार दोस्ती कायम, जो होए अरवा अर्स सुभान ॥८८॥

इतहीं जगात इत जारत, इत बंदगी परहेजी जान । और आसिक न रखे या बिना, इतहीं होवे कुरबान ॥८९॥

खाना दीदार इनका, या सों जीवे लेवे स्वांस । दोस्ती इन सरूप की, तिनसे मिटत प्यास ॥९०॥

हक खिलवत जाहेर करी, इत सिजदा हैयात । इतहीं इमाम इमामत, इतहीं महंमद सिफात ॥९१॥

कोई खाली न गया इन खिलवतें, कछू लिया हक का भेद । सो कहूं जाए ना सके, पड़या इस्क के कैद ॥९२॥

आसिक पकड़े जो दावन, तो छूटे नहीं क्योंए कर । देखत देखत चीन लगे, तोलों जात निकस उमर ॥९३॥

बोहोत अटकाव है आसिक, कछू सेवा भी किया चाहे । ए तो बरनन सिनगार, सेवा उमंग रही भराए ॥९४॥

जो कदी कमर अटकी, तो आसिक न छोड़े ए । ए लांक पटुका छोड़ के, जाए न सके उर ले ॥९५॥

जो दिल हक का देखिए, तो पूरा इस्क का पुन्ज । क्यों छोड़े आसिक इनको, हक दिल इस्क गन्ज ॥९६॥

मोमिन दिल अर्स कहया, सो अर्स हक का घर । इस्क प्याले हक फूल के, देत भर भर अपनी नजर ॥९७॥

इस्क सुराही लेय के, आए बैठे दिल पर । इस्क प्याले आसिकों, हक देत आप भर भर ॥९८॥

जो कदी आवे मस्ती में, तो एक प्याला देवे गिराए । सराब तहूरा ऐसा चढ़े, दिल तबहीं देवे फिराए ॥९९॥

जाए हक सराब पिलावत, आस बांधत है सोए । वाको अर्स सराब की, आवत है खुसबोए ॥१००॥

आई जो कदी खुसबोए, ए जो अर्स की सराब । इन मद के चढ़ाव से, देवे तबहीं उड़ाए ख्वाब ॥१०१॥

आज लगे ढांप्या रहया, हकें मोहोर करी तिन पर । सो अछूत प्याला फूल का, हकें खोल दिया मेहेर कर ॥१०२॥

एकों पिया एक पीवत हैं, एक प्याले पीवेंगे । खोल्या दरवाजा अर्स का, वास्ते अर्स अरवाहों के ॥१०३॥

अंग आसिक उपले देख के, इतहीं रहे ललचाए । जो कदी पैठे गंज में, तो क्यों कर निकस्यो जाए ॥१०४॥

हस्त कमल को देखिए, तो अति खूबी कोमल । ए छोड़ आगे जाए ना सके, जो कोई आसिक दिल ॥१०५॥

नख अंगुरियां निरखते, मुंदरियां अति झलकत । ए रंग रेखा क्यों छूटहीं, आसिक चित्त गलित ॥१०६॥

पोहोंची बांहें बाजू बन्ध, दोऊ निरखत नीके कर । एक नंग और फुन्दन, चुभ रहत हैड़े अन्दर ॥१०७॥

हिरदे कमल अति कोमल, देख इन सरूप के अंग। जो आसिक कहावे आपको, क्यों छोड़े इनको संग ॥१०८॥

हार कण्ठ गिरवान जो, अति सुन्दर सुखदाए । लाल लटकत मोती पर, ए सोभा छोड़ी न जाए ॥१०९॥

मुख सरूप अति सुन्दर, क्यों कहूं सोभा मुख इन । एक अंग जो निरखिए, तो तितहीं थके बरनन ॥११०॥

छबि सरूप मुख छोड़ के, देख सकों न लांक अधूर । ए लाल की लालक क्यों कहूं, जो अमृत अर्स मधूर ॥१११॥

ए मुख अधुर लांक छोड़ के, क्यों कर दन्‍त लग जाए । देत नाम निमूना इत का, सों इन सरूपें क्यों सोभाए ॥११२॥

सो दन्‍त अधुर लांक छोड़ के, जाए न सकों लग गाल । सो गाल लाल मुख छोड़ के, आगूं नजर न सके चाल ॥११३॥

मुख नासिका देखत आसिक, सुन्दर सोभा अतंत । नेत्र बीच निलाट तिलक, आसिक याही सों जीवत ॥११४॥

भृकुटी तिलक सोभा छोड़ के, जाए न सकों लग कान । सो कान कोमल अति सुन्दर, सुख पाइए हिरदे आन ॥११५॥

