सनन्ध - प्रकरण १
ढूंढ़े सबे मेयराज को, सबे मेयराज में सब । सो सबे मेयराज जाहेर करी, सो सब मेयराज देखसी अब ॥
श्री किताब कुरान माफक सनंधे असराफीलें आखिर में कुरान को गाया है, सो अपनी सरत पर जाहेर हुई है । तिनकी ए सनंधे दुलहिन किताब आसमानी हम नाजी फिरके में, आखिर को महंमद मेंहेंदी ले उतरे हैं, सो वास्ते रूहों के ।
सनंध पेहेली अल्ला रसूल की
अल्ला मुहबा मासूक, सो खासी खसम दिल । तो नाम धराया रसूलें, आसिक अपना असल ॥१॥
आसिक कह्या अल्लाह को, मासूक कह्या महंमद । न जाए खोले मायने, बिना इमाम एक सब्द ॥२॥
आए रसूलें यों कह्या, काजी आवेगा खुद सोए । पर फुरमान यों केहेवहीं, जिन कोई केहेवे दोए ॥३॥
एक कह्या न जावहीं, दो भी कहिए क्यों कर । भेले जुदे जुदे भेले, माएने मुसाफ इन पर ॥४॥
ऐसे माएने गुझ कई, तिन गुझों में भी गुझ । ए माएने अपने आप बिना, और न काहूं सुझ ॥५॥
फुरमान ल्याया रसूल, तिनमें अल्ला-कलाम । सो भेज्या मोमिनों पर, अंदर गुझ अलाम ॥६॥
ए जिन भेज्या सो जानही, या जाने आया जिन पर । ए गुझ खसम मोमिन की, बिना रसूल न कोई कादर ॥७॥
खसमें लिखी हकीकत, जोलों न पाइए सोए । तोलों असलू मोमिन को, चैन जो कैसे होए ॥८॥
माएने इन कुरान के, जोलों ना समझाए । तोलों सो रूह आपको, मोमिन क्यों केहेलाए ॥९॥
तो लिख्या आगूहीं थें, रसूलें अल्ला कलाम । करसी जाहेर मोमिन, आखिर आए इमाम ॥१०॥
हकीकत फुरमान की, कहूं सुनो सब मिल । नूर अकल आगे ल्याए के, साफ करूं तुम दिल ॥११॥
अब सो आखिर आइया, उठ खड़े रहो मुस्लिम । पाक करूं नूर अकलें, खबर देऊं खसम ॥१२॥
सबको प्यारी अपनी, जो है कुल की भाख । अब कहूं भाखा मैं किनकी, यामें भाखा तो कई लाख ॥१३॥
बोली जुदी सबन की, और सबका जुदा चलन । सब उरझे नाम जुदे धर, पर मेरे तो केहेना सबन ॥१४॥
बिना हिसाबें बोलियां, मिने सकल जहान । सबको सुगम जान के, कहूंंगी हिंदुस्तान ॥१५॥
बड़ी भाखा एही भली, सो सबमें जाहेर । करने पाक सबन को, अंतर मांहें बाहेर ॥१६॥
॥ प्रकरण ॥१॥ चौपाई ॥१६॥