और भी खूबी कानन की, दिल दरदां देवे भान । जाको केहे लेऊं पड़ उत्तर, कोई न सुख इन समान ॥११६॥

कहें सुनें बातें करें, ए जो अर्स मेहेरबान । सो खिलवत सुख छोड़ के, लग जवाए नहीं नैन बान ॥११७॥

ए नैन बान सुभान के, क्यों छोड़ें रूह मोमिन । ए नैन रस छोड़ आगे चले, रूहें नाम धरत हैं तिन ॥११८॥

नैन अनियारे अति तीखे, पल देत तारे चंचल । स्याम उज्जल लालक लिए, ए क्यों कहूं सुपन अकल ॥११९॥

नैन रसीले रंग भरे, खैंचत बंके मरोर । सो आसिक रूह जाए ना सके, जाए लगें बान ए जोर ॥१२०॥

ए नेत्र रसीले निरखते, उपजत है सुख चैन । ए क्यों न्‍यारे होए नैन रूह के, सामी छोड़ नैन की सैन ॥१२१॥

जो चल जाए सारी उमर, तो क्यों छोड़िए सुख नैनन । इन सुख से क्यों अघाइए, आसिक अंतस्करन ॥१२२॥

निलवट सुन्दर सुभान के, सोभा मीठी मुखारबिंद । ए छबि कहीं न जाए एक अंग की, ए तो सोभा सागर खावंद ॥१२३॥

हँसत सोभित हरवटी, दंत अधुर मुख लाल । आसिक से क्यों छूटहीं, सब अंग रंग रसाल ॥१२४॥

अति कोमल अंग किसोर, कायम अंग उनमद । ए छबि अंग अर्स के, पोहोंचत नहीं सब्द ॥१२५॥

मुख नासिका नेत्र भौंह, तिलक निलाट और कान । हाथ पांउ अंग हैड़ा, सब मुसकत केहेत मुख बान ॥१२६॥

जो आसिक इन मासूक की, सो अटक रहे एकै अंग । और अंग लग जाए ना सके, अंग एकै लग जाए रंग ॥१२७॥

देख बीड़ी मुख मोरत, रूह अंग उपजत सुख । पीऊं सराब लेऊं मस्ती, ज्यों बल बल जाऊं इन मुख ॥१२८॥

ए छबि छोड़ के आसिक, क्यों कर आगे जाए । मोहि लेत मुख मासूक, सो चित्त रहयो चुभाए ॥१२९॥

नैनों निलवट निरखते, देखी बनी सारंगी पाग । दुगदुगी कलंगी ए जोत, छबि रूह हिरदे रही लाग ॥१३०॥

होए बरनन चतुराई से, आसिक धरे ताको नाम । एक अंग छोड़ जाए और लगे, सो नाहीं आसिक को काम ॥१३१॥

आसिक कहिए हक की, जो लग रहे एकै ठौर । आसिक ऐसी चाहिए, जो ले न सके अंग और ॥१३२॥

इन आसिक की नजरों, दिल एकै हुआ सागर । सो झीले याही सुख में, निकसे नहीं क्योंए कर ॥१३३॥

तो सोभा सारे सरूप की, क्यों कहे जुबां इन । लेहेरें नेहेरें पोहोंचे आकास लों, और ठौर न कोई मोमिन ॥१३४॥

आसिक न लेवे दानाई, पर ए दानाई हक । इस्क आपे पीवहीं, और पिलावें बेसक ॥१३५॥

ए चतुराई हक की, और हकै का इलम । ए सुख इन सरूप के, देवें एही खसम ॥१३६॥

इन सरूप को बरनन, सो याही की चतुराए । याको आसिक जानिए, जो इतहीं रहे लपटाए ॥१३७॥

ए सुख इन सरूप को, और आसिक एही आराम । जोलों इस्क न आवहीं, तोलों इलम एही विश्राम ॥१३८॥

इस्क को सुख और है, और सुख इलम । पर न्यारी बात आसिक की, जिन जो देवें खसम ॥१३९॥

ए इलम ए इस्क, दोऊ इन हक को चाहें । पर जिनको हक जो देत हैं, सो लेवे सिर चढ़ाए ॥१४०॥

महामत कहे अपनी रूहन को, तुम जो अरवा अर्स । सराब प्याले इस्क के, ल्‍यो प्याले पर प्याले सरस ॥१४१॥

॥ प्रकरण ॥५॥ चौपाई ॥३४९॥

इसी सन्दर्भ में देखें-